दावानल से दहली देवभूमि

Raj-Shekhar-Bhatt-2उत्तराखण्ड, जहां एक ओर हिन्दुओं के तीर्थ चार धाम के लिए प्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर 65 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र होने के कारण शुद्ध पर्यावरण के लिए भी जाना जाता है। बीते एक माह के भीतर उत्तराखण्ड का लगभग वन क्षेत्र दावानल से भस्म हो गया। वर्षा न होने व अत्यधिक गर्मी होने के कारण सैकड़ों स्थानों में वन क्षेत्रों में आग लगी। हालांकि जन-धन की हानि तो आंशिक हुयी, लेकिन वन-सम्पदा करोड़ों में जलकर राख हो गयी। पिथौरागढ़ से लेकर उत्तरकाशी तक के अधिकांश जंगल जलकर भस्म हो गये। वनों में आग पर काबू इन्द्र देवता की मेहरबानी से पाया जा सका। वन विभाग अपनी लचर कार्यशैली व संसाधनों के अभावों के चलते लाचार नजर आया। प्रदेश का कोई भी ऐसा वन नहीं है, जहां कि वन विभाग ‘हाईड्रेंट’ नहीं लगा पाया है और न ही प्रयास किये। यह बात अलग है कि प्रदेश के राज्यपाल केके पॉल ने समय पर दिशा-निर्देश जारी कर दिए थे। बावजूद शासन के प्रयास नाकाफी रहे। इसी विषय पर आधारित है यह रिपोर्ट…

fire-in-forest-1बीते माह पूरा प्रदेश दावानल की चपेट में रहा। करोड़ों की वन-सम्पदा नष्ट हो गयी। पर्वतीय क्षेत्र के लोगों का तो जीना मुहाल रहा। एक तो भीषण गर्मी और दूसरा जंगल की आग से बढ़ी धुंध से लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। हालांकि वनाग्नि और नष्ट होते हुये वनों को देखकर 01 अप्रैल को ही राज्यपाल ने वन विभाग को सभी आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिये। उन्होंने अपर मुख्य सचिव को आगामी गर्मी के मौसम को देखते हुए अभी से ही वनाग्नि रोकने हेतु आवश्यक उपाय सुनिश्चित करने के लिए भी कहा। साथ ही राज्यपाल ने वन विभाग को वनों में आग लगने के कारणों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने के निर्देश भी दिये। जिससे जन जागरूकता के माध्यम से इन पर नियंत्रण पाया जा सके। उन्होंने वन विभाग को वनाग्नि रोकने तथा नियंत्रित करने के नये आधुनिक उपायों पर भी ध्यान देने को कहा। उन्होंने सचिव पेयजल को गर्मी के मौसम में पेयजल आपूर्ति पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि जिन स्थानों पर पेयजल की किल्लत होती है उन्हें पहले से ही चिन्हित कर कार्य योजना तैयार कर ली जाय।

राज्य में राज्यपाल के निर्देशों का भी पालन किया गया। वन विभाग के सभी कर्मचारियों ने मुस्तैदी से अपने काम को अंजाम दिया। लेकिन वनों में धधकती आग को रोकना मुश्किल पड़ा। कारणों की व्याख्या करें तो मुख्य रूप से बारिश न होना पाया गया। दूसरी तरफ आग का एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाना और तेजी से आगे बढ़ना भी एक खास कारण रहा। क्योंकि हवाई आग को बुझाना अत्यंत मुश्किल सबब बनके रह गया। वनाग्नि नियंत्रण के उपायों को लेकर 07 अप्रैल के दिन राज्यपाल ने अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में मुख्यतः वनों की आग से होती अमूल्य वनसंपदा के नुकसान का विचार-विमर्श किया गया। राज्यपाल ने कहा कि आग के कारण वनसंपदा को पहुंचने वाली हानि के प्रति जनसामान्य में जागरूकता होना भी बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि जागरूकता होने से ही सकारात्मक परिणाम हमें प्राप्त होंगे।

