मोदी सरकार का भ्रष्टाचार पर कुठाराघात

सरकार ने अख़बारों पर डाली नकेल

RBL Nigamआर.बी.एल.निगम, दिल्ली ब्यूरो चीफ

इस लेख का शीर्षक लिखा ही था कि प्रधानमंत्री मोदी द्धारा 500 और 1000 के नोट बंद करने का समाचार सुनते ही मेरे शीर्षक को सार्थक सिद्ध कर दिया।  प्राप्त समाचार के अनुसार, पिछले चार महीनों में कोई दो हजार अखबारों को केंद्र सरकार के डीएवीपी ने विज्ञापन के लिए अमान्य किया है। संसद में बिना पीआरबी एक्ट बदले, उसमें बिना संशोधन लाए सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने अखबारों को ऐसे नए नियमों-कायदों-फंदो में फांसा है कि वे घुट कर अपने आप दम तोड़ेंगे। भारत सरकार ने यानि मोदी के पीएमओ ने जून से लेकर इस दिसंबर तक चुपचाप कार्रवाई का जो खांका बनाया है उसमें इस साल का इरादा 8 हजार अखबारों में से 4 हजार अखबारों को अमान्य बनाना है। यदि वास्तव में मोदी सरकार यह काम कर रही है, यह अख़बारों के नाम पर चल रहे फर्जीवाड़े पर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार पर कठुराघात है। गम्भीरता से जाँच करने पर पता नहीं अभी और कितने अख़बार एवं पत्र-पत्रिकाएँ लपेटे में आएँगी। अखबार फर्जीवाड़े के समाप्त होने से भ्रष्टाचार पर भी नकेल पड़ेगी।  साथ ही अखबार मालिकों पर फर्जीवाड़े की, हर साल दस तरह के चक्कर लगवाने की तलवार लटका दी है। अखबार मालिकों को रजिस्ट्रार, न्यूजपेपर के यहा सर्क्युलेकशन का प्रमाणीकरण कराने को मजबूर किया है। मतलब सरकारी दफ्तर और ‘गांधीजी’! देश के हर प्रकाशक-संपादक को हर महीने सरकारी दफ्तर में टोकन ले कर अखबार की फाईल सबमिट करनी पड़ रही है।

लगे रहो मोदी भाई, भ्रष्टाचार की एक नब्ज और पकड़ी 

यदि वह वहां पटा कर चला या रिश्वत दी तो ठीक नहीं तो भारत सरकार के दिल्ली के डीएवीपी दफ्तर में रिपोर्ट पहुंचेगी कि पिछले महीने अखबार पूरे नहीं थे या सही नहीं छपे। इस रिपोर्ट से फिर तय होगा कि इस अखबार को आगे विज्ञापन देना है या नहीं! रिपोर्ट यदि नहीं भेजी, या यदि यह लिख कर आया कि अखबार ठीक नहीं है तो विज्ञापन मिलना बंद। इसमें यों नियमितता की कसौटी बहाना है। मगर आश्चर्य नहीं कि जैसे पिछले छह महीनों में चुपचाप एक के बाद एक सिकंजा कसा है वैसे आगे अखबार को ले कर यह रिपोर्ट बनने लगे कि नरेंद्र मोदी और राष्ट्रहित की खबरों में अखबार से कोई चूक तो नहीं है? अखबार सरकार विरोधी है या पक्ष का? वैसे प्रधानमन्त्री मोदी को गालियों यानि विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता, बशर्ते गालियां अथवा विरोध तर्कसंगत हों।

यह काम चुपचाप होगा। इसलिए कि सरकारी दफ्तर में बनी, या वहां से भेजी गई मासिक रिपोर्ट की जानकारी प्रकाशक को देने के लिए सरकार या पीआईबी बाध्य नहीं है। अखबार मालिक लगातार परेशानी में रहेगा। पता नहीं क्या रिपोर्ट गई, अफसर ने अखबार को कैसे जांचा? आगे विज्ञापन मिलता है या नहीं?

