प्राविधानों में सरलीकरण किये जाने पर बल

नई दिल्ली/देहरादून। मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने शुक्रवार को नई दिल्ली में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन से भेंट की। भेंट के दौरान मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने प्रदेश में वन भूमि हस्तांतरण तथा क्षतिपूर्ति सम्बंधी प्रावधानों में सरलीकरण, डिग्रेडेड फोरेस्ट लेण्ड ही क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण के लिये उपलब्ध कराये जाने, भागीरथी इको सेंसेटिव जोन से सम्बंधित अधिसूचना के प्राविधानों में संशोधन किये जाने, केम्पा के प्राविधानों में सरलीकरण, 1000 मीटर से अधिक ऊचाई वाले क्षेत्रों में पेड़ कटान की अनुमति तथा जंगली सूअर से मानव एवं कृषि की रक्षा हेतु जंगली सूअरो को मारने की अनुमति दिये जाने आदि से सम्बंधित राज्य हित से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर आवश्यक सहमति प्रदान करने का अनुरोध किया। इसके अतिरिक्त उन्होने वन अधिनियम के नियमों से राज्य में विकास परियोजनाओं में आ रही बाधाओं, प्रदेश के अन्तर्गत नियोजित विकास में सहयोग, बेहतर वन प्रबन्धन तथा मानव एवं कृषि को जंगली पशुओं से क्षति की रोकथाम हेतु भी समुचित उपाय किये जाने की आवश्यकता पर केन्द्रीय वन मंत्री से चर्चा की।

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने केन्द्रीय मंत्री को बताया कि प्रदेश का लगभग 71 प्रतिशत भाग वनाच्छादित होने के कारण विकास परियोजनाओं में न्यूनाधिक मात्रा में वन भूमि की आवश्यकता होती है। परन्तु वन भूमि हस्तांतरण की प्रचलित प्रक्रियाओं को पूर्ण करने में काफी समय लगने से विकास परियोजनाओं की गति धीमी हो जाती है। इस स्थिति में सुधार एवं विकास परियोजनाओं के शीघ्र क्रियान्वयन हेतु शिथिलीकरण की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने वन भूमि हस्तान्तरण तथा क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण सम्बंधी प्राविधानों में सरलीकरण किये जाने पर बल देते हुए केन्द्रीय वन मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन को बताया कि भारत सरकार द्वारा पूर्व में 01 हेक्टयर तक वन भूमि हस्तान्तरण के कतिपय प्रकरणों में स्वीकृति निर्गत करने हेतु राज्य सरकार को अधिकृत किया गया है जिसकी अवधि दिनांक 18 दिसम्बर, 2018 को समाप्त हो रही है।

इसके साथ ही वर्ष 2013 की आपदा के उपरान्त भारत सरकार द्वारा आपदा प्रभावित जनपदों मंे 05 हैक्टेयर तक के प्रकरणों में स्वीकृति प्रदान करने हेतु राज्य सरकार को अधिकृति किया गया था जिसकी अवधि भी 07 नवम्बर, 2016 को समाप्त हो चुकी है इसके विस्तारीकरण हेतु राज्य सरकार के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की जाय। मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्निर्माण कार्य अभी भी अवशेष हैं और चारधाम आॅल वैदर रोड, पी.एम.जी.एस.वाई., ग्रामीण विद्युतीकरण तथा नमामि गंगे आदि कतिपय परियोजनाओं के लिये वन भूमि हस्तान्तरण के विषयों पर शीघ्र निर्णय आवश्यक है। अतः कार्यहित में 05 हैक्टयर तक के प्रकरणों में स्वीकृति प्रदान करने हेतु राज्य सरकार को दिया गया अधिकार सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र तथा सभी परियोजनाओं के संदर्भ में आगामी 05 वर्षो तक के लिए बढ़ाया जाना जनहित में आवश्यक है।

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि भारत सरकार बी0आर0ओ0 की सड़क निर्माण परियोजनाओं एवं केन्द्र सरकार/केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों की परियोजनाओं के लिए क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण डीग्रेडेड फोरस्ट लैण्ड (Degraded Forest Land) पर किये जाने की अनुमति प्रदान की गयी है, किन्तु पी.एम.जी.एस.वाई. की सड़क निर्माण परियोजनााअें के साथ-साथ राज्य सरकार की समस्त परियोजनाओं के निमित्त क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण हेतु दोगुनी मात्रा में सिविल भूमि की अनिवार्यता की गयी है। मानकों में यह भिन्नता औचित्यपूर्ण नहीं है।