एक तरफ वनों में लगी आग ने जनमानस को रूलाया तो दूसरी तरफ मौसम ने भी आग का साथ निभाया। या यूं कहें कि विद्युत विभाग की लापरवाही ने भी कसर नहीं छोड़ी। इसका उदाहरण 12 अप्रैल को हमें रूद्रपुर में देखने को मिला। जिसमें डेढ़ एकड़ गेंहू की फसल आग की भेंट चढ़ी। आंकड़ों के अनुसार विद्युत की तारों के आपस में टकराने से निकली चिंगारियों से भड़की आग ने करीब डेढ़ एकड गेहूं की फसल को जलाकर राख कर दिया। सूचना पर मौके पर पहुंचे ग्रामीणों की मदद से आग पर काबू पाया गया। आग को काबू करने में हवा का विपरीत रूख भी कारगर रहा। ग्रामीणों ने ट्रैक्टर की मदद से खेत के चारों और खुदाई करके आग को फैलने से रोक दिया, लेकिन तब तक करीब 60 हजार रूपये की डेढ एकड़ गेहूं की फसल जलकर राख हो चुकी थी।

राज्य सरकार पूरे जोर से वनाग्नि को नियंत्रित करने की कोशिश में लगी रही, परन्तु वनाग्नि को रोकना या नियंत्रित करना मुश्किल था। वन सम्पदा को बचा पाना भी एक चुनौति बनकर रह गया। इसी बावत अनियंत्रित आग को देखते हुए 12 अप्रैल को रूद्रपुर में डीआईजी पुष्कर सिंह सैलाल ने पुलिस लाइन में तीन दमकल वाहनों को हरी झण्डी दिखाकर रवाना किया। मुख्य अग्नि शमन अधिकारी नरेंद्र सिंह कुंवर ने बताया कि इन वाहनों में 300 लीटर पानी की क्षमता है। अग्निकांड की घटना में जहां पानी का उपयोग किया जाता है वहीं विद्युत तारों में लगी आग को बुझाने में फोम स्प्रे का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने बताया कि जिन गली मोहल्लों में दमकल के बड़े वाहन प्रवेश नहीं कर सकते। वहां अग्निकांड की घटना में इन छोटे वाहनों को भेजा जायेगा। उन्होंने कहा कि जनपद में अग्निकांड की घटनाओं में प्रभावी ढंग से अंकुश लगाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे और किसी भी अग्नि कांड की सूचना मिलने पर दमकल कर्मी तत्काल मौके पर पहुंचे।

fire-in-forest-2वनाग्नि की घटनायें केवल एक ही जनपद में नहीं बल्कि पूरे उत्तराखण्ड में हो रही थी। जहां हरियाली दिखायी देती थी, वहां केवल आग की लपटें दिख रहीं थी। दूसरी तरफ कम वर्षा होने के कारण भी वनों में आग लगने की सम्भावनायें बढ़ गयी थी। वनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए 13 अप्रैल को नैनीताल के जिलाधिकारी ने विशेष कदम उठाने की बात कहीं। जनपद में अभी तक लगभग 20 हैक्टेयर वनों में आग लगने को मद्देनजर रखते हुये जिलाधिकारी दीपक रावत ने वनाग्नि संबंधी बैठक लेते हुये अधिकारियों को निर्देश दिये कि वे अपने-अपने मुख्यालय में रहते हुये कड़ी नजर रखें तथा सतर्कता से कार्य करें। जहां से भी आग लगने की सूचना मिलती है, अपने उच्चाधिकारियों को सूचित करते हुये त्वरित कार्यवाही करना सुनिश्चित करें।

वन सम्पदा आग के आगोश में थी। कार्य बनती जा रही थीं, जोर-शोर से सभी अधिकारी वनाग्नि नियंत्रण के कार्य में लगे हुये थे। परन्तु वनों का दोहन बढ़ता गया। 22 अप्रैल को वन मंत्री दिनेश अग्रवाल से वनाग्नि से निपटने के लिए अधिकारियों की बैठक ली और विचार-विमर्श किया। वन मंत्री ने प्रदेश में वनाग्नि से हुए नुकसान की जानकारी ली और वनाग्नि से निपटने के लिए प्रभावी कार्ययोजना बनाने की बात कही। बैठक वन मंत्री द्वारा वनाग्नि से हुए अब-तक हुए जान माल के नुकसान की जानकारी ली गयी।
जिसके अन्तर्गत पाया गया कि इस वर्ष 21 अप्रैल तक पूरे प्रदेश में सात लाख तिरालिस हजार नौ सौ नब्बे का नुकसान होने का आंकलन किया है। वन प्रभाग उत्तरकाशी की मुखेम रेंज में फरवरी 2016 वनाग्नि से 2 महिलाओं की मृत्यु हुई है। वन प्रभाग नैनीताल की नैनौरेंज में 14 अप्रैल 2016 को वनाग्नि से 1 पुरूष घायल हुआ तथा वन प्रभाग चमोली के केदारनाथ जीव विहार की गोपेश्वर रेंज में 26 मार्च 2016 को वनाग्नि से घायल हुआ है। चमोली वन प्रभाग के केदारनाथ जीव विहार की धनपुर रेंज में 16 अप्रैल 2016 को वनाग्नि से गौशाला जलने से 7 पशु मर गये।

