Media को Paid किसने बनाया ?

आर.बी.एल.निगम

RBL Nigamबीजेपी सांसद विजय गोयल ने मई 9 को  राज्य सभा में PAID NEWS का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और पुलिस के बाद मीडिया को देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है लेकिन आजकल मीडिया बेलगाम होता जा रहा है और PAID NEWS देकर देश के लोगों को भ्रमित करने का काम करता रहता है। विजय गोयल ने कहा कि देश के सभी नामी गिरामी अख़बारों में पेड न्यूज आता है। कोई इसे एडिटोरियल कहता है कोई फ्री स्पीच कहता है।

उन्होंने एक ताजा घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि वे एक दिन अखबार पढ़ रहे थे तो एडिटोरियल में एक लेख छपा था जिसमें कहा गया था कि दिल्ली की ओड-ईवन योजना असफल हो चुकी है क्योंकि इससे प्रदूषण कम नहीं हुआ, उन्होंने दूसरे दिन वही अखबार पढ़ा तो उसमे लिखा था कि दिल्ली की ओड-ईवन योजना सफल हो गयी।

विजय गोयल ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जो अखबार एक दिन लिखता है कि ‘ओड ईवन योजना असफल हो गयी’ वही अखबार दूसरे दिन छाप दे कि ‘ओड ईवन योजना सफल हो गयी’। विजय गोयल ने कहा कि मैंने प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को इस विषय में पत्र भी लिखा लेकिन उन्होने  मेरे प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया।

national-news-paid-media-01उन्होंने मांग की कि राज्य सभा को मीडिया अकाउंटेबल कमेटी बनानी चाहिए ताकि भ्रामक ख़बरों को रोका जा सके। विजय गोयल की बात का लगभग सभी सांसदों ने समर्थन करते हुए कहा कि यह बहुत ही गंभीर मामला है और इस विषय पर एक चर्चा होनी चाहिए।

इस विषय पर आनंद शर्मा ने भी कहा कि यह बहुत गंभीर मामला है और वित्त मंत्री अरुण जेटली को इस विषय पर एक्शन लेना चाहिए, आने वाले समय में यह एक बीमारी बन जाएगी। कई सांसदों ने प्रिंट मीडिया के अलावा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी लगाम लगायी जानी चाहिए। ये लोग फेक सर्वे कराकर किसी भी पार्टी को चुनाव जिता देते हैं और किसी को भी चुनाव हरा देते हैं।

कई सांसदों ने कहा कि आज पेड मीडिया की वजह से चुनाव लड़ना इतना खर्चीला हो गया है कि कोइ चुनाव लड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता, चुनाव में पेड ख़बरों के लिए कालेधन का इस्तेमाल किया जाता है और मीडिया पर पैसा लुटाया जाता है।

देर आये दुरुस्त आये। कम से कम हमारे सांसदों ने यह तो माना कि मीडिया किस तरह जनता को भ्रमित कर रहा है। प्रैस जिसे “लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ” कहा जाता था, अपनी  उस पहचान को मीडिया वास्तव में कई वर्ष पूर्व ही खो चूका है। लगभग तीन दशक पूर्व तक फिल्म पत्रकारिता “येलो जर्नलिज्म” के नाम से चर्चित थी,परन्तु आज तो सम्पूर्ण पत्रकारिता ही “येल्लो” हो चुकी है। मेरी आयु के वरिष्ठ पत्रकारों को स्मरण होगा कि जब बोफोर्स कांड चल रहा था, तब दूरदर्शन समाचार के एक संवाददाता ने बच्चों का एक लाइव कार्यक्र्म दिखाया जिसमें बच्चे कहते हैं “गली-गली में शोर है राजीव गांधी चोर है। ” उस संवाददाता से पूछिए “बेटा तेरा क्या हाल है?” मीडिया को paid बनाने में नेता समाज ही ज़िम्मेदार है।

