मायके में हों गंगा निर्मलीकरण के ठोस उपाय

ललित शौर्य

Lalit Mohan Rathorगंगा माँ,बहु,बेटी . गंगा सम्बन्ध रक्त सा. गंगा गीत,भजन,लोरी. गंगा आस्था , तर्पण , संस्कार. गंगा बचपन, उन्माद, हर्ष. गंगा फसल, धन-धान्य ,स्म्रध्दी . गंगा उत्सव,त्यौहार उमंग. गंगा के न जाने कितने स्वरुप हैं. लगभग ढाई हजार किलोमीटर लम्बी गंगा, हिंदुस्तान के २९ बड़े ,२३ छोटे शहरों और लगभग ४८ कस्बों की प्यास और जरूरतों को पूरा करती हुयीं बहती चली जाती है. गंगा का संकट केवल उसके अस्तित्व का संकट नहीं बल्कि हिन्दुस्तान के आम जनमानस के ‘स्व’ का संकट है. गंगा ने पीढ़ियों को पाला और  सदियों को तारा है. वो आध्यात्मिक रूप से जितनी वन्दनीय है वैज्ञानिक रूप से उतनी ही महत्वपूर्ण. गंगा का जिक्र आते ही आज सबसे पहले उसमे बढ़ रहे प्रदूषण की चिंता सताने लगती है. गंगा घुट रही है, अस्वस्थ है. अगर ये कहें की गंगा वेंटिलेटर में है तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी, जिस तरह से उसके घाट प्रदूषित हैं. आर्सेनिक की मात्रा जिस रफ्तार से बढ़ रही है वो बेहद खतरनाक है.

भारत की जीवन रेखा समझी जाने वाली गंगा अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. गंगा जिसका जल  अमृत समान माना जाता था और एक समय था भी. गंगा में एक डुबकी मात्र से ही पापियों के पाप और रोगियों के रोग ख़त्म हो जाते थे . लेकिन अब स्थिति इसके उलट सी हो गई है. गंगा में अगर स्वस्थ व्यक्ति अधिक समय तक स्नान कर ले तो उसके  रोग ग्रस्त होने की सम्भावना बन जाती है. देवभूमि उत्तराखंड जो देवताओं की तपस्थली मानी गई है वो माँ गंगा की जन्मस्थली, उद्गम स्थली और मायका भी है. गोमुख से लेकर हरिद्वार पहुचते–पहुचते ही गंगा बीमार पड़ने लगती है.ये सबसे ज्यादा चौकाने वाला है की हरिद्वार जहाँ महाकुम्भ जैसा विराट आयोजन होता है वहाँ के घाट ही सबसे अधिक प्रदूषण का दंश झेल रहे हैं. गंगोत्री की यात्रा करने, आने वाले हजारों श्रधालुओं का मल –मूत्र सीधे गंगा में प्रवाहित हो जाता है. अनेक यात्री अपने साथ ऐसी वस्तुएं लाते हैं जो प्रदूषण का कारण बन जाते हैं. बिसलरी की खाली बोतल , शैम्पू –तेल के खाली पाउच, चिप्स –कुरकुरे के खाली पैकेट ये सब भी गंगा को प्रदूषित करते हैं. कुल मिलाकर देखा जाय तो गंगा का मायका ही गंगा के लिए बेहतर नहीं है. उसकी उदगम स्थली से ही उसकी प्रदूषण के साथ लड़ाई शुरू हो जाती है.

