बच्चों की सुरक्षा

सुप्रीम कोर्ट ने सभी प्राइवेट स्कूलों की सुरक्षा की जांच खुद करने का फैसला किया है। उसने गुडग़ांव के रायन इंटरनैशनल स्कूल में एक बच्चे की हत्या के मामले में उसके पिता की अर्जी पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, हरियाणा सरकार, सीबीआई और सीबीएसई को नोटिस जारी करते हुए उनसे तीन हफ्ते के अंदर जवाब मांगा है। मृत बच्चे के पिता ने सुप्रीम कोर्ट से मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की थी। इन दिनों प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले देश भर के सारे अभिभावक अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

गुडग़ांव की घटना से उनमें दहशत फैल गई है। इस घटना के तुरंत बाद दिल्ली के एक निजी स्कूल में 5 साल की मासूम बच्ची के साथ रेप की वारदात सामने आई। ऐसे हादसे लगातार सामने आ रहे हैं, और इनसे एक बात साफ जाहिर हो रही है कि स्कूल प्रबंधन का ध्यान सिर्फ मोटी फीस और डोनेशन वसूलने पर रहता है। हमारे देश में शिक्षा एक ऐसा धंधा बन गई है जो किसी के भी प्रति जवाबदेह नहीं है।

निजी मालिकाने वाले तमाम स्कूल अच्छी शिक्षा देने का अपना वादा कितना निभा पाते हैं, यह तो बाद की बात है, उन्हें बच्चों की जान तक की परवाह नहीं है। शिक्षकों और कर्मचारियों के हितों को लेकर वहां चर्चा की गुंजाइश तक नहीं है। बच्चों की सेफ्टी को लेकर सीबीएसई द्वारा बाकायदा निर्देश जारी किए गए हैं। उसने स्कूल परिसर में सीसीटीवी लगाने और परिसर को चारदीवारी से घेरने के अलावा स्कूल में सुरक्षाकर्मियों की पर्याप्त तैनाती करने को भी कहा था। इसके अलावा बच्चों को सुविधायुक्त बसें उपलब्ध कराने, उनमें सीसीटीवी कैमरे लगाने, ड्राइवर और कंडक्टर का पुलिस वेरिफिकेशन कराने जैसी बातें भी कही थीं, मगर इन सबको ताक पर रख दिया गया है।

ऐसी कोई सक्षम संस्था भी नहीं है जो इन निर्देशों के अनुपालन की मॉनिटरिंग कर सके। पैरंट्स भी आमतौर पर इन पर सवाल नहीं उठाते क्योंकि वे खुद ही डरे रहते हैं कि कहीं उनके बच्चे का करियर न प्रभावित हो जाए। वक्त आ गया है कि स्कूल इन मामलों में सारी सूचनाएं सार्वजनिक करें और अभिभावक इन्हें क्रॉस-चेक करें।

बच्चों की सुरक्षा को लेकर तय मानकों पर हमेशा स्कूल मैनेजमेंट से सवाल पूछे जाने चाहिए। आश्वस्त होना चाहिए कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे हैं या नहीं, कर्मचाारियों का वेरिफिकेशन हुआ है कि नहीं, शौचालयों की सुरक्षा व्यवस्था कैसी है, वगैरह-वगैरह। स्कूलों को भी अपने सभी कर्मचारियों का नाम, पता, ट्रैक रिकॉर्ड, संपर्क नंबर आदि ब्यौरे जाहिर करने चाहिए और पूछने पर यह भी बताना चाहिए कि उन्हें वेतन कितना मिलता है। मुफ्त में या बहुत मामूली वेतन पर काम करने वालों से भला कितने प्रफेशनलिज्म की उम्मीद की जा सकती है?