यारो मैं तो डिजीटल हो गया…!

राज शेखर भट्ट

टूं-टूं, टूं-टूं, मैसेज आया। मेरा नाम तकनीक चतुर्वेदी है और पूरा विश्व मदरबोर्ड ही मेरा घर है। विश्व मदरबोर्ड में कुछ क्षेत्र हैं, जहां मैं अभी जा नहीं पाया, लेकिन अगर भारत के प्रधानमंत्री ही बहुराष्ट्रीय हों और वो मुझे अपने सानिध्य में ले लें तो मैं कुछ ही समय में हर जगह पहुंच जाउंगा। बहरहाल, इतना जरूर है कि मोदी जी ने जबसे डिजीटल इंडिया का नारा दिया है, तब से मैं भी डिजीटल हो गया हूं। आजकल में विश्व मदरबोर्ड के भारत सर्किट में लगी उत्तराखण्ड नाम की आई.सी में निवास कर रहा हूं।

अब देखिये ना मैं तकनीक चतुर्वेदी हूं और डिजीटल इंडिया के कार्यालय में मेरी पोस्ट इंटरनेट है। उत्तराखण्ड नाम की आई.सी में भी लगभग सभी लोग मेरा प्रयोग कर रहे हैं। क्योंकि मैंने कई बार देखा कि जो काम कभी शांति से, इत्मिनान से हुआ करता था, वो भी डिजीटल हो गया है। लोग टॉयलेट नाम के ट्रांसफार्मर में बैठे हैं और रात को जो खाया, वो निकाल भी रहे हैं। लेकिन मुझे ये समझ नहीं आया कि वो अपने मोबाईल में खुटुर-पुटुर क्या कर रहे हैं। इसे हम सभी कह सकते हैं टॉयलेट ट्रांसफार्मर का डिजीटलीकरण।

इतना ही नहीं…. मेरे घर में जो सफाई करने के लिए आता है, उसका नाम टैक्नीकल झाडू है। आता तो वो रोज है लेकिन आने से पहले वट्स अप पर मैसेज करके पूछता है कि साहब आप आज घर पर हो, सफाई करने आऊं कि नहीं। सफाई के समय का भी उसका अलग ही अंदाज है। एक हाथ में झाडू और दूसरा हाथ और निगाहें मोबाईल पर। कितना झाडू लगा, कितनी सफाई हुयी और कितनी मोबाईल को देखते हुये टैक्नीकल झाडू के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान थी। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि यह हुआ स्वच्छ भारत हॉटस्पॉट डिजीटलीकरण। जिससे कि हर आई.सी में वाई-फाई के जरिये स्वच्छता की जा रही है। कुल मिलाकर यह है कि भारत मदरबोर्ड की 29 आई.सी में डिजीटल सफाई हो रही है। क्योंकि सफाई का लोगो ही ऐसा है, जिसमें शब्द और अर्थ को जाहिर तौर पर समझाया गया है। भारत मदरबोर्ड के पिताजी का चश्मा, जिसमें बताया गया है कि जहां स्वच्छ लिखा है, वो भारत नहीं है और जहां भारत लिखा है, वो स्वच्छ नहीं है।

नोटों का भी डिजीटलीकरण हो चुका है। अब समझ यह नहीं आता कि नये नोट जो बनाये गये हैं, वो विदेशी डॉलर हैं अथवा चूरन के साथ मिलने वाले नोट। लेकिन नोटों से संबंधित डिजीटलीकरण करने के लिए उसके कुछ नये पुर्जों को सामने रखा दिया गया। जिनके नाम कुछ इस तरह के हैं…. बेस कार्ड ट्रांजिस्टर, पेटीएम पावर सप्लाई, भीम रजिस्टेंस आदि, आदि। साथ में जी.एस.टी विद्युत आपूर्ति गृह का भी निर्माण हो चुका है। वाह जी… वाह, हर तरफ डिजीटलीकरण।

बहरहाल, डिजीटलीकरण की राह तो कुछ इस तरह से तेज हुयी कि मेरे साथ-साथ लगभग सभी लोग डिजीटल हो चुके हैं। एक जमाना था कि कोई भी काम होने में समय लगता था लेकिन जब से डिजीटलीकरण होना शुरू हुआ और मोदी जी ने नारा दिया, तब से सब काम आसान हो गया है। जिसके कई उदाहरण मेरे और आपके सामने हैं, जिनकी गपशप एक दफा और करलें तो यादें ताजा हो जायेंगी। लेकिन इस डिजीटलीकरण को देख-देखकर अब मुझे लगता है कि वो दिन कब आएगा, जब में बिस्तर त्रिपाठी में लेटा रहूं और जो कहूं वो तुरंत 1000 एम.बी.पी.एस की स्पीड से हो जाय। मैं बोलूं कि आज मैं मटर बिष्ट और आलू सिंह की सब्जी के साथ 6 रोटी मिश्रा खाना चाहता हूं और वो मेरे टेबल पर आ जाय। तब जाकर मैं पूर्ण रूप से डिजीटल हो पाऊंगा।