आज राजनीतिक प्रभाव के कारण मीडिया में हज़ारों ऐसे पत्रकार भरे पड़े हैं जो अपना पद तक ठीक से लिख नहीं सकते। कैसे आये मीडिया में ? किसकी अनुकम्पा थी ?नमूना देखिये :–

*JAY at Self-Employed and works at Riporter atPress
Lives in Shahjahanpur
From New Delhi, India
*biyuro chiph luckmow at All Press & Writers Association India- APWA
*Chourasiya Journlist
*10वी एवं 12वी कक्षा का रिजल्ट दिनांक 10/05/2016 को दोपहर 12:30 के बाद आएगा ।
( धन्यावाद )
*Jn skti part se jurne kile liye 9719863236 renu singh rana rastay adhkch smprk kre

(ये भावी नेताओं का हाल है )

ऐसे पत्रकार क्या देश का भला करेंगे और क्या समाज का? ऐसी क्या विशेषता या योग्यता के आधार पर ये लोग पत्रकार बने या फिर बनाए गए ? इतना ही नहीं देश में आज इतने पत्र एवं पत्रिकाएँ पंजीकृत हैं, उनमें से साठ प्रतिशत ऐसे संस्करण या कहा जाये कि प्रकाशन हैं जिन्हे पुलिस, मंत्री, प्रैस विभाग या फिर कुछ  जनसम्पर्क अधिकारी ही जानते हैं। अपने अच्छा खासा प्रकाशन संख्या दिखाकर सरकारी न्यूज़ प्रिंट कागज लेकर ब्लैक में बेच रहे हैं। यदि गम्भीरता से जाँच की जाये, न जाने कितने पत्र-पत्रिकाएँ बंद होंगीं। मंत्रालयों में बड़ी आओ-भगत होती हैं उनकी। एक फ़ोन पर काम करवाने की क्षमता दिखाते हैं। जिनका काम करवाते हैं मोटा पैसा ऐंठते हैं। भिन्न-भिन्न यूनियनों के सदस्य भी बने हुए हैं।

व्यक्तिगत अनुभव

national-news-paid-media-02सेवानिर्वित होने से कुछ वर्ष पूर्व कृष्णा नगर सुबह अपने बड़े भाईसाहब के पास गया था। आये दिन सड़क बनने के कारण उनके सामने पडोसी का मकान नीचा हो गया था। नाली भरने एवं बारिशों में पानी अंदर भर जाता था। उस समस्या से निजात पाने के लिए नगर निगम भवन विभाग एवं पुलिस आदि को काम शुरू करने पूर्व ही चढ़ावा दिया जा चूका था।ये नेग बहुत जरुरी है।  बैठा चाय पी रहा था कि बाहर से शोर सुनाई देने पर बाहर आकर देखा किसी गली-छाप साप्ताहिक का रिपोर्टर उनको धमका रहा था। प्रैस का होने की वजह से गली शांत थी, जब उस सज्जन से परिचय-पत्र लेकर हवा में उछाल अपना परिचय-पत्र हवा में उछालने को कहा। मेरी शक्ल देख, अपना कार्ड उठाकर चला गया। इसी तरह की मिसाल मेरी अपनी ही गली में हुई थी। कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे ब्लैकमेलर पत्रकार हैं।

फिर सेवानिर्वित उपरांत एक हिंदी पाक्षिक में कार्यकारी संपादक रहा। अपने लेखों से पाक्षिक को एक नया आयाम भी दिया। एक दिन अपने पुराने कार्यालय से वापस लौटते कमला मार्केट थाने पर प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक् मीडिया का जमावड़ा देख जब कारण पूछा ,पहले तो बोल दिया “कुछ नहीं जाओ अपना काम करो”,अपना परिचय देने पर कारण मालूम होने पर उनसे पूछा “भाई ये बताओ बलात्कार हुआ जोधपुर में, रिपोर्ट दिल्ली में ,लड़की और उसके माँ-बाप ने अभी आना है, मीडिया पहले से मौजूद। यार दाल में कुछ काला है। बापू आसाराम को फंसाया जा रहा है।”

