27 वर्षों से मालिकाना हक के लिये भटक रही महिला

devbhoomi- social-problemचमोली जनपद के मुख्यालय गोपेश्वर के मुख्य बस अड्डा पर बना ‘आस्था लाॅज’ की नींव जिस जमान पर पड़ी है कभी उस जमीन पर स्व0 बाग सिंह पुण्डीर का एकमात्र चाय-पानी व खाना रहने का होटल हुआ करता थां। जिस जमीन पर आज शासन-प्रशासन ‘आस्था लाॅज’ बनाकर करोड़ों रूपये कमा चुकी है उसी जमीन से बेदखली के बाद बाग सिंह पुण्डीर को बदले में मिली भूमि पर आज तीन दशक बीत जाने के बावजूद भी राज्य अभिलेखों में नाम नहीं किया गया है।

चमोली जनपद का मुख्यालय गोपेश्वर अपनी स्थापना से पूर्व एक जंगल के रूप में था इस इलाके से जुड़े बहुत सारे छोटे-छोटे कस्बे हुआ करते थे यहां पर खेती की जमीन व लकड़ी के लिये जंगल थे। इसी गोपेश्वर के मुख्य बस अड्डे पर जहां वर्तमान में ‘आस्था लाॅज’ बना है उस जमीन पर बाग सिंह पुण्डीर का लकड़ी का टाल, गांवों से आने वाले राहगीरों के लिये चाय-पानी व खाना रहने की दुकान थी। लोक निर्माण विभाग के सड़क मजदूरों व अधिकारियों के खाने-रहने का एकमात्र सहारा था।

इसकी उपयोगिता को देखने हुये विभागीय अधिकारियों द्वारा बाग सिंह पुण्डीर को सन् 1963 में रहने व अपनी आजीविका चलाने के लिये दुकान की अनुमति दी गयी थी ताकि विभागीय अधिकारियों, कर्मचारियों, मजदूरों व दूर-दराज से आने-जाने वाले लोगों की सामान-सुरक्षा की भी उचित व्यवस्था हो सके। बाग सिंह पुण्डीर का परिवार सन् 1963 से लगातार इसी जगह पर अपना आशियाना बनाकर रहा और लोगों की खाने रहने की उचित व्यवस्था के साथ-साथ अपनी आजीविका चलाता रहा। गोपेश्वर व आस-पास के अधिकतर निवासी बुजुर्ग आज भी उनके नाम व काम से भली भांति परिचित हैं।

गोपेश्वर की बात कहने से पूर्व इसके इतिहास का परिचय देना यहां शायद प्रासंगिक होगा कि उत्तराखण्ड राज्य सन् 60 के दशक में अस्तित्व में नहीं था उस समय यह उत्तर प्रदेश का एक पहाड़ी हिस्सा था, इस क्षेत्र में विकास की बेहद संभावना होने के कारण तत्कालीन चमोली तहसील को पृथक जनपद का दर्जा दिये जाने की सार्वजनिक कवायद भी प्रारंभ होने लगी थी। इसी दौरान निजमुला-विरही क्षेत्र में स्थित विशाल पानी की बेलाकुची झील बरसात के समय बादल फटने से फूट पड़ी जिससे इस क्षेत्र में बहने वाली अलकनंदा, मंदाकिनी आदि नदियों से लगे अनेक कस्बे पूरी तरह बरबाद हो गये, पूरा क्षेत्र जलमग्न हो गया था।
गोपेश्वर से 10 किमी नीचे अलकनंदा से लगी चमोली तहसील भी बेलाकुची बाढ़ की चपेट में आ गई  सैकडों लोग इसमें काल-कलवित  हुये, जान-माल का बहुत अधिक नुकसान हुआ था। उस समय संचार व आवाजाही की उचित व्यवस्था न होने के कारण सही आंकड़े भी सरकार को नहीं मिल पाये थे।

अति संवेदनशील क्षेत्र होने के कारण अलकनंदा नदी के किनारे बसी चमोली तहसील के सभी सरकारी आवास, कार्यालय आदि ऊपर पहाड़ की ओर बसे गोपेश्वर में स्थानांतरित कर दिये गये किंतु तहसील पूर्ववत चमोली में ही विधिवत रूप से रही। (यहां गोपीनाथ भगवान का पौराणिक मंदिर स्थित है इसे गोपेश्वर को 16 वीं सदी में कत्यूरी वंश के राजाओं द्वारा बसाया गया था )
सभी सरकारी आवास, कार्यालय आदि गोपेश्वर में शिफ्ट होने से यहां की आवाजाही बढ़ने लगी साथ ही जनसंख्या व व्यापार में भी इजफा होने लगा। सन् 1970 में चमोली तहसील को जनपद का दर्जा मिला और गोपेश्वर को चमोली जनपद का मुख्यालय बनाया गया।

