पार्टी-परिवार के रिश्ते की पहेली

दशकों से परिवारवाद गैर कांग्रेसी दलों का कांग्रेस के विरुद्ध सबसे असरदार हथियार रहा है। समय-समय पर गैर कांग्रेसी दलों के तरकश में दूसरे मुद्दे भी तीर बन कर जगह पाते रहे हैं, लेकिन परिवारवाद उनका स्थायी हथियार बना रहा है। हालांकि कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक परिवारवाद देखा जा सकता है, लेकिन गैर कांग्रेसी दलों का असली निशाना उसका शीर्ष नेतृत्व यानी नेहरू परिवार ही रहा है। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो मोदी-अमित शाह की जोड़ी और भाजपा का कांग्रेस के विरुद्ध यह ब्रह्मास्त्र ही बन गया है। हाल के वर्षों में युवराज और शहजादे सरीखे विशेषणों के जरिये इस हथियार को हरसंभव धार देने की कवायद लगातार जारी है।

इधर प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस के लिए एक नया शब्द बेल-गाड़ी खोजा है। हालांकि कभी दो बैलों की जोड़ी कांग्रेस का चुनाव चिन्ह रहा है, लेकिन इस नामकरण का उससे कुछ भी लेना-देना नहीं है। दरअसल यह शब्द भी मोदी ने कांग्रेस के परिवारवाद पर प्रहार के लिए बनाया है। वंशवाद की बेल से बेल लिया गया है तो कांग्रेस को उस बेल के सहारे चलने वाली गाड़ी करार दिया गया है।

निश्चय ही लोकतंत्र के आंगन में वंशवाद की बेल के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। दरअसल परिवारवाद की सोच लोकतंत्र की मूल भावना का ही अपमान है, लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की विडंबना देखिए कि वाम दलों को अपवाद मान लें तो ज्यादातर राजनीतिक दल इस मामले में कांग्रेस का और भी विद्रूप संस्करण नजर आते हैं। कई गैर कांग्रेसी दल तो परिवार विशेष की जागीर ही बनकर रह गये हैं। कटु सत्य यह भी है कि कांग्रेस के विरुद्ध परिवारवाद को ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करने वाली भाजपा भी वंशवाद की इस बीमारी से अछूती नहीं है।

बेशक मोदी-शाह का कोई परिजन भाजपा की राजनीति में नहीं है, लेकिन कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह से लेकर वसुंधरा राजे, प्रेम कुमार धूमल और दिवंगत प्रमोद महाजन व गोपीनाथ मुंडे तक उन भाजपा नेताओं की फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, जिनके परिजन पार्टी में परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। क्या यह वंशवाद नहीं है? निश्चय ही यह भी वंशवाद ही है, जो कांग्रेस के वंशवाद जितना ही लोकतंत्र विरोधी और नुकसानदेह है, लेकिन परिवारवाद का एकमात्र यही रूप हमारे लोकतंत्र में नहीं है। स्थानीय निकायों-पंचायतों में परिवार का दूसरा ही रूप नजर आता है, जब निर्वाचित प्रतिनिधि पत्नी का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके पति उनकी भूमिका का निर्वाह करने लगते हैं। क्या यह लोकतंत्र का मखौल नहीं है?

दरअसल जब हम लोकतंत्र को महज शब्द तक सीमित कर उसका हरसंभव दुरुपयोग करना चाहते हैं तब ऐसी ही विकृतियां सामने आती हैं। महिलाओं की राजनीति में सक्रिय भागीदारी स्वागतयोग्य है। आधी आबादी की सक्रियता के बिना लोकतंत्र सार्थक हो ही नहीं सकता, लेकिन यह काम प्रतीकात्मक तौर पर नहीं किया जा सकता। बिना पर्याप्त जमीनी तैयारी के राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का परिणाम यह हुआ कि सक्रिय राजनेताओं ने अपनी पत्नियों-पुत्रियों को आगे कर दिया। महिलाओं के लिए सीट आरक्षित होने पर पत्नी या पुत्री-पुत्रवधू और अनारक्षित होने पर खुद चुनाव लडऩा भी परिवारवाद का ही तो रूप है। पत्नी-पुत्री-पुत्रवधू के निर्वाचित होने पर भी भूमिका का निर्वाह खुद करना तो परिवारवाद के साथ-साथ लोकतंत्र का अपमान भी है, पर यह पूरे देश में लगातार हो रहा है, लेकिन कहीं से कोई आवाज नहीं उठती। उठे भी कैसे, हर कोई शरीक-ए-जुर्म जो है।