national-news-paid-media-05वास्तव में अपने जून 9,2012 के एक समागम में आसाराम ने कहा था “सोनिया मैडम आप हिन्दुओं को ईसाई बनवाओ, मैं वापस उनको हिन्दू बनाऊंगा।” उसी दिन से इस षड्यंत्र की भूमिका बननी प्रारम्भ हो गयी थी। इस षड्यंत्र को अपने नाम से उस पाक्षिक में आमुक कथा एवं अन्य लेखों में भी लिखा। कोई चैनल ऐसा नहीं था, जिसने आसाराम को कलंकित करने का कोई प्रयास नहीं छोड़ा था। सभी आसाराम को कलंकित कर अपनी टीआरपी बढ़ाने में व्यस्त थे। क्या ये paid news नहीं थी ? माना आसाराम ऐय्याश है। उसे दण्ड दिया जाना चाहिए , लेकिन उस घटना से पूर्व मीडिया कहाँ थी ?मीडिया से पूछा जाये कि किसके कहने पर पीड़ित लड़की और उसके माँ-बाप के पहुँचने से पूर्व कमला मार्केट थाने पर जमावड़ा हुआ था?

इतना ही नहीं Paid  Media से यह भी पूछा जाये कि जब दीपावली की रात को पूजनीय जितेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार किया गया था, वो महिलाएँ कौन थी और कहाँ से आईं थी जो टीवी पर अपने शीलहरण की दास्तान सुना रही थी ? इस घटना को भी उस पाक्षिक में प्रकाशित किया था। पिछली सरकार के रहते किसी भी चैनल ने साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानंद एवं कर्नल पुरोहित के साथ हो रही  अमानवीय घटनाओं के समाचार क्यों नहीं उजागर किये ? ऐसी एक दो नहीं हज़ारों घटनाएँ हैं, जिन्हे लिखने में जगह का आभाव हो जाएगा, परन्तु घटनाएँ नहीं।

