कम्युनिज्म का पोस्टमार्टम

आर.बी.एल.निगम

RBL Nigamकम्युनिज्म हमारी सभ्यता के एेतिहासिक विकासक्रम का काफी महत्वपूर्ण मुकाम रहा है । आज भले ही ये सिद्धांत दुनिया को बदलने का जज्बा लिये जवां होते युवाओं और क्रांतिकारियों को उतना आकर्षित नहीं करता लेकिन एक जमाना था जब इसकों लेकर एक अजीब सा जुनून पूरी दुनिया में छाया हुआ था। खासकर तब 1917 में जब रूसी क्रांति के बाद लेनिन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सत्ता में आए। उसके बाद जोसेफ स्टालिन के नेतृत्व में रूस में जबर्दस्त बदलाव आया। एक पिछड़ा सा लुंजपूंज कृषि प्रधान देश अचानक से औद्योगिकरण की राह में तेजी से आगे बढ़ा। कृषि के क्षेत्र में भी आधुनिकरण के जरिये उत्पादन बढ़ा। सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि सोवियत संघ काफी हथियार जमा कर (खासकर परमाणु) महत्वपूर्ण ताकत बन गया। इससे दुनिया के देशों का शक्ति संतुलन बदल गया।द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले जहां ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान व स्पेन महत्वपूर्ण ताकत हुआ करते थे। अब अमेरिका, सोवियत संघ और चीन जैसे देश नई महाशक्ति के रूप में उभरे। पूरी दुनिया अब दो ध्रुवों में बंट गई। एक तरफ अमेरिका के पीछे आधे यूरोपीय देश और दूसरी तरफ सोवियत संघ के पीछे कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारावाले राष्ट्र। ये दौर सोवियत संघ के विघटन तक चला।

कम्युनिस्ट विचारधारा ने अपने प्रारंभिक दौर में दुनिया भर के मजदूरों और गरीब किसानों के हितों की रक्षा लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। आज कम्युनिस्ट देशों के साथ साथ अन्य पूंजीवादी राष्ट्रों में भी श्रमिकों व कामगारों को जितनी भी सुविधाएं (जैसे काम के तय घंटे, साप्ताहिक अवकाश, समय पर वेतन, महिलाओं को समान काम के लिए समान वेतन, बोनस, ग्रेच्यूटी और हड़ताल करने के अधिकार को मान्यता आदि) मिले हैं उनके लिए कम्युनिस्टों ने जोरदार आंदोलन चलाए थे। औद्योगिक व अन्य प्रतिष्ठानों में हड़ताल को हथियार बनाकर काफी संघर्ष कर मजदूरों के हितों में कानून बनाने के लिए सरकारों को मजबूर किया है। इसके लिए इनका शुक्रगुजार होना ही चाहिए। कम्युनिज्म रहे या न रहे श्रमिक वर्ग सदैव ऋणी रहेगा। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब से कम्युनिज्म धरातल में आना शुरू हुआ श्रमिक अधिकारों का हनन भी शुरू हो चूका है। अनुबन्ध सिस्टम लागू होने से श्रमिकों को नहीं मालूम भविष्य में कितना बड़ा नुकसान होने वाला है।

वहीं कम्युनिज्म के सिद्धांत में कई मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं जिसकी वजह से इस सिद्धांत का असफल होना लगभग तय ही था। सबसे पहला सरकार किसी भी देश की पूरी संपत्ति पर कब्जा कर ले और फिर खुद ही उद्योग-धंधों सहित सारी आर्थिक व्यवस्था का भी संचालन करे। यह सिद्धांत काफी अव्यवहारिक है। सरकार का काम किसी भी अर्थव्यवस्था को नागरिकों के हितों का ध्यान रखते हुए नियंत्रण और रेगुलेशन तक ही सीमित होना चाहिए।

दूसरा निजी संपत्ति की अवधारणा को खत्म करना असंभव सा काम कम्युनिस्टों ने करना चाहा। कम्युनिस्ट देशों में आम लोगों से तो संपत्ति का अधिकार कम्युनिस्टों ने छीन लिया लेकिन पार्टी और सरकार के लोगों ने अकूत संपत्ति जमा कर ली। खासकर सोवियत संघ और चीन में आपको इसके एक से बढ़कर एक शानदार नमूने मिल जाएंगे। मेरी राय में निजी संपत्ति के अधिकार को खत्म करना संभव नहीं है। आप छोटे से कम्यून में ऐसा कर सकते हैं लेकिन पूरे राज्य देश में ऐसा करना असंभव और मानव के मनोभावों के विपरित है।

