क्या होगा तेरा भारत…?

  • अच्छे दिन आने वाले हैं…!
  • दूर होगी भारत के हर क्षेत्र से गरीबी…!
  • दूर होगी महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी…!

राज शेखर भट्ट, सम्पादक

बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को तो सरकार कम नहीं कर पा रही है, गरीबी क्या खाक दूर करेगी। क्योंकि सरकार के पास ‘‘अच्छे दिन आने वाले हैं’’ जैसे जुमले ही रह गये हैं। एक तरफ गरीब और दूसरी तरफ सरकार भी कर्ज तले डूबी जा रही है। इस वित्तीय वर्ष में 5300 करोड़ रूपये कर्ज के तले डूबी हुयी है सरकार और 6600 करोड़ कर्ज की सीमा है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि राज्य सरकार की आर्थिक स्थिति खराब है।

कर्ज में आना भी लाजिमी है। राज्य में इससे पूर्व कांग्रेस सरकार थी और वर्तमान में भाजपा सरकार है। क्या हुआ और किसने किया, हमें भी नहीं पता कि क्यों सरकार कर्जे में है। यह भी हो सकता है कि पिछली सरकार कांग्रेस के कर्जे का वहन वर्तमान सरकार भाजपा करते हुये विकास को धरातल पर ला रही हो। यह भी हो सकता है कि भाजपा के अन्दर भी गुटबाजी चल रही हो और अपने खर्चों तले एकलव्य से अंगूठा मांगा जा रहा हो।

बहरहाल, बात गरीबी की करें तो एक क्षेत्र से ही गरीबी की बात हो तो बात भी थी, लेकिन चारों ओर से गरीबी के तीर छूटें तो भय तो होता ही है। कहने का तात्पर्य है कि सरकार की अधिकांश योजनानुसार शहरी क्षेत्र तो चमक उठे लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों को अंधेरा क्यों? ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी पूर्ण नहीं है लेकिन गांवों में सड़कें नहीं, बिजली नहीं, चिकित्सा नहीं, शिक्षा नहीं, जो कि मूलभूत सुविधाओं में गिनी जाती हैं।

सूत्रों के अनुसार, जिन ग्रामों में सड़क व्यवस्था नहीं थी, उन ग्रामों को सड़क से जोड़ा गया। रोना तब आता है, जब 20-22 साल हो जायें और उस सड़क का डामरीकरण न हुआ हो। दुश्वारियां देखो, ग्रामीण क्षेत्र और मौसम की मार, या तो सड़क गिर रही या सड़क के ऊपर पहाड़, सुध लेने वाला कोई नहीं।

सरकारी शिक्षा व्यवस्था की टूटती कमर पर भी मरहम लगाना जरूरी है। क्योंकि जरूरी नहीं है कि अच्छी शिक्षा निजी विद्यालय से ही मिलेगी। आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में कई सरकारी विद्यालय ऐसे हैं, जहां बच्चे है लेकिन शिक्षक नहीं और जहां शिक्षक हैं वहां बच्चे नहीं हैं। इसी के ऊपर मेरे पिताजी स्व. श्री चन्द्र शेखर भट्ट की एक कविता की चंद लाईनें भी आपको बता दू कि…

क्या होगा तेरा भारत, कब तक उतारूं तेरी आरत।
यहां-वहां सब ठौर, कुकुरमुत्ते जम गये। अंधे सेनानायक, काने राजा बन गये।
गूंगे दुभाषी हो गये, पढ़े-लिखे फैशनेबल, अनपढ़ टीचर बन गये।
देखो शिक्षा नीति को, वैज्ञानिक कुरीति को। गरीब पढ़ नहीं पायेगा, अमीर कर नहीं पायेगा।
खाई इसमें बढ़ेगी, दिन-दूनी फूलेगी।
स्कूल है तो बच्चे नहीं, बच्चे हैं तो टीचर नहीं।
क्या होगा तेरा भारत, कब तक उतारूं तेरी आरत।

बहरहाल, सोचने वाली बात यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्र के गरीब लोग निजी विद्यालयों का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। क्योंकि जिस पैसे में 6 माह का राशन खाते हैं, उतनी तो निजी विद्यालयों में 1 माह की फीस है।

अब बात करें चिकित्सा की तो इतना कहना भी गलत नहीं होगा कि ग्रामीण क्षेत्र बीमार है। चिकित्सा व्यवस्था तो है लेकिन गांवों से दूर और गांवों में प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा भी नहीं। यदि किसी का स्वास्थ्य अत्यंत गंभीर अवस्था में है तो वो चिकित्सालय तक कैसे पहुंचेगा। उदाहरण के लिए मैं अपने ग्रामसभा का ही उदाहरण दे दूं, जिसकी स्थिति मुख्य चिकित्सालय से 25 किलामीटर की दूरी पर है। जिसमें 22 किलोमीटर पक्की सड़क और 3 किलोमीटर कच्ची सड़क का रास्ता है। जिसे ढाई घण्टे में पार करते हुए चिकित्सालय पहुंचा जा सकता है। यदि रास्ते में ही मरीज दम तोड़ दे तो……..!

अब अच्छे दिन तो आने वाले हैं। अच्छे नोट भी आ गये, अच्छा जीएसटी भी आ गया, अच्छा आधार कार्ड भी आ गया, अच्छी योजना भी आ गयीं, अच्छी परियोजना भी आ गयीं और अच्छे नीति-नियंता भी आ गये। बस देखना है कि बेरोजगारी, महंगाई को समाप्त करते हुऐ अच्छे दिन कब आते हैं।


नोट- उपरोक्त उदाहरण केवल स्वयं के लिए नहीं दिया गया है। सभी विधायकों से अनुरोध है कि अपनी विधायक निधि का सदुपयोग तो आप लोग कर ही रहे हैं, लेकिन यदि ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत सुविधाओं की ओर भी नजर करें तो अत्यंत कृपा होगी। क्योंकि ग्रामीण जनता हमारे देश की रीढ़ हैं और कृषि भारत की पहचान है, चुनावी जुमला नहीं।