कठपुतली को मीडिया ने बना दिया समाज सेवक

national-news-paid-media-04मीडिया का काम है जनता को वास्तविकता से अवगत करवाना। यदि मीडिया अपने उद्देश्य से पदभ्रष्ट नहीं होती, आम आदमी पार्टी बनने से पूर्व ही अस्त हो गयी होती। यह वह कटु सत्य है जिसे कोई प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया झुडला नहीं सकता। इस पार्टी को मैदान में लाने वाली पार्टी कौन सी है और किस उद्देश्य किस उद्देश्य से इस पार्टी को मैदान में उतारा ?इस पार्टी के संस्थापकों का किस पार्टी से घनिष्ठ सम्बन्थ है? स्मरण हो उस पाक्षिक में आमुक कथा में “कांग्रेस और आआप का Positive DNA ” शीर्षक के अंतर्गत लेख प्रकाशित किया था। इस पार्टी के गठन से लेकर आज तक मैंने इस पार्टी का विरोध किया है और करता रहता हूँ। लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं झोंक सकता। सत्ता परिवर्तन से पूर्व किसी भी मीडिया ने अन्ना हज़ारे के प्रयोचित आंदोलनों का सच जनता के सम्मुख लाने का साहस नहीं किया। क्यों? मीडिया ने दामिनी की आड़ में हुए आन्दोलन के पीछे क्या षडयंत्र था? अन्ना हज़ारे का लोकपाल बिल आन्दोलन किस षड्यंत्र के तहत किया गया था? अपने जीवन में इतने आन्दोलन देखे परन्तु कभी किसी आन्दोलनकारी को बिजली के खम्बों पर चढ़ते और न ही राष्ट्रपति भवन के द्वारों को झकझोडते देखा। जो इस आन्दोलन में अपने-अपने टीवी पर दुनियाँ ने देखा। जब बोट-क्लब पर आन्दोलनों पर प्रतिबंध है, फिर भी वहां आन्दोलन होता है, क्या उस समय की तत्कालीन सरकार जो घोटालों में सब तरफ से घिर गयी थी , क्या जनता एवं संसद का ध्यान वहां से परिवर्तित करने का षड्यंत्र नहीं था ? लेकिन इस षड्यंत्र को उजागर करना था मीडिया को। नहीं किया। इसी न्यूज़ पोर्टल पर मैंने शीर्षक “क्या अन्ना के आन्दोलन प्रायोजित थे?” के अंतर्गत लेख भी लिख चूका हूँ। अन्ना यदि ईमानदार एवं निष्ठावान गांधीवादी है, तो राष्ट्र को बताएं कि जिस चार्टर्ड प्लान से अन्ना पुणे से दिल्ली आए, वह किस कम्पनी का था? किसने उनके आने का खर्चा किया? क्या यह सच नहीं कि उस चार्टर्ड प्लेन में अन्ना के साथ कौन बैठा था? वह व्यक्ति उन्हें क्या मंत्रणा पढ़ा रहा था? क्या यह सच नहीं कि अन्ना के उस प्रदर्शन  को सफल बनाने के लिए पलवल से भीड़ मंगवायी गयी? क्या यह सच नहीं कि इस आंदोलन को सफल बनाने मे कांग्रेसी उद्योगपति पानी की तरह पैसा नहीं बहा रहे थे ? क्या यह सच नहीं के एकता परिषद परिषद के पी. वी. राजगोपाल अन्ना के किसान आंदोलन से अलग हो गए हैं? केरल से गांधीवादी कार्यकर्ता गांधी शांति प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष एवं एकता परिषद के प्रमुख राजगोपाल ने 2011 में ही कहा था कि अन्ना टीम के निर्णयों के उन्हें नहीं पूछा जाता।

national-news-paid-media-03दूसरों के हाथ में खेलने वाली कठपुतली को मीडिया ने बना दिया समाज सेवक। क्या कभी मीडिया ने अन्ना से प्रश्न करने का साहस किया कि  “आखिर क्यों कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही सरकार के घोटालों पर आंदोलन किये?” अन्ना में एक भी आन्दोलन करने का न साहस है और न कभी था। आन्दोलन हुए किसी के इशारे पर। उन NGOs के समर्थन से जिन्हे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। अन्ना के शिष्य अरविन्द एंड पार्टी ने प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री का मुद्दा कितना उठाया, कोई अन्ना से पूछे क्यों नहीं किया आन्दोलन ? अन्ना यदि इतना प्रभावी है तो ममता बनर्जी द्वारा दिल्ली के रामलीला ग्राउंड रैली में वक्ता में नाम होने के बावजूद बीमारी का बहाना कर ग्राउंड में ही नहीं पहुंचे। क्योंकि उस रैली के पीछे कोई NGO नहीं था ,मैदान खाली था।

केंद्र में सत्ता परिवर्तन एवं सख्त प्रशासक होने के कारण केवल चुटकीभर पत्रकारों ने गिरगिट की तरह रंग जरूर बदल लिया, परन्तु कुछ संकोच कर रहे हैं। विजय गोयल ने Paid Media का बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है, पर लगाम लगाने के लिए किसे कह रहे हैं ?


अवलोकन करें :–

*इंडियन मीडिया हिन्दू-विरोधी क्यों है ???

*मीडिया को बिकाऊ क्यूँ कहते हैं?

*मालदा पर खोजी पत्रकार कहाँ छिप गए?

*एन.जी.ओ का मतलब ही भ्रष्टाचार है…!

*कहाँ गए मातम मनाने वाले

*बंगाल के मालदा में कट्टरपंथियों का नंगा नाच

*अन्ना के प्रायोजित आन्दोलन

*कौन हैं, जो कमलेश के नाम पर हंगामे को हवा दे रहे हैं?