एक तरफ वनाग्नि ने बेहिसाब हड़कंप तो मचाया तो दूसरी ओर दुकान, फैक्ट्री और मिलों में लगी आग ने भी काफी नुकसान किया। ऐसा ही एक मामला जसपुर में 23 अप्रैल को सामने आया। हुआ कुछ यूं कि आवास विकास के पास बनी सहकारी चीनी मिल में अचानक आग लग गई। सूचना पर फायर बिग्रेड की तीन गाड़ियां मौके पर पहुंची। मगर पानी की व्यवस्था न होने के कारण गाडिय़ों को दुबारा पानी भरने स्टेशन जाना पड़ा। फायर बिग्रेड की टीम ने तीन घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। जानकारी के अनुसार आवास विकास के पास बनी सहकारी चीनी मिल पिछले छह साल से बंद पड़ी है।

दूसरी तरफ विकराल वनाग्नि की घटनाओं को वन महकमा रोकने में नाकाम रहा। इन दिनों पर्वतीय क्षेत्रों में जंगल आग से धधक रहे हैं। प्रदेश में वनाग्नि की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होने से वन संपदा को तो नुकसान हुआ, साथ ही पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। वनाग्नि की घटनाओं को रोकने के लिए हर वर्ष वन विभाग ठोस कार्ययोजना बनाने में फेल साबित होता है। प्रदेश में हर वर्ष वनाग्नि की घटनाओं से बड़ा नुकसान होता है, लेकिन वन विभाग इन घटनाओं से कोई सबक नहीं ले पाता है। प्रदेश में इस वर्ष 21 अप्रैल तक वनाग्नि की घटनाओं से 743,990 रूपये की धनराशि का नुकसान होने का आंकलन वन विभाग द्वारा किया गया है। इसके अलावा वनाग्नि की घटनाओं से वन संपदा को बड़ा नुकसान पहुंच रहा है। पहाड़ के जंगल इन दिनों आग से धधक रहे हैं और विभाग हाथ पर हाथ धरे बैठा है। वन विभाग के अधिकारी फील्ड में कम ही दिखते हैं। जिन कर्मियों को वनाग्नि पर काबू पाने की जिम्मेदारी सौंपी गई, उनके पास संसाधनों का अभाव बना रहा। वन विभाग द्वारा जो क्रू स्टेशन बनाए गए हैं उनमें गिने-चुने कर्मचारी तैनात किए गए हैं।

fire-in-forest-4 वनाग्नि की मुश्किलें और वनाधिकारियों के क्रियाकलाप तो अपना रंग दिखा ही रहे थे। वहीं 26 अप्रैल मोटाहल्दू क्षेत्र में भीषण आग की चपेट में आने से करीब 100 झोपड़ियां जलकर राख हो गई। गौला नदी के मोटाहल्दू खनन गेट के आसपास बनी झोपड़ियों में भयंकर आग लग गई। इस अग्निकांड में 40 साल की महिला और उसका बच्चा जिंदा जल गए। आग जलने से झोपड़ियों में रखा मजदूरों का सामान जलकर राख हो गया। फायर ब्रिगेड ने काफी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, तब तक सब जलकर राख हो चुका था। आग लगने के कारणों अभी तक पता नहीं चल पाया है। झोपड़ियां एक-दूसरे से सटी होने के कारण आग तेजी से फैली और देखते ही देखते खाक हो गई। झोपड़ियों में रहने वाले मजदूर गौला नदी में खनन करते हैं। अधिकांश मजदूर बिहार व झारखंड के रहने वाले हैं।