उन्होने बताया कि प्रदेश का 71 प्रतिशत भूभाग वनाच्छादित होने, शेष अन्य सिविल भूमि में भी अधिकांश भूमि दुर्गम व पथरीली होने के कारण वनीकरण न होने, काफी भूमि आबादी से आच्छादित एवं कृषि/बागवानी कार्यों के निमित्त आवश्यक होने तथा कुल वन भूमि में से भी लगभ 26 प्रतिशत डीग्रेडेड फोरस्ट (Degraded Forest) होने के कारण ऐसी भूमि में भी अतिरिक्त वनीकरण की अन्यन्त आवश्यकता एवं पूर्ण संभाव्यता होने के दृष्टिगत केन्द्र पोषित, बाह्य सहायतित अथवा राज्य पोषित समस्य परियोजनाओं के लिए सर्वप्रथम डीग्रेडेड फोरस्ट लैण्ड (Degraded Forest Land) ही क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण हेतु उपलब्ध कराये जाने की अनुमति प्रदान की जाय।

इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री ने केन्द्रीय वन मंत्री के समक्ष यह समस्या रखी कि भारत सरकार द्वारा अन्तराष्ट्रीय सीमा क्षेत्र में लाइन आफ एक्चुअल कन्ट्रोल से 100 कि.मी. एरियल डिस्टेंस बी.आर.ओ. तथा आई0टी0बी0पी0 के लिये 2 लेने मार्ग निर्माण की योजनाओं के सम्बंध में वन भूमि हस्तांतरण के सभी प्रकरणों में अनुमति देने हेतु राज्य सरकार को अधिकृत किया गया है किन्तु भारत सरकार के निर्देशों में उक्त व्यवस्था केवल देश के पूर्वी एवं पश्चिमी सीमा के लिये अनुमन्य किया गया है।

अतः इन निर्देशों पर पुनर्विचार कर चीन नेपाल सीमा पर स्थित उत्तराखण्ड जैसे उत्तर पूर्वी सीमा क्षेत्रों के लिये भी समान व्यवस्था लागू किया जाना आवश्यक है, चुंकि उत्तराखण्ड का अधिकांश क्षेत्र अन्तराष्ट्रीय सीमा से जुडा है। आन्तरिक सुरक्षा की दृष्टि से राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित सड़क परियोजनायें भी स्थानीय निवासियों के साथ-साथ आई0टी0बी0पी0 अथवा अन्य सुरक्षा इकाइयों के लिये भी सहायक होती है। अतः सीमा क्षेत्र में 100 कि0मी एरियल डिस्टेंस में पडने वाली समस्त सड़क परियोजनाओं को वन भूमि हस्तांतरण के लिये राज्य सरकार को अधिकृत किया जाय।

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने केन्द्रीय वन मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन से भागीरथी ईको सेंसटिव जोन से सम्बन्धित अधिसूचना मेें पुनर्विचार अथवा अधिसूचना के प्राविधानों में संशोधन करने का भी अनुरोध किया। भारत सरकार द्वारा जनपद उत्तरकाशी के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगे गौमुख से उत्तरकाशी तक के 135 किमी लम्बाई के क्षेत्र में मार्ग के दोनों ओर 4,179.59 वर्ग किमी. क्षेत्र को ‘भागीरथी प्रास्थितिकी संदेनशील क्षेत्र घोषित किया गया है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत 98 प्रतिशत क्षेत्र आरक्षित वन क्षेत्र/संरक्षित क्षेत्र होने तथा मात्र 02 प्रतिशत क्षेत्र ही कृषि एवं आवासीय क्षेत्र होने के दृष्टिगत ईको सेंसिटिव जोन सम्बन्धी अधिसूचना में निहित प्राविधानों के अनुसार भू उपयोग परिवर्तन, पहाड़ी ढ़लानों पर निर्माण, हाईड्रोइलैक्ट्रिक प्रोजेक्ट की स्थापना एवं खनन आदि प्रतिबन्धित होने के कारण इस क्षेत्र के अन्तर्गत सामरिक महत्व के मार्गों सहित चारधाम आॅल वैदर रोड जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भी भूमि की व्यवस्था कर पाना अथवा स्थानीय लोगों की मूलभूत आवश्यकता से सम्बन्धित अन्य विकास योजनाओं को क्रियान्वित कर पाना कठिन हो गया है।