अभी तक हमने जिस राजनीतिक परिवारवाद की चर्चा की, वह दरअसल इस पूरे मुद्दे का एक पहलू भर है, जो निश्चय ही नकारात्मक भी है। मुद्दे का दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मसलन, ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जायेंगे, जहां निर्वाचित सांसद-विधायक की पत्नियां-पुत्रियां खासकर निर्वाचन क्षेत्र में जन संपर्क में लगातार महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती रहती हैं। चंडीगढ़ का ही उदाहरण लें तो दो पूर्व सांसदों (पवन कुमार बंसल और हरमोहन धवन) की पत्नियां मधु बंसल और सतिंदर धवन न सिर्फ चुनाव प्रचार के दौरान, बल्कि उसके बाद भी उनकी प्रतिनिधि के रूप में लगातार निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय नजर आयीं।

करनाल के वर्तमान सांसद अश्वनी चोपड़ा के बारे में भी यही धारणा है कि उनसे ज्यादा उनकी पत्नी किरण चोपड़ा निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय रहती हैं। प्रियंका गांधी लंबे समय से अपनी मां सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में सक्रिय रही ही हैं। जाहिर है, यह फेहरिस्त भी बहुत लंबी बन सकती है, पर बेहद स्वाभाविक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इसे किस श्रेणी में रखा जाये? राजनीतिक दल की संस्कृति के लिहाज से यह उचित भले ही न हो, लेकिन व्यावहारिक तो निश्चय ही है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने परिजन पर ज्यादा विश्वास करे, और मतदाता भी किसी अन्य सांसद-प्रतिनिधि के बजाय निर्वाचित प्रतिनिधि के परिजन से मिलकर अपनी बात कह कर अधिक संतुष्ट महसूस करें।

इधर राजनीति में परिवार की सक्रियता का एक और रूप सामने आया है। अन्य राजनीतिक दलों के बारे में अभी कह पाना मुश्किल है, लेकिन केंद्र और देश के ज्यादातर राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा में तो यह व्यवस्थित रूप में है। भाजपा के सांसदों की पत्नियों ने मिलकर कमल सखी नामक समूह बनाया है। इस समूह की सक्रियता की ज्यादा चर्चा नहीं हुई, पर यह संसद के कमोबेश हर सत्र के दौरान किसी खास नीतिगत फैसले या सरकारी कार्यक्रम पर एक आयोजन अवश्य करता है, जिसमें संबंधित मंत्री भी आते हैं और बाकायदा वैसे ही प्रस्तुति देते हैं, जैसे मीडिया या जनता के समक्ष दी जाती है। इसी प्रस्तुति को आधार बनाकर अपवाद स्वरूप सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों और उपलब्धियों के प्रचार की कमान कमल सखी ने संभाल रखी है। बेशक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा की पत्नी मल्लिका एक राजनीतिक परिवार से आती हैं।

वह खुद भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राष्ट्रीय महामंत्री रह चुकी हैं। उनकी तरह कुछ अन्य भाजपा सांसदों की पत्नियों की भी राजनीतिक पृष्ठभूमि हो सकती है, लेकिन सांसदों की पत्नियों की ऐसी व्यवस्थित राजनीतिक भूमिका राजनीति में परिवार की भूमिका का एक और रूप तो उजागर करती है। बेशक कमल सखी के समक्ष मंत्रियों की प्रस्तुति एक विवादास्पद मुद्दा बन सकती है, लेकिन अपने जीवन साथी के कर्मक्षेत्र में बिना किसी औपचारिक भूमिका के ऐसा सहयोग, जो अंतत: राजनीतिक दल के लिए भी चुनावी लाभ सुनिश्चित कर सकता है, कैसे गलत ठहराया जा सकता है?

अगर इसे विधायक स्तर तक भी अपना लिया जाये तो भाजपा के पास आधी आबादी तक पहुंच का एक प्रभावी माध्यम तैयार हो जायेगा। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि अगर ऐसी भूमिका के निर्वाह के बाद कोई सक्रिय संगठनात्मक या चुनावी राजनीति में आ जाये, तब भी क्या उसे परिवारवाद ही कहा जायेगा? कांग्रेस के विरोधी अक्सर उसे एक परिवार की पार्टी कह कर कटाक्ष करते रहे हैं, लेकिन यह नया प्रयोग बताता है कि भाजपा खुद अपनी पार्टी को परिवार की तरह बना रही है। ऐसे में परिवार में पार्टी है या पार्टी में परिवार, यह पहेली दिलचस्प भी है और जटिल भी।