राष्ट्रीय पोषण माह अभियान का इतिहास

पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन), भारत का एक प्रमुख कार्यक्रम है, इसका शुभारंभ अगले तीन वर्षों में अल्पपोषण, एनीमिया, विकास में रूकावट और जन्‍म के समय बच्‍चे के कम वज़न के साथ पैदा होने की समस्याओं के समाधान हेतु विशिष्ट लक्ष्य प्राप्ति के लिए छह वर्ष तक के बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की पोषण संबंधी स्थिति सुधारने के लिए 8 मार्च 2018 को किया गया।

समग्र दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिए सभी 36 राज्‍यों/केन्‍द्र शासित प्रदेशों, जिसमें वर्ष 2017-18 में 315 जिलों, वर्ष 2018-19 में 235 जिलों और वर्ष 2019-20 शेष सम्मिलित जिलों को चरणबद्ध तरीके से कवर किया जाएगा। इस कार्यक्रम से दस करोड़ से अधिक लोगों को लाभ होगा।

पोषण अभियान कार्यक्रम न होकर एक जन आंदोलन और भागीदारी है, जिसका मतलब “जन आंदोलन (जन जन का सहयोग आवश्यक)” है। इस कार्यक्रम में व्यापक स्तर पर स्थानीय निकायों, राज्य के सरकारी विभागों, सामाजिक संगठनों और सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों की भागीदारी शामिल है।

पोषण अभियान के तहत राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को महिला और बाल कल्याण, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्रालय, ग्रामीण विकास; पंचायती राज; शिक्षा; खाद्य तथा अन्य संबंधित विभागों के बीच निकट समन्वय के माध्यम से मिलकर लक्ष्य प्राप्त करने ज़रूरत है।

पोषण अभियान को गति देने के लिए भारत की पोषण चुनौतियों पर राष्ट्रीय परिषद ने 24 जुलाई 2018 को सितंबर महीने को ‘राष्ट्रीय पोषण माह’ के रूप में मनाने का फैसला किया है। इस महीने के दौरान पोषण जागरूकता से संबंधित गतिविधियों को सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वित किया जाएगा।

कार्यान्वित विभाग/एजेंसियां जैसे कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से महिला और बाल कल्याण विभाग, आशा, एएनएम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, स्कूल के माध्यम से स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग, पंचायत के माध्यम से पंचायती राज विभाग, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण विकास ‘माह’ के दौरान संदेश प्रसारित करेगा और गतिविधियों का आयोजन करेगें।

परिवर्तन का लक्ष्य किसके लिए है?


पोषण अभियान का लक्ष्य बड़े बच्चों की माताओं, किशोरियों लड़कियों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं, पारिवारिक सदस्यों (पति, पिता, सास) और सामुदायिक सदस्यों, स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं (एएनएम, आशा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता) के बीच महत्वपूर्ण पोषण व्यवहार के बारे में पोषण जागरूकता बढ़ाना है।

प्रमुख पोषण व्यवहार में निम्नलिखित शामिल हैं:

गर्भवती महिलाओं के लिए-

  • आयरन और विटामिन युक्त तरह-तरह के खाद्य पदार्थों से भरपूर संतुलित आहार लें।
  • दुग्ध और दुग्ध उत्पाद एवं आयोडीनयुक्त नमक लें।
  • स्वच्छ एवं सुरक्षित पानी पीएं।
  • प्रसव से पहले कम से कम चार बार निकटतम स्वास्थ्य सुविधा केंद्र से जांच कराएं।
  • आईएफए (आयरन और फोलिक एसिड) टैबलेट और कैल्शियम की निर्धारित (अनुपूरक) ख़ुराक लें।
  • नज़दीकी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पर ही अपना प्रसव कराएं।
  • व्यक्तिगत साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता का ध्यान रखें।
  • खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ अवश्य धोएं।


धात्री महिलाएं-

  • नवजात शिशु को जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान शुरू कराएं।
  • आयरन और विटामिन युक्त तरह-तरह के खाद्य पदार्थों से भरपूर संतुलित आहार लें।
  • दुग्ध और दुग्ध उत्पाद एवं आयोडीनयुक्त नमक लें।
  • रोजाना आईएफए (प्रसव से लेकर छह महीने तक) टैबलेट और कैल्शियम की निर्धारित (अनुपूरक) ख़ुराक लें।
  • स्वच्छ और सुरक्षित पानी पीएं।
  • खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ अवश्य धोएं।
  • बच्चे का शौच निपटाने के बाद और शौच के बाद साबुन से हाथ अवश्य धोएं।
  • व्यक्तिगत और अपने बच्चे की स्वच्छता का ध्यान रखें।


बच्चे –

  • हर नवजात शिशु को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया जाना चाहिए।
  • माताओं को पहले छह महीनों में अपने बच्चे को केवल स्तनपान ही कराना चाहिए।
  • हर शिशु को छह महीने पूरा करने पर स्तनपान के साथ दो वर्ष और उससे अधिक मां के दूध के साथ ऊपरी आहार दिया जाना चाहिए।
  • हर बच्चे को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत पूर्ण टीकाकरण दिया जाना चाहिए।
  • नौ महीने के बाद से अपने बच्चे को विटामिन ए की निर्धारित ख़ुराक (अनुपूरक) और पेट के कीड़ो की दवा/सिरप/टैबलेट (एक वर्ष की उम्र से) वर्ष में दो बार दें।
  • पोषण सलाह के साथ शिशुओं और बच्चों के विकास की नियमित निगरानी रखें।
  • डायरिया/दस्त से पीड़ित बच्चे को पर्याप्त ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन और जिंक की निर्धारित ख़ुराक दी जानी चाहिए।


किशोरियां

  • आयरन और विटामिन युक्त तरह-तरह के खाद्य पदार्थों से भरपूर संतुलित आहार लें।
  • दुग्ध और दुग्ध उत्पाद एवं आयोडीनयुक्त नमक लें।
  • हर सप्ताह आईएफए की नीली टैबलेट लें।
  • व्यक्तिगत साफ़-सफ़ाई और माहवारी स्वच्छता का ध्यान रखें।
  • वर्ष में दो बार पेट के कीड़ों (डिवार्मिंग टैबलेट) से बचने की दवा लें।
  • स्वच्छ एवं सुरक्षित पानी पीएं।
  • खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ अवश्य धोएं।
  • सामुदायिक स्तर पर
  • समुदाय में सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करें।
  • हर घर बच्चे और पशु के मल का सुरक्षित निपटान करें।
  • घर के सभी सदस्य हर समय शौचालय का उपयोग करें।
  • लड़कियों की शिक्षा, आहार और सही उम्र में विवाह प्रोत्साहित करें।
  • स्थानीय उपयोग के लिए समुदाय में सब्जियां उगाए।