संदेश देती पांच कविताएँ

ललित शौर्य

Lalit Mohan Rathor


हमें बचाना होगा खुद को
मिट्टी, पानी और आकाश को
ये सब जो हमारा तुम्हारा है
ये शव नहीं, जीवंत हैं
जिसे नोचा जा रहा है
वहशी गिद्दों द्वारा
कितना कष्टकारी होता है
जीते जी नुचा जाना


बेचा जा रहा है
हमारा भोलापन
मल्टीनेशनल कंपनियों को
अस्मिता को लूट रहे हैं
विदेशी हाथ
ये जो धरती और आकाश
पहाड़, झरने , बुग्याल
हमारे बाप-दादाओं ने
हमें सौपें थे
उन्हें लहूलुहान किया जा रहा है
हमारे जीते जी
बोलो ! क्या जवाब दोगे
आने वाली पीढ़ियों को


अरे ओ साहब!
बड़ी बड़ी दैत्याकार
मशीनों के मालिक
तुम भी तो इसी पहाड़ में जन्मे हो
फिर क्यों
कर बैठे हो दुश्मनी
इन निर्दोष पहाड़ों से
तुम्हारी ये महाविनाशकारी
मशीनें
हर रोज
छलनी कर रही हैं पहाड़ का सीना
क्या तुम नहीं सुन पा रहे
पहाड़ का सिसकना
पहाड़ का रुदन
ओह! तुम्हारे कानों में
रेंग रही है
ताजे कड़क नोटों की
आवाज


नहीं सुन पा रहे हो
तुम अपनी ही आवाज
दिल की धड़कन
लबों की सिसकन
आँखों के आँशु
पैरों की डगमग
जुबान की लड़खड़ाहट
जब से तुम सरकार हुये हो
कुछ भी तो
महसूस नहीं कर पा रहे


पहाड़ की बोली लगाने वाले
वहीँ हैं जो आते हैं
हर पांच साल में
पहाड़ पुत्र बनकर
हमारी-तुम्हारी चौखट पर
अरे ! ओ पहाड़ पुत्रों
कभी तो लायक पुत्र बनों
क्यों नालायक बनकर
पिता का जीना
हराम किये हो