अन्तर्राष्ट्रीय सीमावर्ती क्षेत्रों में पलायन की प्रवृत्ति को रोकने तथा आन्तरिक सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण परियोजनाओं के निर्माण की सुगमता हेतु ईको सेंसिटिव जोन की अधिसूचना पर पुनर्विचार आवश्यक है अथवा तत्सम्बन्धी जोनल मास्टर प्लान के अन्तर्गत उत्तराखण्ड राज्य के लिए भी भारत सरकार द्वारा उसी प्रकार शिथिलीकरण स्वीकृत किया जाना आवश्यक है जैसा कि महाराष्ट्र ;वैस्टर्न घाट ईको सेंसिटिव जोनद्ध एवं हिमांचल प्रदेश के लिए ईको सेंसिटिव जोन के सम्बन्ध में दिया गया है।

कैम्पा के प्राविधानों में सरलीकरण की अपेक्षा करते हुए मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने कहा कि उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्य जहाँ 71 प्रतिशत से अधिक भू-भाग पर वन हैं तथा जिसका पर्यावरणीय लाभ पूरे देश व विश्व को मिलता है, को अपनी वन सम्पदा के संरक्षण एवं संवर्द्धन की पूर्ति हेतु कैम्पा के एन.पी.वी. मद में अतिरिक्त सहायता का प्राविधान रखे जाने की आवश्यकता है। वर्ष 2017-18 की अनुमोदित वार्षिक कार्ययोजना 192.35 करोड़ के सापेक्ष भारत सरकार द्वारा 96.00 करोड़ की धनराशि अवमुक्त की गई है जिसमें उनके द्वारा विशिष्ट मदों में ही अवमुक्त धनराशि को व्यय किए जाने की शर्तें अधिरोपित की गई हैं। वन सुरक्षा सुदृढ़ीकरण, मृदा एवं जल संरक्षण कार्य, वनाग्नि सुरक्षा एवं प्रबंधन, मानव वन्यजीव संघर्ष रोकथाम, वन एवं वन्यजीव शोध, मानव संसाधन विकास, इत्यादि महत्वपूर्ण गतिविधियों के अंतर्गत भी केम्पा के अधीन व्यय किए जाने की अनुमति प्रदान की जाये।

चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने 1000 मीटर से अधिक ऊँचाई के क्षेत्रों में पेड़ कटान की अनुमति दिये जाने का भी अनुरोध किया। उन्होने बताया कि प्रदेश के चीड़ वनों के स्वास्थ्य एवं उत्पादकता में गिरावट के साथ प्रौढ़ चीड़ वृक्षों से अत्यधिक मात्रा में लगातार पिरूल गिरने तथा फायर लाइनों पर चीड़ के प्रौढ़ वृक्ष आ जाने से वनों में अग्नि दुर्घटना की सम्भावना बढ़ी है। छत्र (canopy) न खुलने के कारण चीड़ वनों में प्राकृतिक पुनरोत्पादन प्रभावित हो रहा है। चीड़ वृक्ष पड़ोस के अच्छे प्राकृतिक बांज वनों में अतिक्रमण कर रहे हैं, जिससे बांज वनों की गुणवत्ता एवं पर्यावरणीय सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। चीड़ वन बगल के खुले कृषि भूमि में भी अतिक्रमण कर रहे हैं, जिससे खेती पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है एवं लोग खेती त्याग रहे हैं। पातन न होने के कारण राजस्व में कमी आ रही है। अतः 1000 मीटर से ऊपर स्थित प्रौढ़ चीड़ वृक्षों को काटने की अनुमति प्रदान की जाय।

मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र ने जंगली सुअर से मानव एवं कृषि की रक्षा हेतु जंगली सुअरों को मारने की अनुमति दिये जाने का भी अनुरोध किया। उत्तराखण्ड के समस्त ग्रामीण क्षेत्रों में जंगली सुअरों द्वारा खेती को अत्यधिक नुकसान पहुंचाया जा रहा है। खेती में हो रहा नुकसान पर्वतीय क्षेत्रों से लोगों के पलायन का एक प्रमुख कारण बन रहा है। अतः इस अधिसूचना को एक वर्ष के लिये और विस्तारित करने की अपेक्षा उन्होने केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री से की है।