चित्रकूट : स्थान एक, महत्व अनेक

dbs-chitrakoootचित्रकूट स्थल का पौराणिक महत्व है। महत्व की बात करें तो यह स्थल धार्मिक होने के साथ-साथ पर्यटन में भी अपनी पहचान बना चुका है। यदि धार्मिक दृष्टि से देखें तो, सभी को अवगत करा दें कि भगवान श्रीराम ने यहां पर अपने वनवास के 11 वर्ष व्यतीत किए थे और सीता जी ने अग्नि परीक्षा दी थी। प्राचीन भारत के कवियों− कालिदास, वेदव्यास, तुलसीदास, कबीर और रहीम ने भी इस धरती के सौन्दर्य की प्रशंसा की है। चित्रकूट का कुछ भाग उत्तर प्रदेश व कुछ भाग मध्य प्रदेश में सम्मिलित है।

इतिहासकारों के अनुसार तथा धर्म की किताबों के अनुसार कहा जाता है कि बहुत समय पहले जब जंगलों ने चित्रकूट की भूमि को ढंका हुआ था तब नदियों के किनारे सुंदर कमल खिला करते थे तब श्रद्धालुओं का विश्वास था कि वे इस पवित्र जल में स्नान करके चिंताओं व पापों से मुक्त हो जाते थे। रामायण में भगवान श्रीराम ने जगह−जगह बताया है कि यहां रहते हुए उन्हें कोई कष्ट नहीं हुआ। इस स्थान के बारे में पहले स्वर्ण युग के संत श्री वाल्मीकि ने लिखा। उस समय यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर था। यहां पवित्र व ज्ञानी आत्माएं मोक्ष के लिए वास करती थीं। उस समय केवल पक्षियों के स्वरों की गूंज ही यहां सुनाई देती थी। 16वीं शताब्दी के अंत में यहां मंदिर व मठ बनाए गए।

पानी की धारा पहाड़ से हनुमान जी की बायीं भुजा पर गिरती है लेकिन यहां पहुंचने के लिए लगभग 360 सीढि़यां चढ़नी होती हैं। उसके बाद मुगल संस्कृति को झलकाता हुआ श्रीबालाजी का मंदिर है।

यह स्थान एक ऐसार स्थान है, जहां पर पूर्णमासी, दीवाली तथा रामनवमी व दशहरे आदि उत्सव मनाए जाते हैं। ये उत्सव केवल खुशी व उल्लास के लिए नहीं हैं बल्कि इन उत्सवों की प्रत्येक पृष्ठभूमि में धर्मगाथाएं छिपी हैं। ये गाथाएं साहस, बलिदान, त्याग, स्नेह व धैर्य का प्रतीक हैं। यह बुराई पर अच्छाई की, झूठ पर सच की और सही पर गलत की विजय हैं। यहां आने वाले भक्तगण कामदामगिरी की परिक्रमा करना नहीं भूलते। इससे उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती है। चित्रकूट के दक्षिण में लगभग 16 किलोमीटर दूर एक पवित्र स्थान है जहां पर महर्षि आत्रे जैसे पूज्य संतों के आश्रम हैं। यहां पर भिक्षुक, साधु लय में गाते हुए मिलते हैं। इस एकांत में तपस्वियों को असीम सुख−शांति प्राप्त होती है। संसार की जटिलताओं व भौतिकता से कुछ देर के लिए छुटकारा मिलता है।

रामायण में भगवान श्रीराम ने जगह−जगह बताया है कि यहां रहते हुए उन्हें कोई कष्ट नहीं हुआ। इस स्थान के बारे में पहले स्वर्ण युग के संत श्री वाल्मीकि ने लिखा। उस समय यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर था।

अलौकिकता की पहचान की बात करें तो यहां गुप्त गोदावरी नामक पवित्र गुफा है जहां ‘जानकी कुंड’ नामक प्राकृतिक कुंड है। गुफा में से पानी कुंड में गिरता है फिर अदृश्य हो जाता है। इसलिए इसे गुप्त गोदावरी कहा जाता है। गुफा के अंदर की कलात्मकता किसी कुशल कारीगर के हाथों का कमाल प्रतीत होती है। रामघाट से बिल्कुल पहले एक छोटी पहाड़ी पर हनुमान जी का मंदिर है। यहां मंगलवार को श्रद्धालुओं की काफी भीड़ लगती है। पानी की धारा पहाड़ से हनुमान जी की बायीं भुजा पर गिरती है लेकिन यहां पहुंचने के लिए लगभग 360 सीढि़यां चढ़नी होती हैं। उसके बाद मुगल संस्कृति को झलकाता हुआ श्रीबालाजी का मंदिर है। चित्रकूट तक आने के लिए निकटतम हवाई अड्डा खजुराहो है। रेल मार्ग से चित्रकूट झांसी से 261 किमी और मानिकपुर से 31 किमी दूर है। जबलपुर, वाराणसी, हजरत निजामुद्दीन व हावड़ा से भी चित्रकूट धाम के लिए रेल सेवाएं उपलब्ध हैं। उत्तर व मध्य भारत के विभिन्न स्थानों से भी चित्रकूट के लिए बसें आती हैं।