कैसे गृहमंत्री थे चिदंबरम?

संप्रग सरकार के अपराधों की सजा क्या हो?

आर.बी.एल.निगम

RBL Nigamजब देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार मंत्रालय आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने वालों को फंसाने का षड़यंत्र करे तो उसकी सुरक्षा की क्या दशा होगी इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। बटला हाउस में शहीद हुए पुलिस अधिकारी ‌ मोहन चन्द्र शर्मा  पर शोक करने की बजाय, उस एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादियों पर जब कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी आंसू बाहें, वह सरकार देश को आतंकवाद से कैसे मुक्त करवा सकती थी ? यह चिदंबरम ही बताएं कि पूरी संप्रग सरकार के अपराधों की सजा क्या हो?

अब यह किन्तु परन्तु से परे एक तथ्य है कि गृहमंत्री के रूप में पी. चिदंबरम ने इशरत जहां को 2009 में स्वच्छ चरित्र का प्रमाण पत्र स्वयं दिया था। न उसमें गृह सचिव की कोई भूमिका थी और न ही महाधिवक्ता की। भले चिदंबरम जो दावा करें लेकिन फाइल सामने आने के बाद उनके पाक साफ होने का दावा ध्वस्त हो जाता है। क्या कारनामा है? आप उसी इशरत जहां को न्यायालय में सौंपे शपथ पत्र में लश्कर का फिदायीन आतंकवादी बताते हैं और एक महीने के अंदर ही उसे स्वयं पाक साफ होने का प्रमाण पत्र दे देते हैं।

national0627416गुजरात उच्च न्यायालय में 6 अगस्त 2009 को जो शपथ पत्र दाखिल हुआ उसमें स्पष्ट रूप से इशरत जहां और उसके साथियों को लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी कहा गया था। बाद में इस शपथपत्र को वापस ले लिया गया एवं 30 सितंबर 2009 को दूसरे शपथपत्र में कहा गया कि इशरत जहां और उसके साथियों के आतंकवादी होने के कोई ठोस सुबूत नहीं हैं। तत्कालीन गृह सचिव जीके पिल्लई ने कहा था कि दूसरे शपथ पत्र का फैसला राजनीतिक स्तर पर लिया गया होगा जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं था। हालांकि यह तो संभव नहीं है कि जो फैसला हो रहा हो उसकी जानकारी गृहसचिव को हो ही नहीं, किन्तु यह उनके स्तर पर नहीं हुआ यह फाइल से स्पष्ट है।

चिदंबरम ने पिल्लई के बयान के बाद यह सफाई दी थी कि उन्होंने तो केवल उसमें कुछ संपादकीय परिवर्तन किए थे। यानी यहां कॉमा होगा, वहां पूर्ण विराम होगा, इस शब्द की जगह फलां शब्द बेहतर होगा आदि आदि। उनकी यह सफाई सफेद झूठ थी। उन्होंने स्वयं दूसरा शपथपत्र भी बनवाया एवं हस्ताक्षर किए तो चिदंबरम के इस अपराध की सजा क्या है?अपराध इसलिए कि अमेरिका में गिरफ्तार एवं हमारे पास लश्कर की आंतरिक जानकारी देने वाले एकमात्र गवाह डेविड कोलमेन हेडली ने अपनी गवाही में यह बता दिया कि इशरत जहां लश्कर की फिदायीन आतंकवादी दस्ते का हिस्सा थी।

निश्चय ही यह जानकारी गृहमंत्री होने के नाते पी. चिदंबरम के पास थी। ऐसा न होने का कोई कारण नहीं था। खुफिया ब्यूरो या आईबी के इनपुट्स इस बारे में थे। उस इनपुट्स के आधार पर गुजरात पुलिस ने कार्रवाई की तथा 15 जून 2004 को अहमदाबाद में इशरत की तीन अन्य साथियों के साथ गोली लगे शव पाए गए। गुजरात पुलिस का दावा है कि उनके साथ मुठभेड़ हुई जिसमें वे मारे गए। आईबी भी यही मानती है। इसके विपरीत विरोधियों का कहना है कि उन्हें पकड़कर गुजरात पुलिस ने गोली मार दी और उसे मुठभेड़ बता दिया। मूल विषय यह है कि इशरत जहां का आतंकवाद से रिश्ता था या नहीं? अभी तक जितने मान्य प्रमाण हमारे सामने हैं उसके अनुसार उसके सहित अन्य तीनों साथियों का चरित्र संदेह के घेरे में आता है। तब भी आईबी की रिपोर्ट यही थी।

