पितरों को श्रद्धांजलि देना ही श्राद्ध

हिन्दू धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता अभिव्यक्त करने और उन्हें याद करने के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं, जिनसे गुण हमें विरासत में मिलें हैं, उनका हम पर न चुकाया जा सकने वाला ऋण है।

श्रद्धया इदं श्राद्धम, अर्थात जो श्रद्धा से किया जाये वही श्राद्ध है। श्राद्ध प्रथा वैदिक काल के बाद शुरू हुई और इसके मूल में इसी श्लोक की भावना है। उचित समय पर शास्त्र सम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मन्त्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाये, वही श्राद्ध कहलाता है।

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरान्त लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। पुराणों में इसके आयोजन को लेकर कई कथाएं हैं, जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है। हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्रीरामचरित में भी श्रीराम द्वारा राजा दशरथ और जटायु को जलांजलि देने का उल्लेख है। भरत द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है।

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें जीवन धारण करने और उसका विकास करने में सहयोग दिया। पितृपक्ष में लोग मन, कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं। पितरों को स्मरण करके जल चढ़ाते हैं। निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति को केवल मोटा अन्न, जंगली साग, फल और न्यूनतम दक्षिणा देनी चाहिये। यदि वह भी न हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या किसी गाय को घास खिला देनी चाहिए। अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

हिन्दू धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता अभिव्यक्त करने और उन्हें याद करने के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं, जिनसे गुण हमें विरासत में मिलें हैं, उनका हम पर न चुकाया जा सकने वाला ऋण है। श्रद्धया इदं श्राद्धम, अर्थात जो श्रद्धा से किया जाये वही श्राद्ध है। श्राद्ध प्रथा वैदिक काल के बाद शुरू हुई और इसके मूल में इसी श्लोक की भावना है। उचित समय पर शास्त्र सम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मन्त्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाये, वही श्राद्ध कहलाता है।

हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरान्त लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। पुराणों में इसके आयोजन को लेकर कई कथाएं हैं, जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है। हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्रीरामचरित में भी श्रीराम द्वारा राजा दशरथ और जटायु को जलांजलि देने का उल्लेख है। भरत द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है। भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें जीवन धारण करने और उसका विकास करने में सहयोग दिया। पितृपक्ष में लोग मन, कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं। पितरों को स्मरण करके जल चढ़ाते हैं। निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति को केवल मोटा अन्न, जंगली साग, फल और न्यूनतम दक्षिणा देनी चाहिये। यदि वह भी न हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या किसी गाय को घास खिला देनी चाहिए। अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।

वेदों, दर्शन शास्त्रों, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में हमारे ऋषियों-मनीषियों ने इस विषय पर विस्तृत विचार किया है। श्रीमद्भगवत गीता में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। शरीर नष्ट होता है, मगर आत्मा कभी भी नष्ट नहीं होती। वह पुनः जन्म लेती है और बार-बार जन्म लेती है। इस पुनः जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्ध कर्म का विधान निर्मित किया गया है। अपने पूर्वजों के निमित्त दी गई वस्तुएं सचमुच उन्हें प्राप्त होती हैं या नहीं, इस विषय में अधिकांश लोगों को संदेह है। हमारे पूर्वज अपने कर्मानुसार किस योनि में उत्पन्न हुए हैं, जब हमें इतना ही नहीं मालूम तो फिर उनके लिए दिए गए पदार्थ उन तक कैसे पहुंच सकते हैं? क्या एक ब्राह्मण को भोजन कराने से हमारे पूर्वजों का पेट भर सकता है? न जाने इस तरह के कितने ही सवाल लोगों के मन में उठते होंगे। वैसे इन प्रश्नों का सीधे-सीधे उत्तर देना संभव भी नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक मापदण्डों को इस सृष्टि की प्रत्येक विषयवस्तु पर लागू नहीं किया जा सकता। दुनिया में ऐसी कई बातें हैं, जिनका कोई प्रमाण न मिलते हुए भी उन पर विश्वास करना पड़ता है। श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। इसलिए शास्त्र पूर्वजन्म के आधार पर ही श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं। 

वेदों, दर्शन शास्त्रों, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में हमारे ऋषियों-मनीषियों ने इस विषय पर विस्तृत विचार किया है। श्रीमद्भगवत गीता में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। शरीर नष्ट होता है, मगर आत्मा कभी भी नष्ट नहीं होती। वह पुनः जन्म लेती है और बार-बार जन्म लेती है। इस पुनः जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्ध कर्म का विधान निर्मित किया गया है। अपने पूर्वजों के निमित्त दी गई वस्तुएं सचमुच उन्हें प्राप्त होती हैं या नहीं, इस विषय में अधिकांश लोगों को संदेह है। हमारे पूर्वज अपने कर्मानुसार किस योनि में उत्पन्न हुए हैं, जब हमें इतना ही नहीं मालूम तो फिर उनके लिए दिए गए पदार्थ उन तक कैसे पहुंच सकते हैं? क्या एक ब्राह्मण को भोजन कराने से हमारे पूर्वजों का पेट भर सकता है? न जाने इस तरह के कितने ही सवाल लोगों के मन में उठते होंगे। वैसे इन प्रश्नों का सीधे-सीधे उत्तर देना संभव भी नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक मापदण्डों को इस सृष्टि की प्रत्येक विषयवस्तु पर लागू नहीं किया जा सकता। दुनिया में ऐसी कई बातें हैं, जिनका कोई प्रमाण न मिलते हुए भी उन पर विश्वास करना पड़ता है। श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। इसलिए शास्त्र पूर्वजन्म के आधार पर ही श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं।