याद है तुम्हें

पदमा शर्मा

padma-sharma

आँचल
अक्सर ये सवाल मुझसे
करता है
मेरा आज का वजूद
आज की स्थिती
ये परिस्थिती
याद है तुम्हें…??
वो दिन वो मस्ती
वो आदतें वो शिकायतें
वो जिद्दीपन वो अल्हडपन
वो नादानियाॅ वो शैतानियाॅ
वो शरारत वो नजाकत
कहाॅ खो गए हैं आज
याद है तुम्हें..??
कभी एक छोटी सी बात पर
लाख रूठ जाना
मनाने कोई आए तो
पैर पटक कर
हाथों से झटका देना
अब लाखों शिकायतें हो मगर
फिर भी लवों पे
कोई आह! तक नहीं
एक उफ!! तक नहीं
कहाॅ से आगया है
मुझमें इतनी शक्ति
सबकुछ सह जाने का
फिर भी मुस्कुराने का
परायों की बात नहीं
चोट अपनों का सह जाने का..
अक्सर मेरी चंचलता
पुछती है मुझसे
क्या याद है तुम्हें..
तुम्हारा चुलबुलापन
सारे घर को आसमान में
ऊठाकर चिल्लाने की आदत
अपनी जीद के आगे
सबको झुकाने की आदत
अब सरेआम गलती करे कोई
फिर भी चुपचाप इल्जाम सहना
कैसे सिख गई मैं
अपने सारे शौक और
चाहतों को चुपचाप
मिट्टी में दफन करके भी
खामोश रहना कैसे सिख गई मैं
आज मेरे अंदर का ठहराव
पुछता है मुझसे
क्या याद है तुम्हें..
कभी तुम होती थी
चंचल झरनों की तरह
कलकल बहती नदी की तरह
अब दरिया बन गई हो तुम
शांत सागर बन गई हो तुम
वक्त चलता रहा
पर…
कहीं ठहर सी गई हो तुम
क्या तुम्हें याद है..??