gangaगंगा केवल अनुष्ठान, आयोजन या सरकारी योजनाओं से प्रदूषण मुक्त नहीं हो पाएगी बल्कि उसे प्रदूषण मुक्त करने के लिए आमजन को आगे आना होगा.कई वर्षों से सरकारों द्वारा गंगा के शुद्धिकरण और उसे प्रदूषण मुक्त करने के लिए करोड़ों रुपये बहा दिए गए लेकिन नतीजा, ढाक के तीन पात मतलब की जस का तस .इससे स्पष्ट होता है की गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की कोई भी सरकारी योजना तब तक कुछ नहीं कर सकती जब तक आम जन मानस स्वयं जागरूकता न दिखाए. उत्तराखंड में ऐसे अनेक आन्दोलन हुए हैं जो सीधे जनता से जुड़कर अपने परिणामों तक पहुचे हैं. विश्वविख्यात चिपको आन्दोलन उत्तराखंड की प्रकृति प्रेमी जनता की ही देन है .अगर ऐसी ही कोई मुहीम स्वयं जनता द्वारा गंगा के निर्मलीकरण के लिए उठाई जाय तो हो सकता है परिणाम बेहद सकारात्मक दिखाई दें. उत्तराखंडवासी सदैव से ही प्रकृति के प्रति बेहद संवेदनशील रहे हैं . लेकिन धीरे-धीरे इस संवेदनशीलता में कमी दिखाई दे रही है . लेकिन अब भी कोई जामवंत बन एक बार जोर से पुकारे और कहे कि “का चुपि साधी रहे बलवाना” तो निश्चित बड़ा परिवर्तन दिखाई पड़ेगा. भगीरथ के तप से अवतरित हुयी माँ गंगा आज जिस दौर से गुजर रही है उसे पुन: अपने पूर्ववर्ती स्वरुप में लाने के लिए एक नहीं हजारों भागीरथों की आवश्यकता पड़ेगी. और ये भगीरथ गंगा के मायके से ही प्रकट हो सकते हैं . गंगा का अपने मायके में निर्मल होना बहुत आवश्यक है .

क्योकिं अगर पहाड़ों में ही गंगा प्रदूषण का शिकार हो गई तो मैदानों में उसकी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है . वहीँ दूसरी ओर मायके में कैसे निर्मल हो गंगा? इस प्रश्न के उत्तर के लिए सरकार को भी कठोर एवं अनुशासनात्मक कानून बनाने होंगे. गोमुख और गंगोत्री जाने –आने वाले यात्रियों के संख्या में नियंत्रण . उनकी समुचित जांच . प्रदूषण फैलाने वाली वस्तुओं का सख्त निषेध. और उनको गंगा की पवित्रता और उसकी स्वच्छता, बनायें रखने की समुचित जानकारी भी देनी होगी. यात्रियों के ठहराव के स्थानों में उनके मल-मूत्र का समुचित नियोजन होना चाहिए. हरिद्वार से गंगोत्री और गोमुख तक अनेकों होटल व्यवसायी हैं. और उनके होटलों का अपशिष्ट भी सीधे गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है. जिसपर प्रशासन को कठोर कारवाई करनी होगी .तथा होटल व्यवसायिओं को भी व्यक्तिगत रूप से गंदगी का समुचित निस्तारण करना चाहिए. जिससे गंगा की निर्मलता को बचाया जा सके. युवाओं को गंगा के महत्व से अगवत करा उनको “गंगा प्रहरी” के रूप में भी सरकार लगा सकती है. गंगा के तटों पर बसे गाँव और शहर के युवाओं को सरकार की ओर से  “गंगा प्रहरी” के रूप में रखा जाय जिससे की स्थानीय युवकों को रोजगार भी मिले और गंगा प्रदूषण मुक्त भी रहे. हरिद्वार में अनेक कारखानों का रासायनिक प्रदूषित जल, और घरों का अपशिष्ट तथा सिविर लाइन का गन्दला पानी सीधे गंगा में छोड़ दिया जाता है. जो गंगा की निर्मलता में ग्रहण लगा रहा है .

