सरकार के गले की फांस बना गैरसैंण

सलीम रज़ा

उत्तराखण्ड में स्थाई राजधानी को लेकर पहाड़ की जनता लामबन्द है। स्थाई राजधानी को लेकर 18 साल में सरकारों के ढुलमुल रवैये के कारण पहाड़ के युवाओं को अब अहसास होने लगा है कि यहां की सरकारें इमोशनल ब्लेकमेल करके उन्हें सिर्फ वोट बैंक के लिये इस्तेमाल करती है। अगर हम 18 साल पीछे जायें तो पायेंगे कि उत्तर प्रदेश में रहते हुये यहां की आवाम को अपने हुकूक के लिये हाथ फैलाने पड़ते थे। अपनी भावनाओं को आहत होते हुये देख यहां के वरिष्ठ नेताओं ने अलग प्रदेश बनाने की मुहिम छेड़ दी और अलग प्रदेश की मांग आग की तरह 1994 तक फैल चुकी थी।

आन्दोलन की आवाज़ को दबाने के लिये उत्तर प्रदेश सरकार ने दमनकारी नीति अपनाई। जिसमें निहत्थे आन्दोलनकारियों को पुलिस ने अपनी गोली का शिकार बनाया। उत्तराखण्ड आन्दोलन के लिये वो दिन काले अध्याय के रूप में जुड़ गया। उस वक्त के नौनिहालों ने जो बाल्य अवस्था में थे, आज युवा हैं। जिन्होंने रामपुर तिराहा काण्ड में अपने माता-पिता खो दिये थे। आन्दोलनकारियों की भीड़ पर रामपुर तिराहे पर पुलिस द्वारा अमानवीय व्यवहार की विश्व मीडिया ने आलोचना की थी। उस वक्त पूरी दुनिया में विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र पर सवालिया निशान खड़ा हो गया था। उससे पहले जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, उस वक्त भी अलग बोडोलैण्ड गोरखालैण्ड अलग खालिस्तान की मांग के लिये आन्दोलन चरम पर था। जिसे मौजूदा सरकार ने अपनी दमनकारी नीति से कुचल दिया था।

बहरहाल, उत्तराखण्ड को अलग प्रदेश बनाये जाने का पक्षधर कोई नहीं था। भले ही बदलते राजनीतिक समीकरण के चलते और भारतीय राजनीति में उस उग्र आन्दोलन से आये भूचाल को थामने में भारतीय जनता पार्टी ने अपने कौशल का इस्तेमाल बखूबी करते हुये इस मुद्दे को कैश करने में कोई देर नहीं की। क्योंकि उस वक्त केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे राजनेता प्रधान थे, जिनका हर पार्टी सम्मान करती थी।

उन्होंने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुये अलग प्रदेश की औपचारिक घोषणा तो कर दी। लेकिन आन्दोलन की मूल भावना राजधानी को लेकर नज़र अन्दाज की। पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों से कोई भी सरकार अंजान नहीं थी, फिर भी देहरादून को अस्थाई राजधानी घोषित करके उग्र रूप ले चुके आन्दोलन को ठंडा जरूर कर दिया।

पहाड़ की भोली-भाली जनता ने सरकार की मंशा को समझे बगैर अपना समर्थन दे दिया। यहां ये बात भी बता देना जरूरी है कि पहाड़ की जनता के मन में कांग्रेस रची बसी थी, तभी पहली बार हुये विधान सभा चुनाव में यहां की जनता ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था और पहली बार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता की चाबी सौंपी। जिस पार्टी ने पहाड़ की जनता की भावानाओं को ध्यान में रखकर अलग प्रदेश बनाया उसे ही पहाड़ की जनता ने ठुकरा दिया।

ये दर्द भी भारतीय जनता पार्टी नहीं भूल पायी। प्रदेश में आयी कांग्रेस की सरकार में परिसीमन हुआ और पहाड़ की कई विधानसभाओं का अस्तित्व समाप्त हो गया और मैदानी सीटों में इजाफा हुआ। यहां से ये नजर आने लगा था कि राजधाानी को लेकर वर्तमान सरकार संजीदा नहीं है। हालांकि उस वक्त दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे, उन्होंने भी पहाड़ की आवाम की मंशा को नज़र अन्दाज कर दिया।