धधक रही वन सम्पदा को बचाने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष ने 27 अप्रैल को एक पत्र राज्यपाल को भेजा। उपाध्याय ने पत्र के माध्यम से बताया कि भले ही इस समय पूरा प्रदेश भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के कतिपय सत्ता लोलुप बागियों की बजह से राजनैतिक संकट की आग में धधक रहा है। लेकिन इस स्थिति में भी हमें अपने प्रदेश की आग से नष्ट होती वन सम्पदा को बचाने का दायित्व निभाना है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में लोकतांत्रिक सरकार विहीनता की वर्तमान स्थिति में मेरा मन आग से धधकती प्रदेश की अमूल्य वन सम्पदा के लिए सर्वाधिक व्याकुल है। हमारे वन्य पशु, वृक्ष-वनस्पतियां, जल स्रोत और यहां तक कि ग्लेशियर भी इस भीषण दावानल से संकट में है। इस समय प्रदेश में भले ही हमारी सरकार कार्यकारी नहीं है, लेकिन इस प्रदेश की वन सम्पदा तो हमारी ही है। कांग्रेस अध्यक्ष के द्वारा लिखे गये पत्र में वन-सम्पदा को बचाने के लिए उनका जोश साफ होता है। लेकिन इस विकट वनाग्नि को केवल बातों से बुझाया नहीं जा सकता है। क्योंकि वनाग्नि के परिणाम सभी के सामने हैं।

वनाग्नि की तेज-तर्रार लपटों ने राजाजी रिजर्व टाइगर के जंगलों को भी नहीं छोड़ा। ऋषिकेश में राजाजी रिजर्व टाइगर के जंगल में लगी आग ने बुझने का नाम नहीं लिया। आग लगने के कारण वन्य जीव बुरी तरह से प्रभावित हुये। इसके अलावा वन संपदा को भारी नुकसान हुआ। साथ ही साथ  विभाग भी जंगल में लगी आग पर काबू नहीं पा सका। वनाग्नि के बढ़ते कदमों को देखकर राज्यपाल ने अत्यधिक चिंता जाहिर की। जिसके चलते 28 अप्रैल को राज्यपाल ने राज्य के सभी नागरिकों विशेषतः पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों से अपील की। कहा कि पर्यावरण और सामान्य जन-जीवन के लिए वनों का बचे रहना बहुत जरूरी है। इसलिए जंगलों को आग से बचाने में मदद के लिए स्वयं भी आगे आयें।

fire-in-forest-3उत्तराखण्ड के जंगलों में तेजी से बढ़ रही आग की घटनाओं पर यथाशीघ्र नियंत्रण पाने के लिए राज्यपाल ने आज अतिरिक्त धनराशि निर्गत करने के साथ ही और अधिक लोगों की तैनाती के निर्देश दिये हैं। वनाग्नि के कारण नष्ट हो रही बहुमूल्य वन संपदा, जीव-जन्तुओं तथा जन हानि को अत्यन्त चिन्ताजनक बताते हुए राज्यपाल ने कहा कि वनाग्नि की भयावहता पर तत्काल नियंत्रण के हर संभव प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि यह पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती है। जिसका सामना करने हेतु जनसहयोग निहायत जरूरी है। खासकर अप्रैल के महीने में वनाग्नि ने अपना भीषण रूप इख्तियार किया। जिसके आगे न सरकार की चली, न जनता की। वन-सम्पदा को बचा पाना भी चुनौति समान हो गया।

विकाराल वनाग्नि का हाल कुछ यूं हुआ कि अब जंगलों में लगी आग रियासी इलाकों तक पहुंच गयी। अज्ञात लोगों ने पुलिस अधीक्षक आवास के पास जंगल में आग लगा दी, जो धीरे-धीरे आवास के नजदीक पहुंच गई और विकराल रूप ले लिया। आग बुझाने में पुलिस कर्मियों को पसीना बहाना पड़ा। पुलिस अधीक्षक आवास मुख्यालय से तीन किमी दूर होने के कारण दमकल वाहन को पानी भरने के लिए पुनाड़ गदेरे आना पड़ा। इतने में सारा जंगल जल गया। हालांकि पुलिस अधीक्षक आवास तक आग नहीं पहुंचने दी गई। पुलिस और दमकल कर्मियों ने एसपी आवास तक आग पहुंचने तक आग को बुझा दिया, मगर वन सम्पदा को काफी नुकसान पहुंच गया। जिले के जंगल धूं-धूं कर भस्म हो रहे थे। एक तरफ जंगलों में लगी आग से तापमान में वृद्ध हुयी, वहीं पेयजल को लेकर भी लोग खासे परेशान थे और पेयजल संकट तो अभी भी है। ऊपर से गर्मी की तपिश ने जीना मुश्किल कर किया। आग की परेशानी सबके लिए चिंता का विषय बन गया।