जिसपर प्रशासन को पूर्णतया प्रतिबंध लगाना चाहिए, और ऐसा करने वालो पर जुर्मना और सजा का प्रावधान होना चाहिए . जिससे की भविष्य में ऐसा कार्य कोई दूसरा व्यक्ति न कर सके. गंगा की अविरल –निर्मल धार बहती रहे इसके लिए गंगा में डुबकी लगाने वाले प्रत्येक भक्त को गंगा की सफाई का संकल्प भी लेना होगा. स्नान के समय गंगा में किसी भी प्रकार का अपशिष्ट नहीं छोड़ना चाहिए. थूकना-मूत्र त्याग पाप तो है ही दंडनीय भी ये विचार भी मन में रहना चाहिए. ये बात काफी हद तक गंगा के भक्तों को स्वीकार करनी होगी की उसके भक्त ही उसे प्रदूषित कर रहे हैं. प्रशासन प्रत्येक व्यक्ति की निगरानी नहीं कर सकता ये व्यवहारिक भी नहीं है. भक्तों को स्वयंमेव जारुकता दिखाते हुए ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे की गंगा मैय्या को किसी भी तरह की पीड़ा न भोगनी पड़े. गंगा मैय्या का मायका उत्तराखंड में है , इसलिए उत्तराखंड के वासियों की जिम्मेदारी कुछ बढ़ जाती है, की कम से कम वो यहाँ प्रदूषण मुक्त ही रहे. गंगा हिन्दू धर्म की आस्था का प्रमुख केंद्र है. अनेक मंदिर , शिवालय माँ गंगा के तटो पर ही स्थित हैं . हरिद्वार से गंगोत्री तक न जाने कितने आश्रम और हजारों साधू संत नित्य माँ गंगा की स्तुति में लीन रहते हैं. लेकिन दुर्भाग्य से कई बार सुनने को मिलता है की आश्रमों का अपशिष्ट भी गंगा के प्रवाह को दूषित कर रहा है तो बड़ी पीड़ा होती है.

हमें कर्म, और वचन दोनों से माँ गंगा की स्वच्छता का ध्यान रखना होगा. हरिद्वार में रह रहे हजारों की संख्या में साधू –संत अगर माँ गंगा की स्वच्छता की बाग़ डोर अपने हाथों में ले लें , और नियमित रूप से ३-४ घंटे गंगा की सफाई में लगा दें तो पूरी तस्वीर ही बदल जायेगी.और यह एक बड़ी साधना होगी. हमारे पूज्य संत अगर ठान लें तो अवश्य ही परिवर्तन दिखाई देगा. मायके में गंगा की निर्मलता की जिम्मेदारी हर आम और ख़ास की है. हर आयु के लोगों को जागरूकता का परिचय देना होगा. गंगा निर्मल रहे, अविरल बहे, हमारे पापों को तारती रहे इस सबके लिए उसका स्वस्थ और प्रदूषण मुक्त रहना जरुरी है. गंगा परम आस्था का केंद्र है. गंगा क्या है यथा : “सदियों से अविरल बहती गंगा तेरी धार करती आयी हो तुम पापों का संहार त्रण-त्रण पोषित जन–जन पुलकित स्पर्श में ममत्व अपार अमृत सम माँ गंगे तेरी धार तू भक्ति, तू भजन तू शक्ति , तू धरम माँ गंगे तेरे अनगिनत हम पर उपकार हे!

माँ तू ही है हमारे सोलह संस्कार जब तक बहती रहोगी निर्मल होते रहेगा ये धराधाम अस्तित्व जब ख़त्म होने होगा तेरा तब नर पिचाश बन चुके होंगे अधरम चरम पर होगा तब तेरे अस्तित्व के रक्षार्थ स्वयं,माधव अवतरित होंगे गंगा तेरा अस्तित्व विहीन होना देह का प्राण खोने जैसा है ” वास्तव में गंगा की अविरल धार को बचाने माधव आयेंगे ये कल्पना नहीं हो सकती , भगीरथ प्रकट होंगे ये सोचा नहीं जा सकता. अब हम उत्तराखंड वासियों को ही माधव और भगीरथ बनना होगा. घरों से निकल कर धरातल पर गंगा की पीड़ा का उपचार करना होगा. गंगा अवश्य प्रदूषण मुक्त होगी यदि हम सब संकल्प लेवें , माधव की भांति पीड़ा को समझे और भगीरथ की भांति कठोर परिश्रम करें तो का गंगा का स्वरुप बदलेगा. सरकार , प्रशासन और आम  जन तीनों के आपसी सामंजस्य और कार्य योजना से ही मायके में निर्मल होगी गंगा.