national0527416जब एनआईए के सदस्य अमेरिका गए एवं हेडली से पूछताछ की उसमें भी यही सामने आया और अब उसकी मुंबई के विशेष न्यायालय में दी गई गवाही में भी। समस्या यह है कि जिस फाइल में उन्हें पाक साफ साबित किया गया उसके 28 पन्ने गायब हैं। उनमें हो सकता है अन्य विभागों के पत्र और उसके जवाब हो। उनका विश्लेषण तथा निष्कर्ष हो। प्रश्न है कि वे पन्ने गायब कैसे हो गए? इसका सरल उत्तर तो यही हो सकता है कि जब इस पर देश में हंगामा मचा, दूसरे तथ्य आने लगे तो फिर उस फाइल के उन हिस्सों को गायब कर दिया गया जिनसे इसकी विस्तृत जानकारी मिले तथा इशरत को निदरेष होने का प्रमाण पत्र देने वाले कठघरे में खड़ा न हो सकें। उन 28 पन्नों का गायब होना भी अपराध है।

गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा है कि उनको कोई सजा तो नहीं दी जा सकती लेकिन उन्होंने बहुत गलत किया। बहुत गलत छोटा शब्द है। दरअसल, चिदंबरम ने देश के साथ अपराध किया। गृहमंत्री के नाते जिस व्यक्ति पर आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी है वह राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए किसी आतंकवादी को निदरेष साबित करने लगे और इसके लिए अपने पद का दुरुपयोग करे तो इससे बड़ा अपराध क्या हो सकता है? वह पूरा ऑपरेशन आंतरिक सुरक्षा का ऑपरेशन था। यदि राज्य की सामान्य कानून व्यवस्था का ऑपरेशन होता तो उसमें केंद्रीय खुफिया ब्यूरो की कोई भूमिका नहीं होती।

आंतरिक सुरक्षा के मामले से किस तरह निपटा जाता है इसकी जानकारी चिदंबरम को अवश्य होगी। वे गृहमंत्री तो रहे ही इसके पहले राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में आंतरिक सुरक्षा का प्रभार भी उनके ऊपर था, तो चिदंबरम ने एक पूरे ऑपरेशन को मटियामेट करने का काम किया गया। पिल्लई ने अपने बयान में कहा था कि यह आईबी का बहुत सफल ऑपरेशन था। आईबी ने अपने व्यक्ति को उन आतंकवादियों के गैंग में शामिल कराया जिससे पूरी सूचना मिलती रही।

national0427416आतंकवादी उसे अपना आदमी मानते रहे और हम उनकी हर गतिविधि पर नजर रखे रहे। यह सामान्य काम नहीं था। कल्पना करिए, जो व्यक्ति शामिल हुआ होगा उसने कितना बड़ा जोखिम उठाया होगा। खैर, उनसे प्राप्त सूचनाओं से साफ हो गया था कि उनका एक निशाना एक राजनीतिक नेता थे, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। इसकी पूरी जानकारी गृहमंत्रालय के पास थी। क्यों ऐसा किया गया इसका जवाब तो देश चाहेगा। वास्तव में दूसरे शपथपत्र के बाद ही मामले को सीबीआई को जांच के लिए सौंपने का आधार बना। इस तरह दूसरा शपथपत्र एक षडयंत्र का हिस्सा लगता है जिसमें गुजरात सरकार और उसके अधिकारियों को फंसाने की तैयारी थी। क्या शर्मनाक स्थिति थी? याद करिए उस समय देश की दो प्रमुख संस्थाएं सीबीआई और आइबी आमने-सामने आ गई थीं।

क्या चिदंबरम के नेतृत्व में गृह मंत्रालय इस तरह से काम कर रहा था? जब देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार मंत्रालय इस तरह आतंकवाद से मुकाबले की जगह उसमें कार्रवाई करने वालों को फंसाने का षडयंत्र करे तो उसकी सुरक्षा की क्या दशा होगी इसकी कल्पना करिए। जो मानवाधिकारवादी छाती पीट रहे थे वे अमेरिका से यह पूछने नहीं गए कि जब ऑपरेशन के बाद उसके पास ओसामा बिन लादेन को पकड़ने का विकल्प था तो उसने उसे मार क्यों दिया? मारा भी तो उसे इज्जत से दफनाया क्यों नहीं? आतंकवादियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए। अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के हमले का जिस तरह बदला लिया वह एक राष्ट्र की संकल्प शक्ति को दर्शाता है। वहां पक्ष-विपक्ष में इस पर कोई मतभेद नहीं। हमारे यहां तो पक्ष यानी सरकार ही आतंकियों के पक्ष में खड़ी हो गई थी। इसलिए आज यह पूछना ही पड़ेगा कि चिदंबरम और विस्तारित करें तो पूरी संप्रग सरकार के अपराधों की सजा क्या हो?


अवलोकन करें :-

*पहले सरकार तो जागे!
*बेनकाब होती कांग्रेस
*कांग्रेस के राज में लोकतंत्र का क़त्ल

Add-top-today