व्यंग्य : हाय रे बुखार

ललित शौर्य

Lalit Mohan Rathorबुखार! बुखार निर्दयी नहीं होता वो कभी-कभी दयालु और कृपालु भी होता है। माल कमाई का जरिया भी होता है। ये जेब भरने की मशीन बन जाता है। लेकिन वहीँ दूसरे प्रकार के बुखार जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। किसी ने कहा है, “कुसंग का ज्वर भयंकर होता है।” ये ज्वर और बुखार दोनों एक्के हैं। पुराने बुखार जिनसे हम परचित हैं  जैसे डेंगू का बुखार, मलेरिया का बुखार ,साधारण बुखार अनेकानेक बीमारियों की सूचना देने वाले अनेक बुखार। ठीक इसी तरह के कुछ अन्य बुखार हैं जैसे लबेरिया का बुखार।ये मलेरिया के बुखार से भयंकर बुखार हो सकता है। आजकल देखा जा रहा है की लबेरिया के बुखार से पीड़ित बन्दा न जाने क्या-क्या कर डर डालता है। ये बुखार लडक़े और लड़कियों दोनों में सामान रूप से चढ़ सकता है। इस बुखार से पीड़ित जोड़े आपको पार्कों में बैठे , बाइक या स्कूटी में झूलते-टहलते दिखाई दे सकते हैं।

आजकल प्रायः लबेरिया से पीड़ित लड़कियां घर से निकलने से पहले एक लंबा सा स्कार्फ/ स्टाल मुंह पर बांधें निकलती हैं जिससे की ये बिमारी अगले को ना फ़ैल जाये (असली मुद्दा कुछ और ही है। मामला ये है की कहीं कोई घरवाला , पडोसी , रिश्तेदार न पहचान ले। नहीं तो घर लौटने पर भयंकर कुटाई होगी। उसके बाद हड्डियों में बुखार चढ़ना लाजमी है)। नशे का बुखार । आजकल की युवा पीढ़ी इस बुखार से बहुत ज्यादा पीड़ित है। घर , बाहर , स्कूल,  कॉलेज, कोचिंग इन सभी जगह अधिकाँश रोगियों को देखा जा सकता है। ये दम्मा रो दम या फिर दो पैग व्हिस्की या रम में विश्वास रखते हैं। इस तरह के बुखार में शुरुवात बियर होती से होती है जो बढ़ती हुई चार बोतल वोदका तक जा पहुँचती है। साथ में सुट्टा नामक नजला फ्री होता है। इसी तरह के अनेक बुखारों की चर्चा की जा सकती है।

एक अंग्रेजों के जमाने का बुखार है ,जो भारतीयों की रगों में अंदर तक घुस चुका है। गली-महोल्लों , गाँव -शहर, नगर -महानगर कहीं भी इस बुखार से पीड़ित बन्दे देखे जा सकते हैं (बंदियों में इस बुखार के लक्षण कम दिखाई देते हैं)। ये बुखार है क्रिकेट का बुखार । इस बुखार से पीड़ित नौजवान, बूढ़ा और बच्चा अपनी सुध-बुध खो बैठता है। उसे बस गेंद और बल्ला नजर आता है। इस से बुखार बहुतों के वारे -न्यारें भी हुये हैं लेकिन अधिकांश लोगों को केवल “बाबा जी का ठुल्लू “ही हाथ लगा है। अब कुछ पाँच-एक सालों से ये बुखार नये तेवर और कलेवर के साथ हम सबके बीच में है। इसके जलवे हाइ हैं। टी-20 और आई.पी.एल के नाम से ये और भयंकर रूप अख्तियार कर चुका है।

इसके चक्कर में दफ्तरों में काम ठप है, बच्चों की पढाई, नौजवनों का कैरीयर भी गोलगप्पा बनता नजर आ रहा है। बुखार के इस नये संस्करण से सट्टे नामक उपबुखार की उत्पत्ति हो चुकी है। वैसे सट्टे नामक बुखार बहुत पहले समाज में आक्रमण कर चुका था। लेकिन आई.पी. एल और टी.20 ने उसे नया सम्मान, नया आयाम, नया तेवर और कलेवर प्रदान किया हैं । सट्टे का ये बुखार अब कॉलेज स्टूडेंट की जिंदगी भी चौपट कर रहा है। पैसे का बड़ा खेल क्रिकेट के खेल के पीछे खेला जा रहा हैं। खैर बुखार कोई भी हो घातक हो सकता है। जरा बचके बाबू ।

फिर कहीं चिल्लाना न पड़े , हाय रे बुखार, ओये होये रे बुखार….