तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी 500 एवं 1000 के नोट बंद करने के पक्षधर थे ?

RBL Nigamआर.बी.एल.निगम, दिल्ली ब्यूरो चीफ

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में रहने वाले वकील अवधेश सिंह ने दावा किया कि मनमोहन सिंह की सरकार में 500 और 1000 के नोट को बंद करने का मुद्दा सबसे पहले उन्होंने उठाया था।

जिसको लेकर उन्होंने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के माध्यम से वर्तमान की केंद्र सरकार को तीन पन्ने की चिठ्ठी भी भेजी थी। उनके मुताबिक, भ्रष्टाचार, काला धन, आतंकवाद, रिश्वतखोरी और हवाला के कारोबार को रोकने में 500 और 1000 के नोट बंद करके बड़ा प्रयास किया जा सकता था।

ठंडे बस्‍ते में चली गई थी रिपोर्ट

 99t64nxk अवधेश साल 2009 में जिला शासकीय अधिवक्ता के पद पर थे। उस साल की दीवाली पर हजारों करोड़ की खरीदारी बाजार से हुई थी। इससे प्रेरित होकर उन्‍होंने उस समय सेन्ट्रल बार एशोसियेशन को एक पत्र लिखा था। उस पत्र को बाकायदा प्रस्ताव बनाकर एशोसियेशन ने पारित किया। हालांकि ये रिपोर्ट ठंंडे बस्ते में चली गई थी। इसके बाद यूपी बार काउंसिल ने अपनी मुहर लगाकर तत्‍कालीन पीएम मनमोहन सिंह को भेजा था। दरअसल उस प्रस्ताव में वही सब लिखा था, जिसके लिए अब पीएम मोदी ने 500 और 1000 के नोट पर पाबंदी लगाई है।

UNO में 127 वें नंबर पर था INDIA

अधिवक्ता अवधेश ने इस प्रस्ताव को उस वक्त के UNO द्वारा एक रिपोर्ट के प्रकाशित के आधार पर लिखा था, जिसमें रिपोर्ट में मानवीय आकलन किया गया था। उस रिपोर्ट में भारत 127 वे नंबर पर था। UNO की रिपोर्ट के आधार पर भारत की आधी से अधिक आबादी 20 रुपए से अधिक खर्च नहीं कर पाती। इसी को आधार मानते हुए इस रिपोर्ट ने 500 और 1000 हजार के रुपए को बंद करने का सुझाव भेजा गया था।

फैसले से पूर्व शासकीय अधिवक्ता खुश

rrv77x8tइस रिपोर्ट को कालाबाजारी, रिश्वत खोरी और कालेधन और भ्रस्टाचार पर रोक लगाने के लिए लिखा था। उनका मानना था कि जब देश में आधे से अधिक आबादी 20 रुपए से अधिक खत्म नहीं कर पाती और करीब 10 प्रतिशत लोगों में ही सारे धन रुके हुए हैं, तो ऐसे में ये बड़े नोट बंद कर देने चाहिए। उन्होंने बताया कि मोदी के इस फैसले से पूर्व शासकीय अधिवक्ता काफी खुश हैं। उनका कहना है कि मोदी के पास मेरी रिपोर्ट शायद नहीं पहुची होगी, लेकिन उनका ये फैसला एक बड़ा कदम है, जाे भ्रष्‍टाचार और कालेधन पर लगाम लगाएगा।

यदि मनमोहन सिंह के व्यक्तिगत अनुभव का अवलोकन किया जाने पर यही निष्कर्ष निकालेगा कि “वह एक अर्थशास्त्री होने के नाते भारत की अर्थव्यवस्था को सुधरने के पक्षधर थे, लेकिन रिमोट दूसरे हाथों में होने के कारण अपने अनुभव और योग्यता से भारत का उत्धार करने में पूर्णरूप से असफल रहे।” जिस काम का श्रेय आज नरेंद्र मोदी को मिल रहा है, वह डॉ मनमोहन को मिलना था।

डॉ मनमोहन सिंह काले धन पर अंकुश चाहते थे

0di7jed7नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे डॉ सिंह ने अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए काले धन और टैक्स चोरी रोकने के लिए किये प्रयत्नों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन अल्पमत सरकार होने के कारण उनको आशातीत सफलता तो नहीं मिली,लेकिन असफल भी नहीं हुए। यूपीए सरकार में दो बार प्रधानमन्त्री जैसे पद पर रहते हुए भी काले धन पर कोई कार्यवाही करने में एक पंगु ही सिद्ध हुए, क्योंकि उनका रिमोट किसी और के हाथ था। उनके अध्यादेशों को फाड़ना उनकी बहुत बड़ी बेइज़्ज़ती थी, उस विष को भी उन्हें पीना पड़ा था। आज डॉ सिंह की आत्मा मोदी को सराह रही होगी, कि “मोदी जिस काम को करने में मैं असफल रहा, तुमने कर दिखाया। धन्य हो मोदी।” व्यक्तिगत रूप से डॉ सिंह देश में हो रही कालाबाज़ारी, टैक्स चोरी, भ्रष्टाचार आदि के सख्त विरोधी होने के बाबजूद प्रधानमंत्री होते हुए भी कुछ नहीं कर पाए।

स्मरण आता है, हो सकता है मैं गलती पर हूँ, वित्त मंत्री रहते उनका एक कथन “यदि उद्योगपति बकाया टैक्स एक निश्चित अवधि में जमा कर दे और देश से बाहर जमा काला धन देश में आ जाए, कई वर्षों तक भारत में किसी नए टैक्स की जरुरत नहीं पड़ने के अलावा भारत किसी भी देश का ऋणी नहीं होगा।”  नरसिम्हा राव भी इस मुद्दे पर उनसे सहमत थे, परन्तु अल्पमत सरकार होने के कारण समर्थन नहीं कर पाए, विपरीत इसके वह स्वयं कुछ घोटालों में लिप्त हो गए।