“मां”

राज शेखर भट्ट
ये जमीं-आसमां तेरा सारा जहां एक मां ही तो है।
नभ-जल-थल यहां और वहां एक मां ही तो है।मां के बिन ये जीवन अधूरा सा है।
अखियन समीप लगे कोहरा सा है।
रिश्तों से भरी हैं ये दुनिया की किताबें।
पर मां के बिना हर शब्द कोरा सा है।
तन-मन-धन और तेरा जीवन एक मां ही तो है।
भक्ति-भजन और प्रभु की लगन एक मां ही तो है।

मां के जीवन का कोई पर्याय नहीं है।
मां की कथा अनन्त अध्याय नहीं है।
कैकई का नाम काम किसी और का ही था।
इतनी कठोर कोई भी मां हाय नहीं है।
ये वेदों का ज्ञान ये गीता-कुरान एक मां ही तो है।
सतयुग-द्वापर त्रेता-कलियुग एक मां ही तो है।

याद आया बचपन का जमाना मुझको।मुझको।
गोदी में ले के दूध पिलाना मुझको।
थाम कर हाथ मेरा चलना सिखाया मुझको।
हर मुसीबत से बुराई से बचाया मुझको।
‘राज’ मेरी जिदों पे जो जां थी लुटाती एक मां ही तो है।
जो मेरी शरारत पे लोगों से लड़ती एक मां ही तो है।