युगदृष्टा पं. दिनदयाल उपाध्याय

मेरी कोई यह भावना नही है पंडित दिनदयाल उपाध्याय की तुलना स्वर्गीय श्रीमति इंदिरा गांधी से करूं, किन्तु आज के समय में नजर अंदाज भी कैसे किया जा सकता है। इसे संयोग ही कहे पंडित दिनदयाल उपाध्याय का जन्म शताब्दी वर्ष का भारतीय जनता पार्टी समापन करने जा रही है। पंडित जी के जन्म को सौ वर्ष पूर्ण हुए।

उन्नीस नवंबर दो हजार अठारह के इंदिरा गांधी जी की जयंती है उनके भी सौ वर्ष पूर्ण हुए । कहा जाता है कुछ लोग महान पैदा होते है, कुछ लोग महानता अर्जित करते है , किन्तु कुछ दशकों से कुछ लोगों पर महानता थोप दी जाती है। पंडित दिनदयाल उपाध्याय उनमें से दूसरी श्रेणी के थें। न तो वे किसी समृध्द घराने में पैदा हुए न ही वे धनाड़्य थे, न ही उनके पास कोई पद था। न उनके पिता चाचा मामा ऊंचे राजनैतिक पदों पर थें।

बाल्य काल कठिनाईयों से गुजरा, पढ़ाई हेतु अनेक स्थान बदले मेधावी थे। प्रशासनिक परीक्षा पास थे, इसके बावजूद वे स्वतंत्र भारत के नेतृत्वकर्ता , राजनीतिज्ञों की अग्रिम पंक्ति में पहुंचे । आज देश के अनेक नेता, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति के विषय में पूछा जाए तो लोग बंगले तलाशने लगेंगे। मृत्यु के बाद विस्मृति के गर्भ में समा गए। दिनदयाल उपाध्याय सच्चे महापुरूषों में वास्तव में दैदिव्यमान नक्षत्र के समान हुए। आज अब पूरा भारत दिनदयाल को जानने लगा है, मानने लगा है उनके विचारों पर देश व प्रदेश की पर सरकारे चल रही है, उनके विचार का प्रसार हो रहा है।

एक ओर स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा जी की जयंती आ रही है। उसके सांसद दहाई के आकडें में सिमट कर रह गए है आज उनके विचार समापन पर है। जो दो लोकसभा सीट में थे आज विराट का रूप धारण कर पुन: बहुमत के यशस्वी होने को तत्पर है। भारतीय जनता पार्टी आज विश्व की सबसे बडी राजनैतिक पार्टी बनकर उभरी है, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का डंका विश्व में गुंजने लगा हैं। भारत की जनता का लगने लगा स्वतंत्रता के पश्चात्, इंदिरा जी, अटल जी के बाद कोई दमदार नेतृत्व देश को प्राप्त हुआ।

नेहरू और इंदिरा की विरासत को सम्भालने वाले को कोई बच्चा कहता है, तो कोई नासमझ कहता है, कुनबे के बुजुर्ग भी सहसूस करने लगे है कि ऐसा ही चलता रहा तो इंडियन नेशनल कांग्रेस खण्डहर हो जाएगी। खण्डहर होने पर लोग उसके ऊपर से चलते है व ईटें उठा ले जाते है, ऊपर से रास्ता बना लेते है। छोटे-छोटे प्रांतीय, क्षेत्रीय दलों से आज देश व्यापी कांग्रेस को समझौता करना पड़ता है।