एक साथ चुनाव

इसमें दो राय नहीं कि देश वर्ष 2014 से लगातार चुनावी मूड में है। चुनावी लक्ष्यों के लिये की जाने वाली तीखी बयानबाजी और तल्खी के तेवर आमजन को बेचैन करते हैं। एक कृत्रिम-सा डराने वाला वातावरण तैयार कर दिया जाता है। उस कर्णभेदी चुनावी शोर में समाज का रचनात्मक विकास हाशिये पर नजर आता है।

अचानक तमाम तरह के कृत्रिम व नकारात्मक मुद्दे उठते हैं और चुनाव होने के बाद सब कुछ यथावत। वैसे भी चुनाव इतने खर्चीले हो गये हैं कि आये दिन होने वाले चुनावों में अरबों रुपया पानी की तरह बहता है। चुनाव आयोग के नियम-कानूनों को ताक पर रखकर जुटाया धन भले ही पूंजीपतियों व धन्ना सेठों की जेबों से जाता हो मगर कीमत तो देर-सवेर आम आदमी को ही चुकानी पड़ती है।

ऐसे माहौल में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात एक सुकून देने वाले हवा के झोंके-सी लगती है। गाहे-बगाहे प्रधानमंत्री के बयान इस बाबत सुनाई दिये। अब विधि आयोग, नीति आयोग व इससे जुड़ी संस्थाओं ने एक साथ चुनाव कराने की वकालत की है। इस मुद्दे से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की सिफारिशें भी सामने आई हैं, जिसके लिये राजनीतिक दलों की राय जानने की कोशिश हुई।

सरकार को सिफारिशें भेजने से पहले राजनीतिक दलों में सहमति बनाने के क्रम में आयोजित राष्ट्रीय राजनीतिक दलों व क्षेत्रीय दलों की बैठक में अपेक्षा के अनुरूप चार क्षेत्रीय दल इसके पक्ष में व नौ विरोध में नजर आये। निश्चित रूप से इस पहल से जुड़ी कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं। मगर ध्यान रहे कि आजादी के बाद 1967 तक यही परंपरा निभाई जाती रही है। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते रहे हैं। दरअसल राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार इसका समर्थन और विरोध करते रहे हैं।

क्षेत्रीय दलों को लगता है कि केंद्रीय सत्ता में आसीन दल राष्ट्रीय मुद्दों, संसाधनों और पहुंच के चलते क्षेत्रीय दलों पर भारी पड़ते हैं। विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं। राजनीतिक दलों को भी राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर इस व्यवस्था के सभी पक्षों पर गंभीर विमर्श करना चाहिए, जिससे राष्ट्रीय संसाधनों पर आये दिन पडऩे वाले बोझ को कम किया जा सके। साथ ही देश में स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं का विकास किया जाये। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जिम्मेदारी का एहसास राजनीतिक दलों को भी होना चाहिए। सैद्धांतिक व वैधानिक दिक्कतों के बावजूद संसद की स्थायी समिति के उस सुझाव पर गौर किया जाना चाहिए, जिसमें आधे चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ और आधे मध्यावधि में कराये जायें।