असहिष्णुता का प्रकटोत्सव

ललित शौर्य

Lalit Mohan Rathorबेचारी असहिष्णुता पिछले 50-60 सालों से पता नहीं कहाँ मुंह छिपाए बैठी थी। उसे पूछने वाला तक कोई नहीं था। वो किस अँधेरे कारागार में सिसक रही थी कोई नहीं जानता। लेकिन एक दिन सबका आता है। फिर से एक बार सहिष्णुता की बड़ी बहन असहिष्णुता बड़ी चर्चा में है। अब सहिष्णुता के साथ वही व्यवहार हो रहा है जो अब तक असहिष्णुता के साथ होता आ रहा था। कुछ लोग तो यहाँ तक बोल रहे हैं की विगत डेड़ साल में असहिष्णुता के अच्छे दिन आ गए हैं। वो खूब फल फूल रही है। दरअसल असहिष्णुता का शिगूफा कुछ बड़े लेखकों, फिल्म निर्माताओं, न्यूज़ चैनलों या पार्टी विपक्ष का है।

अगर गिद्ध द्रष्टि से विवेचना की जाय तो असहिष्णुता के अच्छे दिन लाने का श्रेय इन्हीं लोगों को जाता है। ये लोग जमकर असहिष्णुता का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। उसे देश-विदेश की सैर करवा रहे हैं। हमारे देश की कथित असहिष्णुता की चर्चा अब विदेशों के अखबारों की शोभा बड़ा रही है। खैर पहले भी इस देश के कई लोग विदेशों में असहिष्णुता का खूब प्रचार करते देखे सुनें गए हैं। उनकी दाल रोटी ही इसी से चलती है। ये असहिष्णुता अचानक नहीं आ गई। बल्कि इसका आह्वाहन किया गया है। देश के अनेकानेक कथित महाबुधिजिवियों , विपक्षी नेताओं,कुछ फिल्म अभिनेताओं और निर्देशकों के पिछले डेड़ साल के महामंथन से असहिष्णुता का आना हुवा है।

अनेक लेखक और निर्देशक कलाकार सरकारी पुरस्कार वापस कर अपने को इस मंथन का नीलकंठ घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं। ये खुद को शंकर बनाने पर तुले हैं पर ये किसी भी एगिंल से भोले बिलकुल भी नहीं लगते। ये बड़े लेखकों का भी कुछ समझ नहीं आता ये हर चीज को अलग टाइप से सोचते हैं। अब अपुन के छोटे से भेजे में समझ नहीं आ रहा है कि पिछले 60 सालों में देश के नजदीक असहिष्णुता फटकी तक नहीं। सिख दंगे हों, कश्मीरी पंडितों को उन्हीं के घरों से लज्जित कर निर्वासित करने का मामला हो , गोधरा में यात्रियों को ज़िंदा जला देने का मामला हो या अभी लेटेस्ट दामिनी काण्ड हो , इतना सब कुछ हुवा है अतीत में लिखा जाए तो कागज़ और स्याही कम पड़ जाए। पर असहिष्णुता की हिम्मत ही नहीं हो पाई की वो अपने देश में घुस सके। पहले दंगे, हत्याएं लूट पाट भी बड़ी ही सहिष्णु तरीके से हुवा करती थी। लोग बड़े प्यार से चाक़ू मार कर अतड़ियाँ बाहर निकाल देते थे।

कश्मीरी पंडितों को भी बड़ी ही सहिष्णुता से बेघर कराया गया, उनके आवास लुटे गए, महिलाओं के साथ अमानवीय करतूतें की गई। ये सब इतनी सावधानी पूर्वक हुवा कि असहिष्णुता को कानों कान खबर नहीं हुई। लेकिन अब न्यूज़ चैनल वालों और इन कथित पुरस्कार प्राप्त हाई प्रोफाइल लेखकों की मानें तो देश में असहिष्णुता चरम पर है लबालब है। असहिष्णुता उछल-कूद कर रही है। भरे हुए घड़े की तरह छलक कर बाहर गिरने को आतुर है। इसी से चिंतित होकर इन लेखक टाइप पुरस्कार विजेताओं ने अपने तमगे वापस कर दिये हैं। खैर रुपये कम ही लोगों ने वापस किये हैं ऐसा सुनने में आ रहा है । अरे करें भी कैसे उन रुपयों की तो कब की पार्टी सार्टी कर ऐसी की तैसी कर दी गई है।

एक अन्दर की बात बताऊँ अपुन ने तो यहाँ तक सुना है कि इन बड़े-बड़े लेखकों का सरकार ने फ़ोकट में मिलने वाला हुक्का पानी भी बंद कर दिया है। इसलिए भी ये तिमिला गए हैं। अरे साहब ये असहिष्णुता नहीं तो और क्या है अब तक पचासों वर्षों से ये लोग बंद A.C कमरों में खूब चिंतन मनन करते रहे, लग्जरी गाड़ियों में घुमते रहे। विदेशों के दौरे लगाते रहे अब अचानक ये सब बंद हो जाए तो बन्दे के लिए इससे बड़ी असहिष्णुता क्या हो सकती है। वास्तव में किसी के मुंह से निवाला छिनना अच्छा नहीं है। ये सरकार वास्तव में असहिष्णु है। लेखक बिरादरी के होने के नाते मुझे भी इन लोगों से हमदर्दी है। मैं भी असहिष्णुता का प्रकटोत्सव मनाऊंगा। बचपन में रामलीला में पुरस्कारर के रूप में मिली चवन्नी लौटाऊंगा । सरकार पर लांछन लगाऊंगा। अखबार में फोटू खिचावाऊगा। असहिष्णुता की भी हद होती है । कईयों के दिलटूट रहें हैं, पुराने फोड़े फूट रहें हैं।