व्यंग्यः सच बोलना गुनाह है…?

  • कौन अच्छा-कौन बुरा, कुछ पता नहीं
  • हस्पताल और अस्पताल की सेवायें
  • सरकारी डॉक्टर, प्राईवेट डॉक्टर और डॉक्टर नरसीराम

राज शेखर भट्ट, सम्पादक

आप तस्वीर में देख ही रहे होंगे कि डॉ. नरसीराम जख्मी जूतों का हस्पताल खोले बैठे हैं। यूं भी कहा जा सकता है कि यहां फटे-पुराने, टूटे-फूटे, कटे-जले जूतों को सही अवस्था में लाया जाता है। बहुत पुण्य का कार्य है, चाहे वो मोची हो या चिकित्सक हो, जो कि जख्मी या बीमारी को रोगमुक्त करके उसकी स्थिति-परिस्थिति को वास्तविकता से रूबरू करावाता हो। अपना नजरिया इस हस्पताल की ओर करें या अस्पताल की ओर, कुछ अलग नहीं है लेकिन सरकारी अस्पतालों की हालत तो इस हस्पताल से भी खराब नजर आती है। सरकारी अस्पतालों और इस हस्पताल में कोई अन्तर नजर नहीं आता, ऐसा क्यो?

सर्वविदित है कि सरकारी अस्पताल ही ऐसी जगह है, जहां गरीब लोगों का ईलाज निजी अस्पतालों की अपेक्षा कम दरों में होता है। अच्छी बात यह भी है कि बीपीएल कार्डधारकों को मुफ्त ईलाज की सेवा भी प्रदान होती है। इसे सरकार का एक अच्छा कदम, अच्छी नीति और अच्छी पहल भी कहा जा सकता है। परन्तु सरकारी अस्पतालों का उल्लेख अपने नजरिये से करूं तो सरकारी अस्पतालों से तो डॉ. नरसीराम का जख्मी जूतों का हस्पताल अच्छा है, जो कि सेवा तो पूरी देता है। क्योंकि डॉ. नरसीराम का हस्पताल किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता।

कहने का तात्पर्य है कि सरकारी अस्पताल में इलाज के लिये जाओ और वहां आप भर्ती हो चुके हैं। इलाज हो रहा है परन्तु इंजेक्शन और दवा नहीं हैं, बाहर जाओ और मेडिकल स्टोरों के चक्कर लगाओ। साथ ही वर्तमान की स्थितिनुसार, आप सरकारी अस्पताल में इलाज के लिये जाओ और वहां से आपको निजी अस्पतालों की लिस्ट देकर रैफर कर दिया जाता है। सोचने वाली बात है कि क्या सरकारी कर्मचारी काम ही नहीं करना चाहता या सरकार ने अपने अस्पतालों के लिए दवा, इंजेक्शन और मशीन मुहैया करवाना ही छोड़ दिया। क्या गरीब लोगों और जो बीपीएल की श्रेणी में आते हैं, वो निजी अस्पताल में अपना ईलाज करवा पायेगा या मौत को गले लगायेगा?

चलो छोड़ो…! अब तो आप निजी अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं। सबसे पहले तो भर्ती होने की फीस से जूझना पड़ेगा। आगे चलें और भी तथ्य सामने आते हैं, जो अंतिम छोर पर एक जगह जाकर खड़े हो जाते हैं। निजी अस्पतालों में मिलने का समय भी पाबंदी से भरा हुआ है, लेकिन अमीरों के लिये ये नियम लागू नहीं होता। मरीज के लिए भोजन भी बाहर से नहीं आयेगा, अस्पताल का ही दिया जाएगा। चलो अच्छा है, कुछ नहीं से कुछ भला।