यह काम पिछली सरकारों को करना था

x0idljymविद्याचरण शुक्ल ने भी सूचना मंत्री रहते पीआईबी, डीएवीपी से डंडा चलाने का ऐसा खौफ पैदा नहीं किया जैसा आज नरेंद्र मोदी, उनके दफ्तर और उनके पूर्व सूचना मंत्री अरुण जेटली ने करवा कर दम लिया है! क्योंकि पिछली सरकारों तक सबको चिन्ता थी, केवल अपनी पार्टी और सरकार की वाहवाह करती ख़बरों की। अब चिन्ता है राष्ट्र की और भ्रष्टाचार दूर करने की। इस कढोर कदम से देश में फैले भ्रष्टाचार पर भी नकेल पड़ेगी।

मगर अखबार बंद कराने, प्रेस और पत्रकारों को अमान्य कराने, मीडिया को ही खत्म करने के संस्थागत काम नहीं हुए थे तो इमरजेंसी में खबर पर रोक थी, सरकार के विरुद्ध किसी भी समाचार के प्रकाशित होने पर। इमरजेंसी में Motherland, Organiser, पाञ्चजन्य और संघ द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाएँ क्यों बंद हुई? जबकि 1972 में शिमला समझौते के दौरान शिमला रह रही तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी केवल Motherland के लिए क्यों जहाज से मंगवाती थी। इमरजेंसी लगाते ही Motherland के लेकिन नरेंद्र मोदी, उनके प्रधानमंत्री दफ्तर में बैठे जगदीश ठक्कर और गुजरात से आए मीडिया प्रबंधकों ने अरुण जेटली की सहमति से जून-जुलाई में अखबारों को, प्रेस को खत्म करने का जो चाक चौबंद बंदोबस्त किया है यदि उसका प्रतिकार नहीं हुआ, तो लिख कर रखें कि 2019 के आते-आते देश में डीएवीपी के 8 हजार में से 7000-7500 हजार अखबार बंद होंगे और जो 500 बचेंगे वे वैसे बड़े अखबार होंगे जिनकी खुद की प्रिंटिग प्रेस है और जिनके मालिकों को प्रधानमंत्री निवास बुलाकर हड़काया जा सकता है। इस साहसिक कार्य के साथ सरकार को अख़बारों में प्रकाशित होने वाले विज्ञापन और समाचारों के औसत पर भी ध्यान देना होगा। जो मापदंड पिछली सरकारों द्धारा तय किये गए हैं उनको क्रियांविन्त करवाना होगा। कई दैनिक ऐसे है जिनमे समाचार कम और विज्ञापनों के भरमार होती है।

1btc9hp3इसमें हर अखबार, हर प्रकाशक-संपादक को सरकार के आगे नाक रगड़ना है। जान लें कि दुनिया के किसी भी लौकतंत्र में सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह हर महीने अखबार का रिकार्ड तलब करें। सरकार, सरकारी विभाग से सर्क्युलेशन चैक कराए। हर महीने अधिकारी अखबार को जांच करके रिपोर्ट भेजे कि अखबार छपा या नहीं, सही है या नहीं! दुनिया के किसी लौकतंत्र में ( अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी की बात तो दूर पाकिस्तान में भी) यह खोजने पर मालूम नहीं हुआ कि सरकार ने विज्ञापन के बहाने, अखबार के प्रसार को जंचवाने, उसकी नियमितता पर नजर रखने के लिए सरकारी बाबूओं की दुकानदारी लगवा रखी है। विकसित लोकतन्त्र  में सब कुछ प्रोफेशनल बॉडीज काम करती है।

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी में अफसर सेंसर अधिकारी बन कर खबर पर निगरानी रखते थे। अखबार में खबर रोकते थे मगर अखबार को बंद कराने, खत्म करने के जतन नहीं थे। मगर नरेंद्र मोदी और उनका सेटअप क्योंकि गुजराती धंधे की तासीर लिए हुए है इसलिए उसने इमरजेंसी से भी अधिक प्रभावी तरीका, नुस्खा पेट पर लात मारने का अपनाया है। इस नुस्खे के तीन उद्देश्य है- 1- छोटे और मध्यम श्रेणी के अखबारों की भीड़ खत्म हो। 2- इनको खत्म करके इनके हिस्से के बचे सरकारी विज्ञापनों को 50-60 बड़े अखबारों में बांटे। जब संख्या कम होगी, तो पैसे का बंटवारा ज्यादा होगा और मालिकों को मैनेज करना भी आसान। 3- फिर अखबारों की भीड़ से आज शहर-गांव, राजधानी में पत्रकारों की जो मान्यता प्राप्त भीड़ है उसे मिटाना तीसरा मकसद है।

