व्यंग्य: हम सब निठल्ले!

ललित मोहन राठौर ‘शौर्य’

dbs-lalitअजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम। दास मलूका कह गए सबके दाता राम। कितनी प्रेरणादायी पंक्तियां हैं । जो हमारे भीतर कूट-कूट कर निठल्लापन घुसने का काम करती हैं और ये पंक्तियां हम सब निठल्लों पर भी सटीक बैठती हैं। आज 21वीं सदी में भी हम निठल्ले होते जा रहे हैं, निठल्ले हो चुके हैं या हम सब जो काम कर भी रहे हैं तो हमारे मन के किसी कोने में निठल्ले बनने की मंशा जन्म लेती रहती है। यह कोई भविष्यवाणी नहीं है, परन्तु ये दावे के साथ और गुरु मलूकदास जी की कसम खाते हुए कह सकता हूं कि एक दिन हमारा ये देश पूर्णरूप से निठल्लों की गिरफ्त में होगा। और ये भी सत्य है की वर्तमान के निठल्लों से ही भविष्य के महानिठल्लों का उदय होगा। हम जैसा बोते हैं वैसा ही काटते हैं।

निठल्ला बोयेंगे निठल्ला काटेंगे। पर निठल्ला ना तो बोता है और ना ही काटता है। निठल्ला तो निठल्ला रहता है। निठल्लेपन का अपना ही मजा है वो शाही जीवन जीते हैं। वो बिना कुछ किये ही बहुत कुछ पाना चाहते हैं। वो भाग्य पर विश्वास करते हैं। कई बार परिस्थितियां आदमी को निठल्ला बना देती हैं। आदमी स्वयं निठल्ला बनना चाहता है इसलिए परिस्थितियाँ उसे ऐसी नजर आने लगती हैं, ऐसा भी कहा जा सकता है। आप मुझ से ये प्रश्न कर सकते हैं कि आपके पास कोई सर्वे रिपोर्ट है? किस संस्था एजेंसी ने ये रिपोर्ट पेश की है।

अगर आपके मन में ये सब प्रश्न नहीं कौंध रहे और आप बिना किसी सोच-विचार के मेरी बातों से सहमत हैं, तो समझ लीजिये कि आप भी निठल्लेपन की ओर अग्रसर हैं और बहुत जल्द ही निठल्ले हो जायेंगे। अरे साहब क्यों? कैसे? की आदत डालिए। गलत को गलत क्यों है ये पूछने का साहस अपने भीतर जगाइये। खैर आपको निठल्लेपन की बानगी दिखाता हूं। ताकि आपको लगेगा कि मेरी बात में दम है। सबसे पहले तो हमारे माननीयों का निठल्लापन देखिये, चुनाव जितने के बाद पांच साल तक अपना मुंह नहीं दिखाते।

संसद/विधानसभा में खर्राटे भर के सोते रहते हैं। विपक्ष संसद/विधानसभा चलने नहीं देता, सरकार चलाना नहीं चाहते। इन सबके निठल्लेपन के कारण देश की जनता न जाने कितनी दिक्कतों का सामना कर रही है। उधर सरकारी कर्मचारी-अधिकारी प्रायः निठल्ले बैठे रहते हैं। उनकी फाइलें भी महीनों तक टेबिल पर निठल्ली सोती रहती हैं। इसीलिए कुछ घंटों अथवा कुछ दिनों का काम महीनों तक खिच जाता है। अधिकांश स्कूलों में मास्टर जी के निठल्लेपन का प्रभाव बच्चों पर स्पष्ट देखा जा सकता है। इन सबके साथ आम जनता भी निठल्ली हुई जा रही है। महानगरों में प्रातःकाल निठल्लेपन का चरम दिखाई देता है।

पता नहीं हम भारतवासियों की जीन में सफाई का कीड़ा कब घुसेगा। हम इतने निठल्ले होते हैं कि सामने डस्टबिन के होने के बावजूद भी कूड़ा खुले में न्योछावर कर देते हैं। ऐसे एक नहीं हजारों दृश्य हैं जो हमारे निठल्लेपन को परिभाषित करते रहते हैं। हम बैठे-बैठे चांद तारे तोड़ लेने की बातें कर लेते हैं। पर निठल्लापन ऐसा की समय आने पर हम से गीली मिट्टी में उंगली नहीं रोपी जाती। निठल्लेपन का प्रभाव हमारे कार्यों के साथ-साथ हमारे मस्तिष्क पर भी पड़ रहा है। आज हमें गर्व होता है अपने निठल्लेपन पर। कोई हमें निठल्ला बोल दे तो हम मुस्कुरा देते हैं। ये हमारी मूक सहमति होती है कि वास्तव में हम निठल्ले हैं। हम निठल्ले, हम सब निठल्ले। आप भी कुछ काम कीजिये। साथ ही व्यंग्य को पूरा पढि़ए, न कि हेडिंग पढ़कर निठल्ले होने का परिचय दीजिये।