अदालत ने 2002 के दंगा पीड़ितों के रिश्तेदारों द्वारा 3 दीवानी मामले में से नरेंद्र मोदी का नाम हटा दिया

अहमदाबाद: गुजरात के साबरकांठा जिले की एक तालुका अदालत ने शनिवार को निर्देश दिया कि 2002 के दंगा पीड़ितों के रिश्तेदारों द्वारा स्थानांतरित किए गए तीन दीवानी मामले के प्रतिवादि यों में से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम हटा दिया जाए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, तालुका अदालत ने यह आदेश प्रधानमंत्री मोदी के वकील द्वारा एक आवेदन पेश किए जाने के बाद दिया.

अदालत के मुख्य वरिष्ठ दीवानी जज एसके गढ़वी ने इस आधार पर प्रतिवादी के रूप में प्रधानमंत्री मोदी का नाम तीन मामलों से हटा दिया कि वादी उन्हें मामले में घसीटने की कोशिश कर रहे थे और यह कि वादी ने मोदी के खिलाफ ‘केवल सामान्य, गैर विशिष्ट और अस्पष्ट’ आरोपों पर भरोसा किया और यह स्थापित करने के लिए कोई सामग्री नहीं लाई गई कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी अपराध की जगह पर मौजूद थे.

मुआवजे के लिए ये दीवानी मामले पीड़ितों के परिजनों, शिरीन दाऊद, शमीमा दाऊद (दोनों ब्रिटिश नागरिक) और इमरान सलीम दाऊद द्वारा दायर किए गए थे.

मोदी के अलावा जिन अन्य पक्षों के नाम जवाब दाखिल करने वालों में शामिल किए गए थे, उनमें वे छह आरोपी भी शामिल हैं, जिन्हें विशेष अदालत से रिहा किया जा चुका है. इनमें गुजरात के पूर्व गृहमंत्री गोवर्धन जदाफिया, दिवंगत डीजीपी के. चक्रवर्ती, गृह विभाग में पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक नारायण, दिवंगत आईपीएस अधिकारी अमिताभ पाठक, तत्कालीन इंस्पेक्टर डीके वनिकर और राज्य सरकार शामिल हैं.

बता दें कि उस समय 18 साल के रहे ब्रिटिश नागरिक इमरान सलीम दाऊद 28 फरवरी, 2002 को ब्रिटेन में रहने वाले अपने रिश्तेदारों- सईद दाऊद, शकील दाऊद और मोहम्मद असवत के साथ भारत की अपनी पहली यात्रा पर आए थे. चारों ने जयपुर और आगरा का दौरा किया था और साबरकांठा जिले के प्रांतिज के पास अपने पैतृक गांव लाजपुर लौट रहे थे, जहां एक भीड़ ने उनका रास्ता रोक दिया और उनके चार पहिया वाहन में आग लगा दी.

सईद और असवत के साथ उनके गुजराती ड्राइवर यूसुफ पिरगहर की हत्या कर दी गई, जबकि शकील लापता हो गए. यह माना गया कि उनकी मृत्यु हो गई. प्रांतिज ब्रिटिश नागरिकों की हत्या का मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि इसमें विदेशी राजनयिकों को वीडियो-कॉन्फ्रेंस के माध्यम से गवाहों के रूप में पेश किया गया था.

5 सितंबर के अपने आदेश में तालुका अदालत ने कहा कि प्रासंगिक समय में एक भी ऐसा मजबूत साक्ष्य नहीं है जो कि अपराध के दौरान प्रतिवादी नंबर 1 (मोदी) की उपस्थिति दिखाता हो या या कथित कार्रवाई में उसकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी या किसी विशिष्ट भूमिका जिसमें दुर्भावनापूर्ण या जान-बूझकर कार्य या चूक के लिए उचित आधार है, इसलिए किसी भी कानूनी अधिकार या राहत का दावा करने के लिए वादी को हकदार पाया जा सकता है.

इस आदेश में यह भी कहा गया है कि पीड़ितों के रिश्तेदारों ने किसी भी तरह से यह नहीं बताया था कि मोदी तत्कालीन राज्य सरकार के अधिकारियों के कथित कृत्यों या चूक के लिए व्यक्तिगत रूप से कैसे उत्तरदायी हैं.

आदेश में आगे कहा गया, सभी पूर्व और गोधरा की घटनाओं के बाद से प्रतिवादी नंबर 1 (मोदी) को जोड़ने के लिए वादी ने अपने बयान में चतुराई दिखाई है और इस तरह प्रतिवादी नंबर 1 (मोदी) को अपराध के साजिशकर्ता के रूप में पेश किया गया है, जो उसे मुआवजे के लिए उत्तरदायी बनाता है. मेरे विचार में बिना किसी आधार के इस तरह के लापरवाह आरोप शायद ही मोदी के खिलाफ कार्रवाई करने में मदद कर सकते हैं.

इस बीच अपने वकील एसएस शाह के माध्यम से मोदी द्वारा दिए गए आवेदन का पीड़ित ब्रिटिश नागरिक के बेटे इमरान सलीम दाऊद ने तीन वादियों की तरफ से जोरदार विरोध किया था. सलीम ने यह भी कहा कि उनके वकील अनवर मलिक ने बताया कि वह दाऊद का केस आगे नहीं लड़ पाएंगे, क्योंकि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.

मोदी की ओर से पेश होते हुए शाह ने कहा कि यह मुकदमा मोदी को एक पक्षकार बनाकर साल 2004 से ही चल रहा है जबकि पक्षकार के रूप में उनका इसमें न शामिल होना कोई आवश्यक नहीं है. उन्होंने कहा कि सलीम के आरोप राजनीतिक स्वभाव के थे, जिन्हें वैसे भी नानावटी आयोग की जांच में संबोधित किया गया था.

न्यायाधीश इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वादी इस आधार पर कार्यवाही में देरी करने की कोशिश कर रहे हैं कि सलीम ने मुकदमे की सुनवाई किए गए जाने के अधिकार क्षेत्र को लेकर लड़ाई लड़ी थी.

मोदी सहित अन्य प्रतिवादियों पर कर्तव्यों का निर्वहन करने में नाकाम रहने का आरोप लगाते हुए 22 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की गई थी.