परिणाम स्वरूप आगामी विधानसभा चुनाव में पहाड़ की जनता ने अपनी भूल सुधारते हुये कंाग्रेस को दरकिनार करके एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी में अपना विश्वास जताया। इस उममीद के साथ कि शायद हमारे ज़ख्मों पर ये ही एक ऐसी पार्टी है, जो मरहम लगा सकती है। अपनी आंखों में सुनहरे सपने लिये उन्होंने सत्ता की चाबी कांग्रेस के हाथों से छीनकर भारतीय जनता पार्टी को सौंप दी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने एक मंझे हुये विलेन का रोल चरित्र अभिनेता के तौर पर निभाया और अलग प्रदेश का अलख जगाने वाली पार्टी उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के वरिष्ठ नेताओं को सत्ता सुख देकर पहाड़ की जनता को गुमराह करके पार्टी के वजूद को समाप्त करने का षडयन्त्र रचा।

आवाम का रोष दिवाकर भटृट पर फूटा। यहीं से उत्तराखण्ड क्रान्ति दल पार्टी हाशिये की तरफ सिमटती चली गई। अब ना उसमें वो धार रह गई और ना आवाज़। लेकिन वक्त बदलते देर नहीं लगती उस वक्त के वाल्य अवस्था का जीवन जीने वाले नौनिहाल आज युवा बन गये। उन्हें अपनो के द्वारा ठगे जाने का अहसास हैं, उन्हें अपनी पीड़ा का अनुभव है, उन्हें उत्तराखण्ड आन्दोलन में अपने मां-बाप और बुर्जुगों को खो देने का गम है। उन्हें दर्द है पहाड़ से हो रहे पलायन का, उन्हें दुःख है रोजगार की तलाश में दूर भटक कर चले गये अपने अग्रजों का।

उन्हें अपनों से दर्द है, अपनों से शिकवा है, जिन्होंने उन्हे मझदार में लाकर छोड़ दिया। हाल-फिलहाल फिर एक बार गैरसैण स्थाई राजधानी को लेकर क्षेत्रीय पार्टियों के साथ कई मंच एक साथ हैं। लेकिन सबसे सुखद बात है कि अपनी अहम भूमिका में पहाड़ का युवा आगे हैं, जिसके चलते मौजूदा सरकार जाहिर नहीं होने दे रही है, लेकिन बौखलाहट में तो जरूर है। आगामी निकाय चुनाव और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर संयम से काम लेने की लाख कोशिश कर रही हैं, फिर भी स्थाई राजधानी गैरसैण को लेकर आन्दोलन कर रहे लोगों के साथ पुलिस किसके इशारे पर बर्बरता पूर्वक और अमानवीय व्यवहार अपना रही है।

यहां तक की अपनी जायज मांग के लिये आन्दोलनरत मातृशक्ति को भी निशाना बनाया जा रहा है। जो सरकार की मंशा और रवैये पर सवाल खड़ा करता है। सरकार आन्दोलनकारियों के खिलाफ दमनकारी नीति अपना रही है, जो एक बार फिर पहाड़ की जनता के लिये अच्छे संकेत नहीं हैं।

18 सालों के बाद भी जो प्रदेश बुनियादी सुविधायें अपने प्रदेश की जनता को नहीं दे पाया हो। हर सरकार के कार्यकाल में घोटालों की लम्बी फेहरिस्त हो। फिर भी सरकार पहाड़ से रोजगार के लिये पलायन कर गये लोगों का मखौल उड़ाते हुये पलायन आयोग बनाये और उसमें भी पहाड़ के युवाओं को नज़र अन्दाज करें, ये पहाड़ के युवाओं के साथ भद्दा मजाक है। बहरहाल, पहाड़ की जनता का यदि वर्तमान सरकार यकीन जीतना चाहती है तो उसे गैरसैण स्थाई राजधानी शीघ्र घोषित करनी पड़ेगी। अगर सरकार आन्दोलन कर रहे लोगों पर दमनकारी नीति अपनाती है तो उत्तराखण्ड से दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों का वजूद खत्म हो जायेगा और प्रदेश की कमान किसी तीसरी पार्टी के हाथों में आ जाये इस बात से मुकरा भी नहीं जा सकता।

बहरहाल, गैरसैण स्थाई राजधानी का मुद्दा सरकार के गले की फांस बन गया है लेकिन लोकसभा चुनाव तक तो सरकार इस मुद्दे को खींचेगी ही और गैरसैण राजधानी को लेकर चलाये जा रहे आन्दोलनकारियों को सरकार के बदलते तेवरों से रू-ब-रू होना ही पड़ेगा।