चुनावी समर में अमीरी का गरीब नजारा

पाकिस्तान में चुनावी अभियान में रंगत का नजारा है। जितने भी उम्मीदवार हैं, उन्होंने अपनी-अपनी पूंजी, कारोबार और ज़मीन की वैल्यू चुनावी कमीशन को कसमें खाके सच-सच बता दी है। जिन्हें हम अमीर समझते थे वो बेचारे तो हम जैसे मिडिल या अपर-मिडिल क्लासिए निकले और जिन्हें हम गऱीब समझकर धत कह दिया करते थे, उनके पास इतना धन है कि पाक चाहे तो आईएमएफ़ को कर्ज दे दे।

जैसे पंजाब के जि़ला मुजफ़्फ़रगढ़ के एक आज़ाद उम्मीदवार मोहम्मद हुसैन शेख़ ने संपत्ति घोषणापत्र में लिखा है कि वो 40 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा की ज़मीन के मालिक हैं। इस तरह वो चुनाव लडऩे वाले सबसे अमीर उम्मीदवार ठहरे।

जबकि जाने-माने इमरान ख़ान ने बताया कि इस्लामाबाद की बनी गाला पहाड़ी पर उनका तीन सौ कनाल का घर 30 लाख रुपये का है, कोई निजी गाड़ी नहीं, 14 घर बाप-दादा से मिले हैं, हवाई-जहाज़ का टिकट यार-दोस्त खरीदकर दे देते हैं। इतने गऱीब हैं कि पिछले वर्ष बमुश्किल 1 लाख 4 हज़ार रुपये इनकम टैक्स दे पाए।

आसिफ़ जऱदारी के बारे में जाने क्या-क्या उलट-सुलट उड़ाई जाती रही कि वो सिंध की आधी शूगर मिलों के मालिक हैं, दुबई और ब्रिटेन में हवेलियां हैं, हज़ारों एकड़ ज़मीन है, अरबों रुपयों की बेनामी इनवेस्टमेंट है, मगर ऐसा कुछ भी नहीं।

कुल मिलाकर उनकी घोषित संपत्ति की वैल्यू बनती है सिर्फ 75 करोड़ रुपये यानी भारत के हिसाब से 38 करोड़ रुपये। जऱदारी के बेटे बिलावल भुट्टो कराची के इलाके क्लिफ़टन में चार हज़ार गज़ के घर में रहते हैं। इस घर के बराबर में गुजऱने वाली आधी सड़क पर भी बस उन्हीं की गाड़ी चलती है। इस घर की वैल्यू 30 लाख रुपये डिक्लेयर की गई है।

मुझ समेत हज़ारों लोगों ने कहा है कि वो बिलावल का 30 लाख का घर 60 लाख से 1 करोड़ रुपये में खरीदने को तैयार हैं। मगर बिलावल कहते हैं-नहीं बेचूंगा। नवाज़ शरीफ़ की हालत सबसे पतली है। लाहौर जाते हैं तो बेचारे अम्मा के मकान में। मरी जाते हैं तो बीवी के मकान में और लंदन जाते हैं तो बेटे के फ्लैट में बिस्तर बिछा लेते हैं। कारोबार कोई है नहीं, बच्चे जेब खर्च देते हैं।

ये सब नेता जो देश के सबसे बड़े तीन राजनीतिक गुटों के देवता हैं, हर पांच वर्ष बाद एक ऐसा नया पाकिस्तान बनाना चाहते हैं, जिसमें हर शख्स टैक्स दे और सच बोले। उनकी पार्टी सत्ता में आकर ऐसे कानून बनाए, जिनके ज़रिए अमीर बेतहाशा अमीर और गऱीब बेतहाशा गऱीब ना होता चला जाए।

और अर्थव्यवस्था कुछ ऐसी हो जाए कि पाकिस्तान एशियन टाइगर बनकर दहाड़े। रही जनता तो वो हर चुनावी अभियान में पुराने ख़्वाब नई पैकिंग में खरीदने के लिए बार-बार टूट पड़ती है।