अभी यदि 2 हजार अखबार डीएवीपी ने विज्ञापन देने की लिस्ट से बाहर निकाले हैं और मार्च तक हजार-दो हजार और अमान्य होंगे तो आगे ये राज्यों में भी अमान्य होंगे। फिर उससे संपादकों-पत्रकारों की मान्यता भी रद्द होगी। भारत सरकार के पीआईबी और राज्यों के डीपीआरओ में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की आज जो हजारों की संख्या है वह सैकड़ों में सिमटेगी।

इन तीन उद्देश्यों पर पीएमओ ने सूचना-प्रसारण मंत्रालय से 7 जून 2016 को आदेश संख्या एम-24013/90/2015-एमयूसी के जरिए नई विज्ञापन नीति घोषित कराई। हिसाब से यदि नई नीति बननी थी तो सभी स्टेकहोल्डर से बात करनी थी। ड्राफ्ट पर सार्वजनिक बहस करानी थी। ऐसा कुछ नहीं हुआ। सीधे आदेश हुआ और अखबारों को नई नीति के अनुसार अपनी मान्यता, अपना विज्ञापन बचाने के लिए दौड़ा दिया।

ध्यान रहे भारत के अखबार संसद से पास पीआरबी एक्ट से नियंत्रित है। इस एक्ट और उसके बाद बने नियम में जो लिखा है वही कानून है। लेकिन इस सरकार ने बिना संसद में संशोधन या दुबारा कानून बनाए ही अखबार मालिको, प्रेस पर ऐसे नए नियम थौपे हंै जो सौ फीसद गैर-कानूनी बनते हैं। जैसे प्रिंटिग प्रेस को लेकर अखबार के लिए नियम है कि वह अपनी प्रेस का घोषणापत्र डीएम के आगे एक बार दे। उसका फिर अखबार के घोषणापत्र में जिक्र और प्रूफ हो। ऐसे ही प्रकाशक को सामान्य डाक से अखबार की छपी प्रति आरएनआई को भेजने का नियम है। फिर साल में एक बार अखबार के प्रसार का सालाना रिटर्न भरना होता है। इस कानून, नियम व्यवस्था के संचालन की संस्था का नाम है आरएनआई।

इस एक्ट व कायदे में अंग्रेजों के वक्त से ले कर इस पंद्रह अगस्त तक भारत के अखबार फले-फूले हुए थे। मगर मोदी सरकार ने बिना कानून बदले डीएवीपी (जिसका पीआरबी एक्ट से मतलब नहीं है) की नई विज्ञापन नीति बनवा कर प्रकाशक को इस बात के लिए मजबूर किया है कि वह अखबार की पूरी फाइल ले कर अखबार की नियमितत्ता, क्वालिटी, देश हित में होने या न होने की जांच कराने के लिए राज्य राजधानी या दिल्ली जा कर खुद सबमिट करें। और वह भी हर महीने। दूसरा यह कि वह प्रिंटिग प्रेस का तकनिकी ब्यौरा देते हुए प्रिंटर से उसकी तरफ से एफिडेविट दिलवाए कि वह उस अखबार की प्रतिदिन कितनी कॉपियां छाप रहा है तभी अखबार विज्ञापन के लिए रिन्यू होगा।

