सह्याद्रि की दिव्यता

ललित शौर्य

सह्याद्रि पर्वत सप्तकुल पर्वतों में से एक हैं। भारत भूमि में स्थित पर्वत देवों के सामान हैं। सदैव से ही भारत के जन-जन ने पर्वतों के महत्व को समझा एवं माना है। यहाँ पर्वतों की महिमा से प्रभावित होकर उनकी पूजा की जाती रही है। सह्याद्रि शब्द संस्कृत का है। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाएं अत्यंत प्राचीन हैं। ये जितनी पुरानी हैं इनका गौरव उतना ही महान है। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाओं को पश्चिमी घाट भी कहा जाता है। ये भारत के पश्चिमी तट पर स्थित हैं। यह पर्वत श्रृंखला दक्कनी पठार के पश्चिम के साथ-साथ उत्तर से दक्षिण की तरफ 1600 किमी. लम्बी है। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाएं जैवकीय विविधता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। जैव विविधता की दृष्टि से इनका विश्व में 8वां स्थान है। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाएं गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होती हैं, तथा गोवा , कर्नाटक, तमिलनाडु, तथा केरल से होते हुए कन्याकुमारी तक फैली हुई हैं। सह्याद्रि की जैव विविधिता को ध्यान में रखते हुए यूनेस्को ने सन 2012 में इस पर्वत श्रृंखला के 39 स्थानों को विश्व धरोहर घोषित किया है।

सह्याद्रि पर्वत श्रंखलाओं का कुल क्षेत्रफल 160,000 वर्ग किलोमीटर है।इनकी औसत ऊंचाई 1200मीटर अथवा 3900 फ़ीट है। सह्याद्रि पर्वत पर तीन प्रसिद्ध दर्रे थाल घाट, भोर घाट तथा पाल घाट स्थित हैं। इस पर्वत पर अत्यंत मनोरम दृश्य देखे जा सकते हैं। इसकी सुंदरता मन को मोह लेती हैं। यहाँ फूलों की लगभग पांच हजार प्रजातियाँ पाई जाती हैं। 139 प्रकार के स्तनपायी, चिड़ियों की 508 प्रजातियाँ तथा 179 प्रकार के उभयचर यहाँ देखे जा सकते हैं। यहाँ जीवों की तथा फूलों की कई ऐसी प्रजातियाँ हैं जो विश्व में कहीं और नहीं पाई जाती हैं। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जाने वाली 84 किस्म के उभयचर, 167 प्रजाति की चिड़ियाँ, 1600 क़िस्म के फूल विश्व में और कहीं नहीं देखे जा सकते हैं। ये अद्वितीय हैं। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाओं में अनेक ऊँची -ऊँची चोटियां हैं जो आकाश को चूमती हुई सी प्रतीत होती हैं।इनका उन्नत मस्तक सहसा नेत्रों को चमत्कृत कर देता है। इस पर्वत श्रृंखला का सबसे ऊंचा शिखर अनामुडी है। जो आकाश को स्पर्श करता है।

सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाओं की प्राचीनता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इनका उल्लेख अनेक पुराणों में भी किया गया है। विष्णुपुराण के अनुसार गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणा नदियों का उद्गम इसी पर्वत से हुवा है। द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक भगवान् शंकर का विश्व प्रसिद्ध धाम भीमशंकर भी इसी पर्वत पर स्थित है। इसके अलावा अनेक पौराणिक मंदिर त्रयेम्बकेश्वर, भगवती भवानी, महाबलेश्वर, बौद्ध चैत्य जैसे प्रसिद्ध आस्था के केंद्र इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं पर विराजमान हैं। महान शक्तिशाली, हिन्दू हृदय सम्राट, पराक्रमी छत्रपति शिवाजी के कई किले सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाओं पर स्थित हैं। जिनमे शिवनेरी, पन्हालगढ़, प्रतापगढ़, रायगढ़ आदि प्रमुख हैं।

माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा जी ने सृष्टि के प्रारम्भ में सह्याद्रि पर्वत पर यज्ञ किया था। उनके यज्ञ को भंग करने के लिए अतिबल और महाबल नामक दो असुरों ने अनेक प्रयास किये। वो निरन्तर यज्ञ में विघ्न डालने का कुत्सित प्रयास करते रहे। दोनों असुरों के कृत्यों को देखकर भगवान विष्णु एवं माता भगवती ने उनका वध किया। जिससे यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो सका। उसके बाद त्रिदेव सह्याद्रि पर्वत पर ही अतिबलेश्वर,कोटिश्वर तथा महाबलेश्वर के रूप में विराजमान हो गए। आज भी त्रिदेवों को यहाँ पर इन्ही रूपों पर पूजा जाता है। इस तरह सह्याद्रि पर्वत श्रृंखलाएं जैव विविधता के साथ-साथ पौराणिक महत्व के लिए भी जानी जाती हैं।इसी दिव्यता के कारण ये पर्वत नमनीय एवं स्तुत्य है।