सन् 1970 के दशक के अंत तक जनसंख्या बढी और गोपेश्वर नगरपालिका परिषद बनी गोपेश्वर के छोटे से बस अड्डे के चैड़ीकरण, विस्तारीकरण व सौन्दर्यीकरण का प्रस्ताव बना और निर्माण कार्य प्रारम्भ होने लगा। सन् 1986 में जिला प्रशासन चमोली व नगरपालिका गोपेश्वर द्वारा छोटे से बस अड्डे को समतल कर निर्माण कार्य किया जा रहा था। इस प्रक्रिया के दौरान पत्रकार धनंजय भट्ट, भजनलाल तथा दुकानदार बाग सिंह पुण्डीर के अस्थाई भवन भवन भी प्रभावित हो रहे थे।

निर्माण की प्राथमिकता को देखने हुये तीनों प्रभावितों को जिला प्रशासन चमोली की सहमति से इस शर्त पर हटाने का निर्णय लिया गया कि उन्हें गोपेश्वर में ही अन्यत्र किसी सरकारी भूमि पर निर्माण सामग्री देकर बसा दिया जायेगा। मानवीय आधार पर तीनों प्रभावितों पत्रकार धनंजय भट्ट, भजनलाल तथा दुकानदार बाग सिंह पुण्डीर को सरकारी भूमि प्रस्तावित कर दी गई। साथ के दो लोगों को भवन निर्माण सामग्री भी दी गई किंतु स्वास्थ्य शिथिल होने व कागजी कार्यवाही से अनभिज्ञ बाग सिंह पुण्डीर को निर्माण सामग्री नहीं मिली किंतु अन्य प्रभावितों के साथ ही बाग सिंह पुण्डीर को सन् 1988 में सरकारी अभिलेखों में भीटा नाम से दर्ज 8 मुट्ठी सरकारी भूमि प्रस्तावित कर दी गई। बस स्टेशन से उनकी दुकान मकान का सारा सामान हटाकर इसी भीटा नामक जगह पर रख दिया गया। जोकि एक पठार व बंजर भूमि थी।

एकमात्र रोजगार व निवास छिन जाने के कारण बाग सिंह पुण्डीर आर्थिक रूप से टूट गये व लगातार अस्वस्थ रहने लगे। धन की कमी और शारीरिक-मानसिक रूप से अस्वस्थ रहते हुये 27-12-1988 को अपने पीछे अपने परिवार को छोड़कर चल बसे। उनके कोई पुत्र संतान न होने के कारण उनकी अनपढ़ पुत्री श्रीमती माघी देवी  पिता की देखभाल के लिये पिता के साथ ही रहती थी। अंतिम समय मंे उनके पुत्र की जिम्मेदारी भी पुत्री श्रीमती माघी देवी व दामाद हुकुम सिंह ने ही निभाई।

पिता के देहावसान के बाद भी अनपढ़ पुत्री अपने पिता की स्मृति को जिंदा रखनेे के लिये सरकार द्वारा प्रस्तावित उसी भीटा नामक जगह पर काबिज रहकर शासन प्रशासन से भूमि पर राज्य अभिलेखों में नाम दर्ज करवाने के लिये आवेदन भी करती रही। सन् 1991.92 में आवेदन के सापेक्ष पटवारी की आख्या पर तत्कालीन परगना मजिस्टेट व नगर पालिका द्वारा उक्त भूमि हेतु स्वीकृति की संस्तुति भी दी गई। इसी संस्तुति पर माघी देवी ने उक्त जमीन के चारों ओर तारबाड़ करके छोटा सा आशियाना बनाकर गुजर बसर करने लगी। इस दौरान पिता को मिली इस भूमि को महिला ने अनेक फलदार वृक्ष लगाकर उपजाऊ बनाया और साग सब्जी के लिये निर्भर रही।

सन् 2000 में रा.इं.का.गोपेश्वर के प्रधानाचार्य ने सरकार द्वारा प्रस्तावित इस भूमि को कालेज रा.इं.का.गोपेश्वर की बताकर हटाने का प्रयास किया था आवेदिका ने समस्त साक्ष्यों के साथ शासन प्रशासन से पुनः प्रार्थना की जिसकी जिस पर पटवारी की आख्या पर पुनः परगना मजिस्टेट ने मुआयना किया जिसमें पाया गया कि यह भूमि रा. इं. का. गोपेश्वर की नहीं है, और विवाद समाप्त हो गया था इसके बाद आवेदिका को आगे की किसी भी कानूनी कार्यवाही के बारे में कभी कुछ नहीं बताया गया। महिला के पति का भी देहांत हो जाने से महिला अपने पुत्र के साथ ही किराये पर भी रहने लगी किंतु पिता को मिली उक्त भूमि से नहीं हटी।

