गुमनामी का दंश झेल रहा जगतग्राम का अश्वमेध स्थल

ashwameghदेहरादून। तीसरी शती के यशस्वी राजा शील बर्मन का गौरवशाली इतिहास राजधानी देहरादून से महज 55 किलोमीटर दूर जगतग्राम बाड़वाला से जुड़ा है। उनके द्वारा कराए गए चार अश्वमेध यज्ञों में से तीन यज्ञों के अवशेष जगतग्राम में मौजूद हैं। राष्ट्रीय महत्व की यह धरोहर उपेक्षा के चलते गुमनामी का दंश झेल रही है।

भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा वर्ष 1952-54 में जगतग्राम में पुरातात्विक उत्खनन कराया गया। उत्खनन में राजा शील बर्मन द्वारा कराए गए चार अश्वमेध यज्ञों में से तीन के अवशेष के रूप में जगतग्राम में प्राचीन ईटों से निर्मित यज्ञ वेदिकाएं प्रकाश में आई। प्राचीन पक्की ईंटों पर ब्राह्मी लिपि के शब्द लिखे हुए हैं। राजा के अश्वमेध यज्ञ की यज्ञवेदिकाओं का अवशेष प्राप्त होने के बाद पुरात्व विभाग द्वारा पुरात्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958 1958क, 24 के तहत उक्त स्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया। यहां तीन अलग-अलग जगहों पर अश्वमेद्य अवशेष मौजूद हैं। इनमें से दो अश्वमेद्य स्थल आसपास हैं जबकि तीसरा थोड़ी दूरी पर है। अश्वमेद्य स्थल पर प्राचीन पक्की ईंटों से निर्मित यज्ञ वेदिकाओं के अवशेष हैं। जगतग्राम में जब अश्वमेद्य अवशेष की खुदाई हुई थी उस समय यह स्थान आगरा सर्किल के अधीन था। इसकी खुदाई नागपुर उत्खनन शाखा द्वारा की गई थी। इस स्थल को संरक्षित और विकसित करने के नाम पर दो चैकीदारों की तैनाती, चहारदीवारी खड़ा करने और ऐतिहासिक स्थल को सुरक्षित रखने संबंधी बोर्ड लगाने के अलावा कुछ भी नहीं किया गया है। इस ऐतिहासिक स्थल में अभी तक सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। यहां तक पहुंचने के लिए आम के बगीचे के बीच से होते हुए एक कच्चा रास्ता है। दिल्ली-यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर बाड़वाला के पास पुरातत्व विभाग द्वारा ऐतिहासिक अश्वमेेध स्थल का बोर्ड लगा देख उसे देखने के लिए लोग आगे तो बढ़ जाते हैं, लेकिन हाईवे से करीब डेढ़ किमी दूर आम के बाग के पास पहुंचकर सड़क समाप्त हो जाती है। आम के बाग में जाने के लिए लगे गेट को देख कर कई लोग वापस लौट आते हैं। यदि कोई भटकते हुए इस ऐतिहासिक स्थल तक पहुंच भी जाता है तो वहां के हालत देखकर उसके मन में आह सी उठती है। वहां अश्वमेध यज्ञ की जानकारियों से संबंधित न कोई पुस्तिकाएं उपलब्ध हैं और नहीं कोई विस्तृत जानकारी देने वाला। जो इक्के-दुक्के लोग वहां पहुंचते हैं वह चैकीदारों से इससे संबंधित पुस्तकों की मांग करते हैं, लेकिन पुस्तिकाएं उपलब्ध न होने से पर्यटकों को मायूस होकर लौटना पड़ता है। क्षेत्र में अश्वमेध स्थल से संबंधित बोर्ड भी नहीं लगे हैं।