कम्युनिस्टों की सबसे खतरनाक बीमारी

कम्युनिस्ट विचारधारा की पार्टियां जिस किसी देश में सत्ता में आतीं हैं उनकी खुली मंशा रहती है कि सत्ता पर उनका कब्जा अनंत काल तक बना रहे। ये बहुत ही खतरनाक बात है आम लोगों के लिए। इसका साफ मतलब है कि इनको लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है। ये जनता को अपने शासक चुनने का अधिकार नहीं देना चाहते। महज नाम के लिए ही चुनाव कराए जाते हैं। नागरिकों को कम्युनिस्ट पार्टियों के उम्मीदवारों में से ही किसी को चुनना पड़ता है। ये राजाओं और साम्राज्यवादी शासकों की ही तानाशाही का बदला हुआ रूप है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं

कम्युनिस्टों की ये एक और खतरनाक बीमारी है। ये खुद तो इसका लाभ लेकर अपनी विचारधारा का प्रसार और आंदोलनकारी गतिविधियां चलाएंगे, लेकिन जैसे ही ये खुद सत्ता में आसीन होते हैं पता नहीं क्यों उन्हें इस अधिकार पर पूर्ण रूप से रोक लगाने का भूत सवार हो जाता है। ये कम्युनिज्म को छोड़कर अन्य किसी विचारधारा की चर्चा तक बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।

इन सारी कमियों के बावजूद कम्युनिस्ट सरकारों ने कई पिछड़े और अविकसित राष्ट्रों में कई क्षेत्रों में शानदार काम किया है। खासकर सोवियत संघ, चीन और क्यूबा जैसे राष्ट्रों में आम लोगों के लिए शिक्षा, चिकित्सा, खेल और अन्य नागरिक सुविधाओं के क्षेत्र में। इसकी भी तहेदिल से तारीफ होनी चाहिए।

भारत में कम्युनिस्ट पार्टियां

इन पार्टियों ने पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में काफी लंबे अर्से तक शासन भी किया है। इन्होंने कुछ अच्छे काम भी किए हैं। खासकर बंगाल में भूमिसुधार ने इनको लगातार तीन दशक तक शासन करने का मौका दिया था।परन्तु अब बंगाल में इस पार्टी का सत्ता में आना असम्भव ही लगता है। कांग्रेस के साथ मिल कर जरूर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा सकती हैं। लेकिन अब कांग्रेस भी शनै-शनै सिकुड़ती जा रही है। त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य में भी माणिक सरकार जैसे ईमानदार नेता ने अच्छा काम किया है। लेकिन ये पार्टियां अपनी कई कमजोरियों की वजह से बस इन्हीं राज्यों में सिमट कर रह गई। सत्ता में रहने से भी कई कम्युनिस्ट नेता भी अन्य पार्टियों के नेताओं की तरह भ्रष्ट तरीके अपनाकर निजी संपत्ति खड़ी करने के जुगाड़ में लग गए।

भारत के राजनैतिक पटल पर देखा जाये तो कम्युनिस्ट पार्टी ही सबसे पुरानी या यूँ कहा जाए सबसे वृद्ध पार्टी है। कुछ लोगों का इस पार्टी पर यह भी आरोप लगता है कि स्वतन्त्रता संग्राम में भी इस पार्टी की संदिग्ध भूमिका रही है। आज भारत में मुस्लिम अधिकारों के लिए संघर्ष करते है, लेकिन चीन में पार्टी का मत एकदम विपरीत है। यूरोप से कही अधिक चीन में ही मुस्लिमों पर अंकुश लग रहे हैं। कुल मिलाकर अब तो भारत में तो कम्युनिस्ट पार्टियों की कहानी खत्म हो चुकी है। पार्टी का राष्ट्रीय अस्तित्व ही खटाई में पड़ चूका है। यह भी सम्भावना है कि भारत में एक-दो और चुनाव के बाद क्षेत्रीय पार्टियाँ इस पार्टी से कहीं अधिक प्रभावी हो सकती हैं।लोकसभा और राज्य सभा में भी इस पार्टी की गणना लगभग शून्य ही होने की सम्भावनाएं अधिक प्रबल होती दिख रही हैं। अनुमान है, मिथ्या भी हो सकता है। देश में एक से बढ़कर एक राजनीतिज्ञ विद्दान एवं पण्डित हैं, विख्याय करने को। मेरे अनुमान को गलत सिद्द कर दें कोई बड़ी बात नहीं।