सगंध पौध केंद्र ने भंगजीरा की नई किस्म तैयार की

उत्तराखंड में भंगजीरा की व्यावसायिक खेती से किसानों की आर्थिकी बदलेगी। लगभग नौ सालों के शोध के बाद सगंध पौध केंद्र (कैंप) सेलाकुई ने यह नई किस्म विकसित की है।

इसमें ओमेगा का स्तर 58 प्रतिशत है। यूएसए से भी इस प्रजाति को ओमेगा के पैटर्न का प्रमाणीकरण मिल चुका है। एक हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती से करने से किसान को ढाई से तीन लाख की आमदनी होगी। खास बात ये है कि भंगजीरा को जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। 
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षों से लोग अपनी जरूरत के लिए भंगजीरा की खेती करते हैं। भंगजीरा का वैज्ञानिक नाम पैरिला फ्रूटीसेंस है। सगंध पौध केंद्र ने भंगजीरा की नई किस्म तैयार है। इसमें ओमेगा का स्तर 58 प्रतिशत है। जबकि परंपरागत भंगजीरा में ओमेगा का स्तर पर 51 प्रतिशत है।

ओमेगा का स्तर ज्यादा होने से भंगजीरा का तेल ऑयल कैप्सूल बनाने के काम आएगा। यह कॉड लीवर ऑयल (मछली के तेल) का विकल्प होगा। जिसे शाकाहारी लोग इस्तेमाल कर सकेंगे। कोरिया, जापान में इसकी बड़े स्तर पर व्यावसायिक खेती होती है। 

ये होगा फायदा

  • भंगजीरा के तेल का उपयोग कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज को कम करने, रक्तचाप, कैंसर, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किया जाएगा।
  • भंगजीरा आयॅल की मार्केटिंग के लिए सरकार फार्मा उद्योगों के साथ अनुबंध करेगी। 

भंगजीरा की नई प्रजाति विकसित करने में एक बड़ी कामयाबी मिली है। यूएसए से भी ओमेेगा स्तर पर प्रमाणीकरण हो गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में भंगजीरा की व्यावसायिक खेती किसानों की आर्थिकी को बदल सकती है। यह वर्षा ऋतु की फसल है। बंजर भूमि पर भी इसकी खेती हो सकती है और जंगली जानवर इसे नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।