करवट बदलती राजनीति

पूर्वोत्तर में बीजेपी का एक बड़ी ताकत के रूप में उभरना एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है। इसका न सिर्फ पूर्वोत्तर बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी गहरा असर पड़ेगा। बीजेपी ने त्रिपुरा में लेफ्ट का मजबूत किला ढहा दिया और नगालैंड में शानदार प्रदर्शन किया। हाल तक इसकी कल्पना भी असंभव थी। यह बात सही है कि नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों का अपना कोई मजबूत आर्थिक ढांचा नहीं है, इसलिए वे केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के साथ मिलकर चलने में विश्वास करते रहे हैं। लेकिन बीजेपी ने उनके साथ एक अलग तरह का रिश्ता बनाया है।

मोदी सरकार ने नॉर्थ-ईस्ट पर खासतौर से फोकस किया। खुद प्रधानमंत्री ने वहां की कई यात्राएं कीं। केंद्रीय मंत्रियों का आना-जाना लगातार लगा रहा। वहां के लोकप्रिय नेता किरन रिजिजू को केंद्रीय मंत्रिमंडल में अहम विभाग सौंपा गया। पूर्वोत्तर में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए कई बड़ी परियोजनाएं शुरू की गईं, जिनसे वहां की जड़ अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है। इस तरह बीजेपी ने उन राज्यों के अलगाव को काफी कम किया और वहां के लोगों का विश्वास जीता। नॉर्थ-ईस्ट को लेकर केंद्र सरकार की सक्रियता के कारण ही इस बार तीन राज्यों के चुनाव मीडिया में छाए रहे।

पूर्वोत्तर के इलेक्शन को इतनी कवरेज शायद ही कभी मिली हो। चुनाव में बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। खुद पीएम ने त्रिपुरा में चार सभाओं को संबोधित किया। वहां लेफ्ट के पास मुख्यमंत्री माणिक सरकार की ईमानदारी और सादगी के सिवा और कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। किसी सीएम का ईमानदार होना अच्छी बात है, मगर जनता को रोजी-रोटी और तरक्की भी चाहिए। राज्य की जनता इन मामलों में निराश होने लगी थी। फिर माणिक सरकार निचले स्तर के भ्रष्टाचार को रोकने में कामयाब नहीं हो पाए। त्रिपुरा में सीपीएम की हार महज एक चुनावी पराजय नहीं है। सीपीएम की सरकार जहां भी हारती है, वहां पार्टी अपनी जड़ से ही उखड़ जाती है। पश्चिम बंगाल में यही देखने को मिला।

सीपीएम की मुश्किल यह है कि वह मुख्यधारा की पार्टियों के बरक्स अब तक अपनी कोई वैकल्पिक नीति पेश नहीं कर पाई। त्रिपुरा की हार उसके लिए एक बड़ा झटका है। अब भी वह नहीं संभली तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। कांग्रेस ने मेघालय में अपनी पकड़ जरूर बनाए रखी, पर त्रिपुरा और नगालैंड में वह मुंह के बल गिरी। जमीनी स्तर पर तत्परता की कमी पार्टी की स्थायी समस्या बनी हुई है। गुजरात और हाल के कुछ उपचुनावों में पार्टी के अच्छे प्रदर्शन से पार्टी कार्यकर्ताओं में जो उत्साह आया था, वह इन परिणामों से कम हो सकता है। बहरहाल, बीजेपी ने पूर्वोत्तर की जनता को जो सपने दिखाए हैं, उन्हें पूरा करना पार्टी के लिए चुनौती है। उसकी नई सरकारें अगर वहां की जनजातियों की शिकायतें दूर कर उन्हें मुख्यधारा में ला सकीं तो यह उनकी बड़ी उपलब्धि होगी।