दावानल का दंश

वनाग्नि से निपटने के लिए राज्यपाल और वन विभाग के साथ-साथ कुछ जिलों के जिलाधिकारियों ने वनों को बचाने के बेहतर प्रयास किये। जिनमें एससी सेमवाल (पिथौरागढ़), दीपक रावत (नैनीताल), अक्षत गुप्ता (ऊधमसिंह नगर) और रविनाथ रमन (देहरादून) मुख्य थे।

C.S.-Bhatt-(1)पिछले माह उत्तराखण्ड के जंगल धूं-धूं कर जल रहे थे। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था। महामहिम राज्यपाल ने स्वतः संज्ञान लेकर तत्काल दिशा-निर्देश दिये। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना को भी आग बुझाने में लगा दिया। पीआरडी वन विभाग व पुलिस महकमा तो पहले से ही प्रयास कर रहे थे। राज्य गठन के सोलह साल हो गये हैं। लेकिन प्रदेश के वनों की सुरक्षा कैसे की जाए, इस पर अब तक कोई कारगर कदम नहीं उठाया जा सका है। बहरहाल मई माह के शुरूआती दिनों में हुयी वर्षा से जंगलों में दहला रहा दावानल शांत हो गया, लेकिन क्या आने वाले वर्षों के लिए विभाग ने सबक लिया या नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि वन विभाग इसके लिए सशक्त कार्ययोजना को तैयार करे ताकि भविष्य में वनों को वनाग्नि से बचा सके। हालांकि राष्ट्रपति शासन के दौरान कुछ जिलों के जिलाधिकारियों ने वनों को बचाने के बेहतर प्रयास किये। जिसमें पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी एससी सेमवाल, नैनीताल के जिलाधिकारी दीपक रावत, ऊधमसिंह नगर के जिलाधिकारी अक्षत गुप्ता और देहरादून के जिलाधिकारी रविनाथ रमन मुख्य थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस बाद दावानल के दंश ने उत्तराखण्ड के वनों को बुरी तरह से डस लिया।


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