अधिनायकवाद के समक्ष रेंगती राजनीति से हो बचाव

पार्टी के पूर्ण अधिवेशन के लिए अगले एक पखवाड़े में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की बैठक होना प्रस्तावित है। इस बैठक को पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के चुनाव को समर्पित करने के अलावा उपस्थित नेताओं को कहीं गंभीर मसलों पर काम करना होगारू उन्हें देश के साथ बातचीत शुरू करने और नागरिकों को भरोसा दिलाना होगा कि किस तरह से पूरी राजनीतिक व्यवस्था एक व्यक्ति के बोझ दृउनकी सनक, उसकी कल्पनाएं, उसके व्यवहार और उसकी सीमाओं से कराह रही है। कांग्रेस और उसके नेताओं को राष्ट्र को पहले यह समझाने की आवश्यकता है क्यों देश की वर्तमान स्थिति न तो वांछनीय है और न ही स्वीकार्य। तीन दिवसीय इस बैठक के समापन पर कांग्रेस पार्टी को देश के लोगों को इसकी पर्याप्त वजह देनी होगी कि जब लोकसभा चुनावों का आयोजन हो तो उन्हें क्यों नरेंद्र मोदी से इतर देखने की जरूरत है।

चूंकि यह राजनीतिक जमावड़ा होगा, इसलिए नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ बहुत ज्यादा पक्षपाती और झूठ बोलने वाले लोग होंगे। अगर कांग्रेस के नेता खुद को इसमें शामिल करते हैं और इस पर ध्यान दिया जाता है तो यह समय और संसाधनों की बर्बादी होगी। अगर कांग्रेसी अपनी परिचित कमजोरी चाटुकारिता में ही उलझे रहे तो यह सबसे बड़ा मजाक और शर्मनाक होगा। इसके बजाय उन्हें संवैधनिक मूल्यों के सर्वोत्तम और जिम्मेदार रखवाले के रूप में व्यवहार करना और बोलना होगा।

जैसा कि कुछ लोग भारत के विचार के लिए प्रतिबद्ध होने और नेहरूवादी गुणों को आत्मसात करने का दावा करते हैं, उन कांग्रेसी नेताओं को अपने हाथों में शालीन और गंभीर कार्य लेने होंगेरू एक लोकतांत्रिक दायित्व, जो कि साथी-नागरिकों को यह बताना होगा कि हम सभी किस तरह से अल्पकालिक शख्स के भयावह जाल में बिना सोचे समझे फंस गए। साथ ही यह भी बताना होगा कि कैसे एक राष्ट्र के रूप में और एक समाज के रूप में हम तुच्छ और छोटे विचारों से संक्रमित हो रहे हैं। इससे भी बढ़कर कांग्रेस के नेताओं को राष्ट्र को यह समझाने की जरूरत है कि हम सभी को ओछे प्रतिशोध के इस दलदल से बचाने के लिए उनके पास विरासत, नेतृत्व और अनुभव है।

हम अब- एक संवैधानिक लोकतंत्र में रहते हैंय लेकिन हमारी सभी संवैधानिक व्यवस्थाएं कमजोर हो रही हैं और संवैधानिक पद पर बैठे लोग दृ चाहे वह भारत के राष्ट्रपति या केंद्रीय गृह मंत्री या विदेश मंत्री हों, उन्हें कमतर महसूस कराया गया है। सरकार की कैबिनेट प्रणाली को एक मजाक में बदल दिया गया है जो अब हंसी का आह्वान नहीं करता है। देश को यह बताने की जरूरत है कि चेक और बैलेंस की उचित व्यवस्था गंभीर खतरे में है।

कांग्रेस के नेताओं पर है कि वह नागरिकों को समझाएं कि हमारी राष्ट्रीय योजनाओं के सभी प्रमुख संबंधों में कैसे संशोधन और उसे कमतर किया गया हैरू सबसे पहले, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक समीकरण को व्यवस्थित तरीके से नया रूप दिया गया है और धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं का क्षरण किया गया, दूसरा केद्र-राज्य के संघीय ढांचे को खतरनाक रूप से नई दिल्ली के पक्ष में किया गया है और राज्य सरकारों के अधिकारों को घटाया जा रहा है, तीसरा सरकार-नागरिक के संतुलन में भी व्यापक तौर पर बदलाव आया है, और सभी दखल आधार अधिष्ठापन अनुपालन और गोपनीयता की आत्मसमर्पण की मांग कर रहा है।

उसके बाद नागरिक-सेना के संबंधों में विकृतियां आई हैं, सेना के समक्ष अपनी संस्थागत ईमानदारी को खोने का खतरा है, और अंत में सरकार ने सीधे तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर अपना कब्जा जमा लिया है। ये सभी महत्वपूर्ण समीकरण चर्चा से दूर हैं। और, हमारे नागरिकों को यह बताया जाना चाहिए कि इन संस्थागत विकृतियों ने अजेय रूप से राष्ट्र को एक अधिनायकवादी-प्रयोग की राह पर ला खड़ा किया है।