घ्यान रहे पीआरबी एक्ट में प्रेस क्या, कैसा, किस-किस अखबार को वह छापता है, किसकी कितनी प्रतियां छापने की जानकारी देने का कहीं कोई उल्लेख-नियम नहीं है। अंग्रेजों के वक्त भी व्यवस्था सिर्फ यह थी कि जिसे अखबार छापना है वह उसकी और प्रिंटिग प्रेस होने की दो घोषणाएं डीएम के सामने एक बार कर दे। तब गणेशशंकर विद्यार्थी अपने छोटे अखबार के फर्रे को प्रमाणित करने के लिए, सबमिट करने के लिए अंग्रेज डीएम के आगे हर महीने चक्कर नहीं लगाते थे। इसलिए कि अंग्रेज ब्रिटेन के लौकतंत्र को फोलो करते थे और जान ले ब्रिटेन में आज भी अखबार और उसकी विज्ञापन नीति में एक भी वह बात नहीं है जिसे मोदी के पीएमओ ने पिछले छह महीनों में बिना कानून संशोधन और बहस के बनवा दिया है।

क्यों? क्योंकि मोदी और उनके पीएमओ में गुजरात से आया स्टॉफ बारह साल यह भुगतता रहा कि अखबारों ने उन्हें बहुत तंग किया। ये सोचते हैं  कि अखबार के नाम पर सब ब्लेकमेलर हैं। फर्जी पत्रकार और उनका फर्जीवाड़ा है। कुकुरमुत्तों की तरह अखबार और पत्रकार उग आए है। यह ऐसी कांग्रेसी घास है जिसे जड़ से उखाड़ फेंकना है। इससे किसी को शिकायत भी नहीं होनी चाहिए। पिछली सरकार के काल तक इतने समाचार-पत्र रजिस्टर्ड हो चुके थे, जिनमें से अधिकतर के तो जनता ने नाम भी नहीं सुने होंगे।

हैरानी की बात है कि मात्र 500 की संख्या में प्रकाशित अख़बारों को सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं। न्यूजप्रिंट मिल रहा है, झूठी ऑडिट रिपोर्ट दे-देकर, गाँधी बाबा मुद्रा की जय। बस नेताओं से लेकर मंत्रियों तक अख़बार पहुँच जाए, फिर जनता की समस्या लेकर पहुँच गए मंत्रीजी के पास। मंत्रीजी ने भी पत्रकार को सम्मान की आड़ में खेल गए दांव। मुसीबत मारे से गाँधी बाबा की मुद्रा लो, मंत्री, संतरी, नेता और अपनी तिजोरी भरना ही इनका उद्देश्य है। अख़बार छप किसी प्रेस में रहा है और नाम किसी और प्रेस का छापा जा रहा है। रोज़गार समाचार पत्र में प्रकाशित होने से पूर्व ही इन सम्पादकों-प्रकाशकों के पास सरकारी कार्यलयों में रिक्त-स्थानों की सूची पहले आ जाती है। अक्सर सोशल मीडिया पर अध्यापकों के शिक्षा-स्तर पर प्रश्न-चिन्ह लगाते वीडियोस जो अपलोड किये जाते हैं, उनकी भर्ती इन्ही फर्जी अख़बारों के सम्पादकों द्धारा ही करवाई गयी होगी। पिछली सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक कोई नेता या मन्त्री इस आरोप से इंकार नहीं कर सकता।

तभी आज सचमुच गणेश शंकर विद्यार्थी की विरासत के छोटे फर्रे अखबारों के पेट पर लात मार कर, उनके गले में फंदे डाल उन्हे बंद करने का रोडमैप है। इससे अंग्रेजों के वक्त में भी सत्ता के प्यारे रहे टाईम्स आफ इंडिया जैसे हाथी अखबारों के एकाधिकार की कमाई को चार चांद लगेंगे। सरकार का मीडिया मेनेजमेंट आसान बनेगा। आखिर टाइम्स जैसे 30-40 अखबारों के विनित जैनों को पीएम हाउस बुलाकर मैनेज करना आसान है। पदम भूषण दे कर, विज्ञापन दे कर इन मालिकों को गुलाम बनाना चुटकी का काम है। मतलब भारत की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार को गणेश शंकर विद्यार्थी नहीं टाइम्स समूह के विनित जैन चाहिए। तभी अगले ढाई साल में असंख्य छोटे, मध्यम अखबार और मान्यता प्राप्त पत्रकार सिसकते हुए मरेंगे।