वनाग्नि को रोकने में शासन-प्रशासन पस्त हुआ तो सेना ने भी इसमें भाग लिया। वन महकमा जब जंगलों में लगी आग को बुझाने में नाकाम हो रहा है तो मजबूरन आर्मी को आग बुझाने के लिये जंगलों का रूख करना पड़ा। इतना ही नहीं फायर बिग्रेड भी तमाशबीन बना हुआ देखता रहा और जंगलों में आग की लपटें विकराल रूप ले रहीं थीं। देखने में आया कि जब जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर तिलनी गांव के ऊपर जंगल धूं-धूं कर चल रहे थे और आग गांव के साथ ही जिला मुख्यालय की ओर आ रही थी तो छह कुमाऊं रेजीमेंट के जवान आग बुझाने के लिये पहुंचे। लगभग पांच घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद आर्मी के जवानों ने आग पर काबू पाया।

दरअसल, जिले के अंतर्गत सभी जंगल धूं-धूंकर जल रहे थे, लेकिन वन महकमा आगू पर काबू पाने में नाकाम हो रहा। करोड़ों रूपये की प्राड्डतिक संपदा जहां नष्ट हुयी। वहीं जंगली जानवरों का अस्तित्व भी संकट में पड़ा। शासन और वन महकमा तो वनाग्नि की चुनौति को स्वीकर करके हिम्मत हार चुका था। इसी संबंध में नैनीताल जिलाधिकारी ने भी वनाग्नि को रोकने के लिए जनता से सहयोग की अपील की। विगत् दिनों से जनपद के विभिन्न स्थानों में विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रान्तर्गत वनाग्नि की घटनाओं का बढ़ना संज्ञान में आया है। वनाग्नि को पर्यावरण व जन सुरक्षा की दृष्टि से तत्काल रोका जाना नितान्त आवश्यक है, इस हेतु जिलाधिकारी दीपक रावत ने जनपद के समस्त परगना अधिकारियों को निर्देश दिये कि वे प्रतिदिन वनाग्नि से प्रभावित स्थलों पर उपस्थित रहकर वनाग्नि से रोकथाम हेतु प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखकर 01 मई को अपर मुख्य सचिव एस. रामास्वामी ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में वनाग्नि की घटनाओं के नियंत्रण एवं रोकथाम के कार्यों की समीक्षा की गयी। बैठक के दौरान बताया गया कि राज्य में 40 मास्टर कन्टा्रेल रूम व 1166 अग्निशमन चालक दल राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित किए गए हैं। प्रत्येक चालक दल में 5 से 7 कर्मचारियों सहित अग्निशमन यंत्रों की व्यवस्था की गयी है। जंगलों में लगी आग में काबू पाने के लिए अग्निशमन विभाग की ओर से 500 कर्मचारी शहरी व उपशहरी क्षेत्रों वनाग्नि से सुरक्षा हेतु लगाया गया है साथ ही इसके लिए प्रत्येक जिले में राजस्व वनों के संरक्षण के लिए 100 पीआरडी जवानों की तैनाती करने के लिये जिलाधिकारियों द्वारा आदेश दे दिये गए हैं। आपदा प्रबंधन विभाग को जंगलों की आग की रोकथाम व आग बुझाने हेतु उपकरणों के लिए एसडीआरएफ कोष से 5 करोड़ रूपये वन पंचायतों को उपलब्ध कराने के लिए निर्देशित किया गया है।

