कठुआ की बर्बरता

उन्नाव में सरकारी खामोशी कष्टदायक

देश में हाल की दो घटनाओं ने हर संवेदनशील इनसान को उद्वेलित किया है। पहली घटना में जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में एक नाबालिग से सामूहिक दुराचार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। दूसरी घटना में उन्नाव के विधायक पर नाबालिग लड़की के साथ दुराचार का आरोप है और आरोप लगाने वाली लड़की के पिता की पिटाई के बाद मौत हो गई। घटना बीते साल जून की बताई जाती है। मगर इस मामले में देशव्यापी बवाल के बाद भी सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। घटना के राजनीतिक निहितार्थ भी हैं और रंजिशन मामले को तूल देने के आरोप भी। मगर गत दस जनवरी को कठुआ में एक आठ साल की बच्ची के अपहरण और सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या की घटना विचलित करने वाली है। बकरवाल समुदाय की इस लड़की के साथ जो बर्बरता हुई वह मानवता को शर्मसार करती है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि पुलिस न केवल अपराधियों को संरक्षण देती रही बल्कि कुछ पुलिसकर्मी इस अपराध में शरीक रहे। इस मामले को सांप्रदायिक रंग देकर जिस तरह घाटी में विवाद को हवा दी जा रही है, वह भी दुर्भाग्यपूर्ण है। कुछ मंत्रियों का आरोपियों के पक्ष में खड़ा होना और उनकी गिरफ्तारी के विरोध में बंद में शामिल होना दुर्भाग्यपूर्ण है।

कठुआ की घटना सीधे-सीधे एक सुनियोजित आपराधिक घटना है, अपराधियों को कड़ा दंड मिलना ही चाहिए। मानवता को शर्मसार करने वाली घटना के दोषियों को किसी तरह रियायत देने की गुंजाइश ही नहीं बचती। सबसे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण अपराध को सांप्रदायिक रंग देना है। जब कहा जाता है कि कानून अपना काम करेगा तो कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना चाहिए। साथ ही बकरवाल समुदाय की रहने की समस्या का भी स्थायी समाधान करना चाहिए, जिसके लिये आतंकित करने के मकसद से घटना को अंजाम दिया गया। उन्नाव में पिछले साल जून की उस कथित घटना का सच ?भी सामने आना चाहिए, जिसमें पीडि़ता ने विधायक और उसके सहयोगियों पर बलात्कार का आरोप लगाया था। सवाल यह भी है कि क्यों हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि यूपी में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। यह भी कि जब विधायक के खिलाफ पास्को की धाराओं में केस दर्ज किया गया तो उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। यदि विधायक पर गांव की रंजिश के तहत ये आरोप लगे हैं तो उसकी हकीकत भी सामने आनी चाहिए। कार्रवाई उनके खिलाफ भी सख्त होनी चाहिए, जिनकी पिटाई से पीडि़ता के पिता की मौत जेल में हुई। विधायक होने का मतलब यह कतई नहीं है कि पुलिस-प्रशासन उसके ?इशारे पर काम करे।