ज्ञानी जैल सिंह जन्म दिन पर किए गए याद

बाराचट्टी (गया )। गया जिला के बढ़ई समाज ने बिङा उठाया है, की समाज के भिन्न भिन्न बैनर पोस्टर को त्याग कर एक मंच पर आऐ तब ही समाज मुकाम पर पहुंच पाए गी, हम सब को स्वर्गीय ज्ञानी जैल सिंह जी प्रेणा लेनी चाहिए… (जन्म : 05 मई 1916, मृत्यु : 25 दिसम्बर 1994)

दिनांक 5 मई 2018 को भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्व ज्ञानी जैल सिंह की 102वीं जयन्ती है।पूरे झारखण्ड में विश्वकर्मा समाज के लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेगे। पंजाब के एक छोटे से संधवा गांव में एक गरीब बढई विश्वकर्मा परिवार में पैदा होकर ज्ञानी जैलसिंह अपने संघर्ष के बल पर पंजाब के मुख्यमंत्री तथा देश के गृहमंत्री और देश के राष्ट्रपति बने थे।उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि मन में दृढ इच्छाशक्ति हो और नेतृत्व के प्रति सच्ची निष्ठा हो तो ब्यक्ति संघर्ष के बल पर गरीब और पिछडी जाति में पैदा होकर देश के बडे पद पर पहुच सकता है।

इसलिए विश्वकर्मा समाज के लोगो को अपने मन से हीनता निकालनी चाहिए और अपनी पहचान के साथ कर्म करना चाहिये।ज्ञानी जैल सिंह एक समाजवादी विचारक स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी महान देशभक्त और संघर्षशील नेता थे।देश की आजादी की लडाई में अंग्रेज़ों से लडते हुए बार बार जेल गये इसलिए जेलर ने झुझलाकर इनका नाम जैल सिंह रख दिया। ज्ञानीजी गरीबों और पिछडो वंचितो के लिये आजीवन कार्य करते रहे और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुये भी राष्ट्रपति भवन में विश्वकर्मा समाज के लोगों के लिये एक अलग सेल बनाया था जिसका प्रभारी श्री परमानंद पांचाल को बनाया था।

सन् 1980 में जब उत्तर प्रदेश में पुलिस के द्वारा दस्यु उन्मूलन के नाम पर पिछडी जातियों और गरीबों को इन्काउन्टर में मारा जा रहा था तो उस समय ज्ञानी जी देश के गृहमंत्री थे।उस समय उत्तर प्रदेश की विधानसभा मे नेता विरोधी दल माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने फर्जी इन्काउन्टर का सवाल विधानसभा में उठाया था और फर्जी इन्काउन्टर की सूची गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह को सौपी थी।उनके जांच कराने पर उत्तर प्रदेश में फर्जी इन्काउन्टर रुका था।

ज्ञानी जैल सिंह अंग्रेजी में भी पढ़े लिखे थे लेकिन सच्चा देशभक्त और हिन्दीप्रेमी होने के कारण हमेशा मातृभाषा हिन्दी में ही अपना सरकारी कामकाज करते थे।एक बार संघ लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी लागू करने के प्रश्न पर जब विपक्षी दलों द्वारा धरना दिया जा रहा था तो ज्ञानीजी पूर्व राष्ट्रपति होने के बाद भी हिन्दी लागू करने के लिये संघ लोक सेवा आयोग के सामने धरने पर बैठे थे।राष्ट्रपति रहते हुये वह कभी रबर स्टैंप नही बने और केन्द्र सरकार के इंडियन पोस्टल बिल पर नागरिकों के मूल अधिकार के हनन के प्रश्न पर असहमत होकर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी की बात नही मानी और हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया।

उनके इस कदम से उन्हे देश के एक सशक्त राष्ट्रपति के रूप में उन्हें याद किया जाता रहा है।हांलाकि प्रधानमन्त्री नाराज हो गये थे और राष्ट्रपति पद से हटने के बाद उन्हें उनके उपेक्षा का शिकार भी होना पडा था। एक बार कानपुर के विश्वकर्मा सम्मेलन मे उन्हे आमन्त्रित किया गया था और वह सम्मेलन में आकर विश्वकर्मा समाज के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित किये थे। मेरा अनुरोध है कि दिनांक 5 मई 2018 को झारखण्ड के सभी जिला मुख्यालय में विश्वकर्मा समाज के लोग अपने पूर्वज ज्ञानी जैल सिह की जयन्ती मनाकर उनके ब्यक्तित्व और कृतित्व को याद करे और उनके आदर्शों पर