खैर, सारी कश्मकश से जूझते हुये निजी अस्पताल में भर्ती भी हो गये और ईलाज भी शुरू हो गया। परन्तु दिक्कत अभी समाप्त नहीं हुयीं हैं। निजी अस्पताल में भी आपको इंजेक्शन और दवाओं की कमी नजर आएगी। बस फिर क्या है, लगाओ मेडिकल स्टोरों के चक्कर। पिछली पंक्तियों में बताया था कि ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो अंतिम छोर पर एक जगह जाकर खड़े हो जाते हैं और हुआ भी वही। सरकारी अस्पताल में जाओ या निजी अस्पताल में जाओ, मेडिकल स्टोरों के चक्कर जरूर लगाने हैं। किसी ने सही कहा है कि ‘‘तेरे बिना मैं नहीं, ये बात है सही मगर मेरे बिना तू भी नहीं।’’

अब तो समझ आ गया होगा आपको कि डॉ. नरसीराम का जख्मी जूतों का हस्पताल कितना अच्छा है। अपना जख्मी जूता लेकर जाओ तो डॉक्टर साहब दवा और इंजेक्शन के लिए इधर-उधर भगाते नहीं हैं। क्योंकि ईलाज का सारा सामान उनके पास मौजूदा स्थिति में उपलब्ध रहता है। बहरहाल, मेरा उद्देश्य अस्पताल और हस्पताल को आपस जोड़ना या दोनों में तुलनात्मक प(ति से सकारात्मक या नकारात्मक भाव पैदा करना नहीं है। मेरे इस लेख का मुख्य बिन्दु यह है कि जब मरीज को निजी अस्पताल में ही जाना है अथवा सरकारी चिकित्सकों द्वारा भी मरीज को निजी अस्पतालों में रैफर करना है तो सरकारी अस्पताल खोलकर सरकार क्यों अपना बजट बर्बाद कर रही है।

आखिर सरकार द्वारा सीएमओ, सीएमएस, डॉक्टरों, नर्स, वार्ड ब्यॉय, वार्ड गर्ल, सफाई कर्मियों आदि का खर्चा क्यों उठाया जा रहा है। बंद कर दो सब, कुछ नहीं होगा, बेरोजगारी थोड़ी और बढ़ जायेगी। नौकरी के लिए भटकने वाले लोगों में 10 से 15 हो जायेंगे। एक बात यह भी कि जब बड़ी-बड़ी बीमारियों के लिये सरकारी अस्पताल में कुछ नहीं है और निजी अस्पताल में ही जाना है तो बुखार, खांसी, सर्दी-जुकाम, पीलिया, निमोनिया और शरीर के दर्दों को तो मोहल्ले का बंगाली डॉक्टर भी 40-50 रूपये में दूर कर रहा है।

जब गरीबों की सुध लेनी नहीं और एनआरएचएम जैसे बड़े घोटालों को करके अपना घर भरा जाना है तो डॉ. नरसीराम ही अच्छा है, जो अपने हस्पताल से जख्मी जूतों की जिन्दगी को उजागर तो कर रहा है। कम से कम नरसीराम की आदत ऐसी तो नहीं कि मरीज के मरने के बाद उसे वेंटिलेशन रूम कई दिनों तक रखकर पैसे कमाने का जरिया बनाया जाय। क्योंकि नरसीराम के पास जख्मी जूता आते ही वो उसकी प्राथमिक चिकित्सा करता है और तुरंत बता देता है कि इसका स्वास्थ्य ठीक होगा या नहीं?

अब अंत में इतना ही कहा जा सकता है कि हमारी देवभूमि में मंत्री/मुख्यमंत्री बदलते रहते हैं। किसी ने हमारे प्रदेश को चिकित्सा प्रदेश बता दिया किसी पर्यटन प्रदेश। किसी ने सांस्ड्डति प्रदेश बोला तो किसी ने लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की बात कही। कोई कह गया युवाओं को रोजगार मिलेगा तो किसी ने महिलाओं को चुनावी मुद्दा बना दिया। किसी ने आरक्षण की छांव तले चुनाव जीत लिया तो किसी ने राज्य की राजधानी के नाम पर जनता को भरमाया। लेकिन अच्छा क्या हुआ, ईलाज किस क्षेत्र में हुआ, बेहतर समय कहां आया।