ठंडे बस्ते में बिल

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उन्हें लंबे अर्से से ठंडे बस्ते में पड़े महिला आरक्षण बिल की याद दिलाई है और अनुरोध किया है कि सरकार जल्द से जल्द इसे लोकसभा में पारित कराए। 12 सितंबर 1996 को यह विधेयक तत्कालीन देवगौड़ा सरकार द्वारा पेश किया गया था।

तब से अब तक यानी पिछले 21 वर्षों के दौरान इसे लेकर अकेली अच्छी बात यह हुई कि 2010 में यूपीए सरकार ने अपने सहयोगी दलों के विरोध के बावजूद राज्यसभा से इसे पारित करवा लिया। राज्यसभा संसद का स्थायी सदन है लिहाजा वहां पारित विधेयक को कानून बनने के लिए सिर्फ लोकसभा से ही पारित कराने का काम बचता है।

अभी की स्थिति में यह काम बीजेपी बड़ी आसानी से कर सकती है क्योंकि लोकसभा में उसे पूर्ण बहुमत हासिल है और कांग्रेस तथा वाम दल शुरू से इसको अपना समर्थन देने को तैयार बैठे हैं। असली सवाल इच्छा शक्ति का है। सोनिया के पत्र पर आई बीजेपी की प्रतिक्रिया बहुत सकारात्मक नहीं कही जा सकती।

उसका यह कहना कि मोदी को पत्र लिखने के बजाय सोनिया गांधी को लालू और मुलायम से पूछना चाहिए था कि यूपीए के शासनकाल में उन्होंने इसे पारित क्यों नहीं होने दिया, गड़े मुर्दे उखाडऩे की निरर्थक कोशिश ही लगती है। अपने देश में पितृसत्तात्मक सोच का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में स्त्रियों को अधिकार देने वाले सारे विधेयकों का विरोध होना कोई असाधारण बात नहीं है।

ऐसे विरोध को बल प्रदान करने वाली मानसिकता भी अभी देश में लंबे समय तक बनी रहने वाली है। अगर समाज को आगे बढऩा है तो हमें इन विरोधों के बीच से ही रास्ता निकालने की जुगत लगाते रहनी पड़ेगी। जो पार्टियां और नेता अभी तक खुले तौर पर महिला आरक्षण बिल का विरोध करते रहे हैं, उनकी एक दलील यह है कि इससे आखिरकार सवर्ण राजनीति का दबदबा बढ़ेगा और दलित राजनीति फिर हाशिये की ओर खिसक जाएगी।

कारण यह कि ज्यादातर मुखर और पढ़ी-लिखी महिला नेता सवर्ण बिरादरियों में ही मिलती हैं। जमीन पर यह धारणा गलत ही साबित होती आई है क्योंकि भारत में चुनाव पढ़े-लिखे या मुखर होने के आधार पर नहीं, सामाजिक समीकरण और निजी सक्रियता के आधार पर जीते जाते हैं।

बिहार के स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण के नतीजे बहुत अच्छे साबित हुए हैं। न सिर्फ दलित और पिछड़े समुदायों की महिलाएं इन संस्थाओं में बड़ी संख्या में चुन आई हैं बल्कि समाज में महिला नेताओं के उभार से राज्य की राजनीति का स्वरूप भी पहले से अधिक तार्किक और शालीन हुआ है। यह उदाहरण पूरे देश में आजमाया जाए, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।