घपले की परीक्षा

उस बेचैनी का एहसास करना कठिन नहीं, जिसके चलते देश के कोने-कोने से आये हजारों छात्र एक सप्ताह से कर्मचारी चयन आयोग कार्यालय के समक्ष प्रदर्शनरत रहे। होली के त्योहार में जब वे डटे रहे तो मीडिया ने ध्यान दिया और प्रतिगूंज संसद में हुई। यूं तो परीक्षार्थियों के असंतोष के बाद गृहमंत्री ने आंदोलनकारियों की मांग पर कंबाइड ग्रेजुएट लेवल परीक्षा के ऑनलाइन प्रश्नपत्र लीक मामले में सीबीआई जांच की घोषणा की है, मगर छात्र लिखित सूचना मिलने तक आंदोलन पर अड़े रहने की बात कर रहे हैं।

गाहे-बगाहे रोजगारपरक परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हो जाते हैं। सब कुछ छोड़कर परीक्षाओं की तैयारी में लगे परीक्षार्थियों के लिये धांधली के बाद परीक्षा स्थगित होना एक वज्रपात की तरह होता है। उम्र-दर-उम्र उनके लिए रोजगार के अवसर कम होते जाते हैं। कई बार तो परीक्षार्थियों को उम्र निकलने पर मौका मिलता है। नि:संदेह सिस्टम में कहीं न कहीं तो खामी है। एक तो वर्षों से परीक्षा आयोजक पदों पर जमे लोग इस खेल में शरीक होते हैं तो कभी ऑनलाइन परीक्षा?आयोजित करने वाली एजेंसी सवालों के घेरे में होती है। कभी परीक्षा केंद्रों की विश्वसनीयता संदिग्ध बताई जाती है। सवाल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों पर भी उठ रहे हैं।

बहरहाल, परीक्षार्थियों का दिल्ली व देश के अन्य भागों में आंदोलन और सरकार का सीबीआई जांच के लिये सहमत होना, यह संकेत जरूर देता है कि परीक्षा सिस्टम में गंभीर खामियां हैं। कोई सरकार आये, अनियमितताओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है। दिल्ली में छात्रों के आंदोलन को अन्ना हजारे का समर्थन प्रेरक के रूप में रहा, मगर अन्य राजनीतिक दल रोटियां सेंकने से बाज नहीं आये। ऐसा भी नहीं है कि परीक्षाओं में कर्मचारी चयन आयोग की मनमानी संप्रग सरकार के दौरान नहीं थी।

जैसे-जैसे सरकारी नौकरियों की संख्या कम होती जा रही है, परीक्षार्थियों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। निजी क्षेत्रों में अनिश्चितता और असुरक्षा सरकारी नौकरी का मोह बढ़ा रही है। यही वजह है कि परीक्षार्थी अपनी योग्यता से कम की सरकारी नौकरी करने को तैयार हैं। मगर परीक्षा तंत्र की खामियां बेरोजगारों का आक्रोश बढ़ा रही हैं। यह गुस्सा सारे देश में है जो किसी बड़े आंदोलन के रूप में सामने आ सकता है। प्रधानमंत्री गाहे-बगाहे भारत को दुनिया के सबसे ज्यादा युवाओं का देश बताते हैं पर उनकी प्रतिभा के अनुकूल पारदर्शी परीक्षा प्रणाली स्थापित करना भी तो उनका नैतिक दायित्व बनता है। ताजा विवाद की जांच में सुनवाई के लिये शीर्ष अदालत की सहमति नई उम्मीद जगाती है कि परीक्षा व्यवस्था पर से अिवश्वास के बादल छंट पायेंगे।