वनाग्नि नियंत्रण में शासन, सेना, पुलिस और जनता, सभी ने कड़ी मशक्कत की और बारिश ने भी अपना योगदान दिया। जिसके कारण वानाग्नि में को नियंत्रित करने में सफलता मिली। इसी परिप्रेक्ष्य में देहरादून जिलाधिकारी रविनाथ रमन ने बताया कि देहरादून जनपद में वनाग्नि की घटनायें पूरी तरह से नियंत्रण में हैं। वनाग्नि की घटनाओं पर निगरानी के लिए तीन कन्ट्रोल रूम बनाये गये है। उन्हांने कहा कि वनाग्नि को रोकने के लिए राजस्व पुलिस एवं वन विभाग के नियंत्रण कक्ष कार्य कर रहे है। दूसरी तरफ अपर मुख्य सचिव एस रामास्वामी ने बताया है कि सरकार वर्तमान वनाग्नि की घटनाओं के समाधान के लिए तात्कालिक प्रयासों एवं दीर्घकालिक उपायों पर गम्भीरता से विचार कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण उपाय वनों में जल संरक्षण और जल संग्रहण के अधिकतम प्रयास करना है। जिससे वनों में आवश्यक आर्द्रता और नमी बनी रहे।

वनाग्नि का एक मामला जनपद नैनीताल में सामने आया। जिसमें वनाग्नि से निपटने के लिए सेना के दो हैलीकॉप्टर उपलब्ध कराये गये। उन्होंने बताया कि सेना के हैलीकाप्टर प्रतिदिन हल्द्वानी से उडान भरेंगे और आग बुझाने का काम करेंगे। यहीं देखा गया कि एक दिन हैलीकाप्टर ने उडान भरी लेकिन किलबरी के आस-पास तेज धुंए की धुंध होने के कारण वह अपना कार्य नहीं कर सके। इसी श्रृंखला में वनों में लग रही आग पर काबू पाने के लिये जिलाधिकारी रूद्रप्रयाग ने वन विभाग सहित सभी जिला स्तरीय अधिकारियों को कडे निर्देश दिये हैं। उन्होंने कहा कि आग पर नियंत्रण करना महज वन विभाग का कार्य नहीं है, बल्कि जिला स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक के सभी अधिकारी कर्मचारी इसमें वन विभाग को अपना सहयेग देगें। इस दौरान सभी अधिकारियों के अवकाशों को निरस्त करते हुए निर्देश दिये कि वे अपने मुख्यालय में बने रहें। इस दौरान कोताही बरतने पर संबंधित के विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी।

धधकती हुयी आग का रूप इतना विकराल था कि केन्द्र सरकार भी इस पर काफी चिंतित हुयी। राष्ट्रपति ने राज्यपाल से कहा प्रभावित लोगों को हरसम्भव सहायता उपलब्ध करवाई जाए। राष्ट्रपति ने उत्तराखण्ड राज्यपाल पत्र लिखकर वनाग्नि के कारण जन-धन व पर्यावरण को हुए नुकसान पर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने पर्यावरण व जैवविविधता को बचाने के लिए राज्य सरकार, राहत कर्मियों, सिविल संगठनों व स्थानीय जनता के प्रयासों की सराहना की और विश्वास जताया कि उत्तराखण्ड सरकार एवं यहां की जनता अपने दृढ़ संकल्प शक्ति से वनाग्नि की चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करेंगे। वहीं, प्रधानमंत्री ने कहा कि जो प्रयास किये जा रहे हैं, उन्हें जारी रखा जाये। अगर केंद्र से किसी भी तरह के संसाधनों की आवश्यकता है तो तत्काल अवगत कराएं। केंद्र सरकार वनाग्नि पर प्रभावी नियंत्रण के लिए मदद हेतु पूरी तरह से तत्पर है।

वनाग्नि और वनों में मची दहशत को देखते हुए खटीमा के विधायक पुष्कर सिह धामी ने चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले 88 दिनां से दावानल से समूचा उत्तराखण्ड दहशत में है। केन्द्र सरकार से मिले एमआई 17 हैलीकाप्टरों की मदद से उत्तराखण्ड के जंगलों में लगी आग बुझाने में मदद ली जा रही है। उन्होंने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार के समय से पिछले 88 दिनों से आग किन कारणों से लग रही थी। आग निरंतर विकराल रुप लेती रही, किन्तु पूर्व की उदासीन कांग्रेस सरकार के रवैये से राज्य के लोगां को जान-माल का नुकसान हुआ है, उसकी जांच की जानी चाहिए। उत्तराखण्ड राज्य के जंगलों में लग रही आग से वन सम्पदा को भारी क्षति हो रही है। क्योंकि उत्तराखण्ड के जंगलों में बेशकीमती जड़ी बूटिया पाई जाती है।

