विद्यालय जाते बालकों के भोजन में ध्यान रखने योग्य बातें

व्यक्ति के समग्र विकास में शैशवावस्था , बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था इन तीनों ही अवस्थाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। इनमें कोई भी अवस्था ऐसी नहीं है जिसे नकारा जा सके अथवा कम करके आंका जा सके । जन्म के समय एक बालक जिसका वजन 2.5 – 3.00 kg तथा लंबाई 48 से 50 से मी होती है, वहीं बालक पूर्ण वयस्क होकर 5 – 6 फीट की लंबाई तथा 50 – 60 kg. वजन प्राप्त कर लेते हैं। परंतु यह तभी संभव है जब बालकों को पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक आहार मिले। शैशवावस्था एवं स्कूल पूर्व बालकों की पोषण संबंधी आवश्यकताएं क्या होती हैं तथा उसकी पूर्ति किस तरह से, किन-किन भोज्य पदार्थाें द्वारा की जानी चाहिए।

माताओं को अपने बच्चों के भोजन में कैलोरी ,प्रोटीन ,लोहा, कैल्शियम, विटामिन ए, विटामिन डी , थायमीन , राइबोफ्लैविन , एस्कॉर्बिक अम्ल , फाेलिक अम्ल , विटामिन B 12 , निकोटिनिक अम्ल आदि पोषक तत्वों को शामिल करना चाहिए।

बाल्यावस्था जिसे उत्तर बाल्यावस्था भी कहते हैं, बालकों की विद्यालय जाने की अवस्था होती है। बालकों के 6 – 12 वर्ष की उम्र उत्तर बाल्यावस्था कहलाती है। विकास की दृष्टि से इस अवस्था का बड़ा ही महत्व है। इस उम्र तक बालकों की औपचारिक शिक्षा शुरू हो जाती है। बालक विभिन्न शारीरिक क्रियात्मक क्रियाएं भी सीख चुका होता है। पूर्व बाल्यावस्था में बालक नर्सरी कक्षा में पाठशाला पढ़ने जाता है अथवा घर पर ही माता-पिता से खेल के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करता है, परंतु उत्तर बाल्यावस्था खेल के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने की उम्र समाप्त हो जाती है तथा वास्तव में पढ़ाई शुरू हो जाती है। बालक औपचारिक रूप से शिक्षा ग्रहण करने लग जाता है।

बाल्यावस्था में बालक की शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास की गति प्रायः बहुत तीव्र होती है तथा शारीरिक अंग भी शनैः शनैः पुष्टता एवं परिपक्वता प्राप्त कर लेते हैं। बालक में सामाजिक विकास होने लगता है तथा अब वह अनुशासन का महत्व समझने लगता है। परिणामस्वरुप उसके कार्याें एवं व्यवहार में परिवर्तन आने लगता है जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव बालक के भोजन पर पड़ता है।

किशोरावस्था तक पहुंचते-पहुंचते बालक शारीरिक वृद्धि, मानसिक विकास तथा संवेगात्मक विशेषताओं एवं अभिरुचियाें से भी प्रभावित होने लगता है। बालक तनावग्रस्त रहने लगता है। उसे तनाव से मुक्ति पाने तथा परिवार के सदस्यों एवं अपने साथियों के साथ समायोजन स्थापित करने में उसकी बहुत सी ऊर्जा व्यय हो जाती है। इस कारण बाल्यावस्था में अधिक पौष्टिक भोज्य पदार्थाें की जरूरत होती है। यदि इस उम्र में बालक को पूर्ण पौष्टिक आहार नहीं मिलता है तो उसका शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक, खेल एवं संवेगात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः इस उम्र के बालकों को उचित एवं पौष्टिक भोजन पर माताओं को विशेष ध्यान देना चाहिए।