रैवतक की पुण्यता

ललित शौर्य

रैवतक एक पुण्य पौराणिक पर्वत है। इसका नाम महाभारत से लेकर अनेक पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है। इस पर्वत पर अनेक पौराणिक घटनाएं घटित हुई हैं, साथ ही ये अनेक ऐतिहासिक घटानाओं का गवाह रहा है। रैवतक हिन्दू धर्म के साथ -साथ जैन सम्प्रदाय की श्रद्धा का केंद्र भी रहा है।हिन्दू मंदिरों के अलावा जैन मंदिर भी रैवतक पर्वत की शोभा बढ़ाएँ हुए हैं।जैन सम्प्रदाय के अनेक ग्रन्थ भी रैवतक की महिमा का बखान करते हैं।

रैवतक पर्वत जिला जूनागढ़ , काठियावाड़ गुजरात में स्थित है। इसे गिरनार नाम से भी जाना जाता है। महाभारत में उल्लखित क्रोड़ नामक तीर्थ स्थल रैवतक पर्वत पर ही था। इसी पर्वत पर अर्जुन ने सुभद्रा का हरण किया था। महाभारत के सभापर्व के अनुसार रैवतक पर्वत द्वारका (कुशस्थली) के पूर्व की ओर स्थित है। रैवतक पर्वत के नामकरण के पीछे भी एक कथा है। विष्णुपुराण के अनुसार महाराजा आनर्त के पुत्र पराक्रमी रैवत हुए। जिन्होंने कुशस्थली में राज किया था। राजा रैवत के नाम से इस पर्वत का नाम रैवतक प्रसिद्ध हुआ। राजा रैवत की पुत्री रेवती हुई जिसका  विवाह भगवान् श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम के साथ हुवा था। जैन ग्रन्थ ‘अंतकृत दशांग’ में रैवतक को द्वारवर्ती के उत्तर पूर्व में स्थित माना गया है। इसके अनुसार इस पर्वत शिखर पर ‘नंदनवन’ नामक उद्यान स्थित था। जो अत्यंत रमणीक एवं मनमोहक था।

महाकवि माध ने ‘शिशुपाल वध’ में रैवतक पर्वत का अत्यंत सुन्दर वर्णन किया है। इसकी दिव्यता और अलौकिकता पढ़ते ही बनती है । वो पर्वत का चमत्कारिक वर्णन करते हुए लिखते हैं कि इस पर्वत की सुंदरता क्षण-क्षण बदलती है। हर दृष्टि में ये बदला हुवा और नवीन प्रतीत होता है। रैवतक पर्वत में अंबमाता, गोरखनाथ, औधड़, सीखर, गुरु दत्तात्रेय और कालका नामक शिखर स्थित हैं। गोरखनाथ सबसे ऊंचा शिखर है जिसकी ऊंचाई 3,666 फुट है।

रैवतक पर्वत पर प्राचीन जैन मंदिर है। जहाँ पहुचने के किये 700 सीढियाँ चढ़नी पड़ती हैं। यहाँ निर्मित तीन मंदिरों में पहले मंदिर का निर्माण कुमारपाल दूसरा मंदिर वास्तुपाल और तेजपाल नामक भाइयों ने बनाया था। इसे तीर्थंकर मल्लिनाथ मंदिर कहते हैं जो विक्रम सम्वत 1288 में बनकर तैयार हुवा। तीसरा मंदिर नेमिनाथ का है। जो 1277 ई.में बना । यह मंदिर अत्यंत भव्य एवं आकर्षक है। इसकी भव्यता नेत्रों को स्वतः ही आकर्षित करती है। पालीताना के बाद यह स्थल जैनियों का दूसरा प्रमुख तीर्थस्थल है।

रैवतक पर्वत पर दत्तात्रेय एवं गोमुखी गंगा का मंदिर भी स्थित है। जो हिंदुओ की आस्था का केंद्र है। रैवतक पर्वत महाराजा खेतसिंह खंगार की जन्मस्थली भी है। यहीं से खंगार क्षत्रिय जाति का उद्गम हुवा था। ये अत्यंत बहादुर एवं युद्ध कला में निपुण जाति मानी जाती है। खंगार लोग ही जैन धर्म के संरक्षक माने जाते हैं। खासकर सौराष्ट्र, गुजरात में जैन धर्म के संरक्षण का कार्य खंगार क्षत्रियों ने ही किया। इस बात की पुष्टि जैन सम्प्रदाय की पवित्र पुस्तक “गिरनार गौरव’ से होती है।

महाभारत और हरिवंशपुराण से पता चलता है कि रैवतक पर्वत के निकट यदुवंशियो (यादवों) की बस्ती थी। उनके द्वारा कार्तिक मास में रैवतकमह नामक उत्सव मनाया जाता था। उस समय रैवतक पर्वत की 25 मील की परिक्रमा भी की जाती थी। इस परिक्रमा को अत्यंत फलदायक माना जाता था। इस परिक्रमा से लोगों की अनेक मनोकामनाएं पूर्ण होती थी।रैवतक पर सम्राट अशोक के चौदह धर्म लेख उत्कीर्ण हैं।रैवतक पर्वत पर श्री कृष्ण ने ‘सिद्ध विनायक’ मंदिर की स्थापना की थी। माना जाता है कि ‘कालमेघ’, ‘मेघनाद’, ‘गिरिविदारण’, ‘कपाट’, ‘सिंहनाद’, ‘खोड़िग’, ‘रेवया’ नामक सात क्षत्रपों का जन्म रैवतक पर ही हुवा था। इसी पर्वत की चट्टानों पर रुद्रदामन क्षत्रप का लगभग 120 ई. का संस्कृत अभिलेख भी उत्कीर्ण है।

रैवतक पर्वत सिंहों के लिए भी प्रसिद्ध है। गिर नस्ल की गायों के लिए भी गिरनार (रैवतक) जाना जाता है। गिर नस्ल की गायों का दूध अत्यंत पौष्टिक होता है। शोध बताते हैं कि इस नस्ल की गायों में स्वर्ण कण पाये जाते हैं। इस तरह रैवतक पर्वत आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंनत स्मृद्ध है। इसका सौन्दर्य अभिनव है। ये हिंदुओ एवं जैनियों के आस्था का केंद्र है। प्रातः स्मरणीय रैवतक सर्वसिद्धि दाता है।