सासंद एवं पूर्व सीएम मेजर जनरल भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने उत्तराखण्ड में चल रही भयानक वनाग्नि की घटनाओं पर चिंता जताई है। उन्होंने 02 मई को इस संबंध में गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। गृहमंत्री से अनुरोध किया कि जल्द से जल्द इस समस्या को युद्धस्तर पर कार्य कर सुलझाया जाये। पौड़ी सांसद ने बताया कि जब वह प्रदेश में मुख्यमंत्री थे तो उनके द्वारा वन विभाग को इस तरह की आग से प्रदेश के जंगल को बचाने के लिए कुछ सुझाव दिये गये थे। वन विभाग द्वारा उन पर अमल में लाना भी शुरू कर दिया था, जिसके परिणाम सतोंषजनक आये थे।

वहीं दूसरी तरफ सांसद रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने लोकसभा में वनाग्नि का मामला उठाया। निशंक ने लोकसभा में शून्यकाल में उत्तराखण्ड में बेकाबू होती जा रही आग पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि प्रदेश के संपूर्ण 13 जिले इस भीषण वनाग्नि की चपेट में हैं। जबकि जिला पौड़ी, नैनीताल, रूद्रप्रयाग, टिहरी, देहरादून आदि बुरी तरह से प्रभावित हैं। जिसमें 3000 हेक्टेयर से ज्यादा वन पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं। उत्तराखण्ड राज्य में इस गम्भीर आपदा के दुष्प्रभाव की चर्चा करते हुए डॉ0 निशंक ने कहा कि आज इस भीषण आग की वजह से पहले ही आपदा से ग्रस्त प्रदेश दोबारा अनिश्चय, निराशा, दुःख, हताशा के वातावरण में धकेल दिया है।

इसी दिन अपर मुख्य सचिव ने वनाग्नि की समीक्षा की गयी। समीक्षा में वनाग्नि को अज्ञात लोगों द्वारा लगाई गई आग बताया गया। जंगलों में जानबूझकर आग लगाते हुए पाए जाने पर कुल 46 मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें 1 मामले में एफआईआर व 45 में फोरेस्ट एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। जानकारी दी गई कि फोरेस्ट एक्ट में जानबूझकर आग लगाया जाना सिद्ध होने पर 3 से 7 साल की सजा का प्राविधान है। तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। इनमें से 2 व्यक्तियों को नैनीताल में व 1 व्यक्ति को पिथौरागढ़ में गिरफ्तार किया गया है। इसके बाद भी एयरफोर्स के दो एमआई-17 हेलीकाप्टर का उपयोग किया गया। नैनीताल से 5 व पौड़ी से 3 उड़ानें भरी गईं। रामास्वामी ने वर्तमान फायर सीजन (15 फरवरी से 15 जून) में वनाग्नि से हुए नुकसान की जानकारी देते हुए बताया कि अभी तक कुल 1317 वनाग्नि की घटनाएं हुई हैं। जिनसे 2876 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। 3 व्यक्तियों की मृत्यु हुई है जबकि 14 व्यक्ति घायल हुए हैं, 7 पालतू जानवरों की मौत हुई है।

उत्तराखण्ड में वनाग्नि की घटनाओं के बारे में बताते हुए अपर मुख्य सचिव एस रामास्वामी ने कहा कि 3 मई को 121 वनाग्नि की घटनाएं हुईं हैं, जिनमें से 95 को काबू में कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि एक्टिव फायर की संख्या वर्तमान में 26 है। जबकि इससे पूर्व में एक्टिव फायर की संख्या 70 थी। स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर लगाए गए संसाधनों व समन्वित प्रयासों से प्रदेश में वनाग्नि को काफी नियंत्रित कर लिया गया है।