बरसात के समय क्ष्तिग्रस्त आशियाने की पुत्र ने मरम्मत करनी चाही तो पुनः रा.इं.का.के वर्तमान प्रधानाचार्य द्वारा भी स्कूल प्रशासन व अविभावकों का नाम लेकर धमकाना प्रारंभ कर दिया गया, इनता ही नहीं प्रधानाचार्य द्वारा महिला को निसहाय समझकर जबरदस्ती महिला द्वारा लगाई गई चाहरदीवारी हटा दी गई व उसके लगाये पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाकर उसे उसके आशियाने से हटाने का प्रयास भी किया गया। दिनांक 9 अगस्त को राइका इण्टर कालेज के प्रधानाचार्य द्वारा महिला की 27 वर्षों से प्रस्तावित जगह पर अपना कब्जा करने के लिये अपनी चाहरदीवारी देने का प्रयास किया गया, जिसकी लिखित शिकायत महिला द्वारा जिलाधिकारी, नगरपालिका एवं परगना मजिस्टेट की गई।

परगना मजिस्टेट ने तुरंत रा.इ.का. गोपेश्वर के प्रधानाचार्य द्वारा जबरदस्ती की जा रही चाहरदीवारी के निर्माण कार्य को रूकवा दिया। महिला के साक्ष्यों के आधार पर पटवारी को पैमाइश कर आख्या देने का निर्देश दिया। पटवारी व नगरपालिका अधिकारी (ए.ओ.) के समक्ष मौके पर पैमाइश में भूमि पुनः राजस्व भूमि पाई गई जो महिला को प्रस्तावित की गई है और इस पर अभी तक महिला का भी नाम दर्ज नहीं किया गया है। महिला असंमजस मंे है कि बार-बार विभिन्न  अधिकारियों द्वारा उसकी भूमि का मुआयना कराया जा रहा है किंतु भूमि पर नाम दर्ज क्यों नहीं किया जा रहा।

वर्तमान में उक्त भूमि पर महिला का 27 वर्षों का कब्जा है जिस पर महिला अपना आशियाना है व साग-सब्जी उगाकर व फलदार वृक्ष लगाकर गुजर बसर कर रही है। महिला ने इन तीन दशकों में कई बार मुख्यमंत्री, सांसद, मंत्रियों व शासन-प्रशासन के कई अधिकारियों व कर्मचारियों से इस भूमि पर अपना नाम दर्ज करवाने के लिये लिखित तथा मौखिक निवेदन किया है।
उक्त अनपढ़ महिला की उम्र 64 हो चुकी है पति की मृत्यु हो चुकी है और पुत्र बेरोजगार है जिसकी एक सड़क दुर्घटना में दोनों पैर व एक हाथ क्षतिग्रस्त होने के कारण भागदौड़ करने में असहमर्थ है महिला के परिवार की आर्थिक, शारीरिक व मानसिक स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है इसके बावजूद पिता को हक दिलाने के लिये बार बार निवेदन कर रही है किंतु सरकारी कार्यवाही बेहद धीमी रफतार से कार्य कर रही है।

आज से 27 वर्ष पूर्व जिस राज्य भूमि को प्रस्तावित कर तत्कालीन शासन-प्रशासन ने महिला के पिता स्व0 बाग सिह पुण्डीर को बसाया था उसी भूमि पर महिला के पिता ने अंतिम सांस ली है। उक्त भूमि पर महिला हर समय अपने पिता के होने का आभास करती है। कुछ वर्षांे से महिला शारीरिक व मानसिक रूप से भी अस्वस्थ रहने लगी है। पिता को मिली उक्त भूमि पर बने टूटे फूटे आशियाने में रहकर, आस-पास पेड़-पौधे लगाकर वह खुश रहती है। वहां से अलग करने पर उनकी मानसिक स्थिति और भी खराब होने लगती है। पुत्र द्वारा महिला का हिमालयन हास्पिटल में इलाज भी चल रहा है, डाक्टरों के अनुसार महिला को उन्हीं पुरानी जगहों पर ही रखने का सुझाव दिया गया है जिनसे उसे सबसे अधिक लगाव है अन्यथा स्थ्तिि और भी बिगड़ सकती है।

महिला इस भूमि पर नाम दर्ज करवाने के लिये शासन-प्रशासन के चक्कर काटते काटते थक चुकी है। इन तीन दशकों में भी महिला के पिता स्व0 बाग सिंह पुण्डीर को उनका हक नहीं मिला जिसके लिये महिला लगातार प्रयासरत है। महिला को निसहाय समझकर कई अराजक तत्वों द्वारा अपना प्रभाव दिखाकर महिला को बेवजह परेशान किया जा रहा है। इतने वर्षों से बार बार शासन-प्रशासन के चक्कर काटने के बाद अब महिला का कहना है कि मेरे साथ किसी भी प्रकार की कोई शारीरिक,मानसिक व आर्थिक दुघर्टना होती है तो इसका जिम्मेदार पूरा शासन व प्रशासन ही होगा। महिला ने सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री को भी अपनी पूरी आपबीती सुनाई है उसे विश्वास है कि जल्द ही उसे न्याय मिलेगा और उसे भूमि पर मालिकाना हक दिया जायेगा।