रामास्वामी ने बताया कि वर्तमान में कुल 11160 राज्य सरकार के कर्मचारी आग को नियंत्रित करने के काम में लगे है। इसके अतिरिक्त एनडीआरएफ व एसडीआरएफ के लोग भी इस काम में जुटे हैं। को टिहरी में 2 लोगों के खिलाफ जानबूझकर आग लगाए जाने के मामले दर्ज किए गए हैं। इस प्रकार अभी तक कुल 46 मामले दर्ज कर लिए गए है। एमआई-17 हेलीकाप्टर का उपयोग किया गया। नैनीताल में 17 जबकि पौड़ी में 6 उड़ाने भरी गईं। वर्तमान फायर सीजन में कुल 4 जनहानि दर्ज की गई है जबकि 16 व्यक्ति घायल हुए हैं। कुल प्रभावित क्षेत्र लगभग 3466 हेक्टेयर रहा है। जबकि कुल वनाग्नि की घटनाएं 1591 रही हैं।

मई का माह शुरू हुआ और देवभूमि को वनाग्नि की चपेट में देखकर इन्द्र देवता से भी नहीं रहा गया। इन्द्र देवता ने अपनी ड्डपा बरसाई और पहले सप्ताह में बारिश से में फैली वनाग्नि को शांत किया। सोचने की बात तो यह है कि यदि बारिश नहीं होती तो क्या होता। वैसे भी वनाग्नि तो अपने आक्रोश में थी। बहरहाल, गर्मी के इस मौसम में बारिश की दस्तक ने कुछ राहत भी दी और वनाग्नि से भी निजात दिलाई।


वनाग्नि ने बढ़ाई पर्यावरणविदों की चिंता

पर्यावरण क्लीन एंड ग्रीन सोसायटी (रज़ि) के सदस्यों ने बैठक कर जंगलों में लगी आग पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन से उस पर शीघ्र काबू पाने की गुहार लगाई। चंद्राचार्य चौक स्थित सूर्या काम्पलेक्स के कार्यालय पर आयोजित बैठक को संबोधित करते हुए सचिव अनूप सिंह सिद्ध ने कहा कि पूरे प्रदेश के वनों में आग लगने से पेड़ पौधें व वन्य जीवों को नुकसान होने के साथ साथ पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। नैनीताल, पौडी, हरिद्वार, रानीखेत, टिहरी आदि के वनों में भीषण आग लगी हुई है। जिसके कारण पेड़ जल रहे हैं। शासन प्रशासन को इस पर गंभीरता से विचार कर इसकी रोकथाम के लिए कदम उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक किया जाए। आज के दौर में एक छोटा सा पौधा भी लगाने के लिए लोगों को समझाना पडता है। वहीं इस आग के कारण हजारों लाखों पेड जलकर राख हो रहे हैं जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है।

अध्यक्ष लव कुमार शर्मा ने कहा कि वनों में आग से करोड़ों रूपयों का नुकसान हो रहा है। अप्रेल महीने में भीषण गर्मी के कारण जहां एक ओर लोगों को परेशानियों का सामना करना पड रहा है वहीं दूसरी ओर वनों में आग के कारण धुंआ भी हो रहा है। कई जगह पर धुंऐ के कारण पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। गांव देहात में वनों के आसपास के खेत भी सुरक्षित नहीं हैं। वनों में आग के कारण कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। जो गांव वनों के आसपास हैं वहां पर सुरक्षा बढाई जाए। संस्था प्रशासन से अपील करती है कि जंगल के पेड़ व पशुओं को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए। उन्होंने कहा कि वन अधिकारियों को प्रशासन के साथ समन्वय बैठाकर इस पर कार्य करने की आवश्यकता है। ऋषि शर्मा ने कहा कि वनों की आग कई आवासीय क्षेत्रो तक पहुंच रही है जिसके कारण लोगों को खतरा हो रहा है। वनों की आग ने विकराल रूप ले लिया है। करोडों की वन संपदा को भी नुकसान हो रहा है। प्रदेश के कई क्षेत्रों में आग के कारण लोगों को सांस लेने में भी परेशानी हो रही है।


वनाग्नि को अज्ञात लोगों द्वारा लगाई गई आग बताया गया। जंगलों में जानबूझकर आग लगाते हुए पाए जाने पर कुल 46 मामले दर्ज किए गए हैं। जानकारी दी गई कि फोरेस्ट एक्ट में जानबूझकर आग लगाया जाना सिद्ध होने पर 3 से 7 साल की सजा का प्राविधान है। तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।


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