ओये! गिव मी आजादी

ललित शौर्य

देश को आजादी मिले दशकों बीत गए। पर अभी भी कई ऐसे हैं जिनके दिलों में आजादी की नापाक हसरतें कत्थक कर रही हैं। ये जोर से मांगते हैं आजादी। खींच के मांगते हैं आजादी। पी के मांगते हैं आजादी। खा कर मांगते हैं आजादी। चढ़ा के माँगते हैं आजादी। ये बड़े-बड़े बुद्धिजीवी कहे जाते हैं। जिनकी बुद्धि में आजादी-आजादी ही घुसा हुवा है। भारत की खाते हैं पड़ोसी के गुणगान करते हैं।इनको आजादी फोबिया है। रात दिन , सुबह -शाम आजादी- आजादी इनका नारा है। आजादी का नारा ही इनका सहारा है। पेट की भूख को शांत करने, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने, सरकारी सुरक्षा पाने का एक मात्र तरीका आजादी का बुलबुला है। जिसे ये हर रोज सुबह उठकर फुलाते हैं। ये हड़काके, भड़काके आजादी पाना चाहते हैं। देश को तोड़ के आजादी की कॉलर मरोड़ना चाहते हैं। आजादी पाने के लिए ये पत्थर मार रहे हैं ,पत्थर मरवा रहे हैं। देश की राजधानी में बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़कर भी इनको आजादी चाहिये।

देश विरोधी बातें इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं। ये तो अभिव्यक्ति की आजादी है। अंट-शंट बोलना फ्रीडम ऑफ़ स्पीच है। ये शाम , दाम, दण्ड, भेद सभी जुमले आजमाकर आजादी चाहते हैं। नाचते, गाते हुए भी ये आजादी मांगते हैं। एके 47 उठाकर आजादी मांगते हैं। अंग्रेजी में गरजते हुए आजादी मांगते हैं। मिडिया के सामने हाथ लहराते हुए आजादी मांगते हैं। फेसबुक पर आजादी मांगते हैं, व्हाट्स एप्प पर आजादी मांगते हैं, ट्विटर पर आजादी मांगते। हर जगह आजादी राग अलापते हैं। सरकारों को धमका कर आजादी माँगते हैं। इन अक्ल के मारों को आजादी का अ तक पता नहीं।

आजादी का असल मतलब जानते तो इतना आजाद होकर बात नहीं कर पाते। अरे साहब ये आजादी नहीं तो और क्या है। देश की खा रहे हैं, देश ने इतनी सहूलियतें दी हैं। घूम रहे हो। मौज कर रहे हो। फिर भी आजादी का कीड़ा अंदर घुसा जा रहा है।वैसे ये आजादी का कीड़ा तो पाक प्रयोजित है। जो पैसे देकर इनके अंदर घुसाया जा रहा है। असल में ये आजादी के भक्षक हैं। आजादी को घोल कर पी जाना चाहते हैं। ये छाती चौड़ी कर, हेकड़ी जमाते हुए बकते हैं ओये! गिव में आजादी।वी वांट आजादी। इन आजादी वाले कठपुतलियों को इनके आका नचा रहे हैं। जिनको ये अपना चचा जान कहते हैं । और वही चचा इनके जान का भी दुश्मन है। पर ये आजादी की खयाली खीर बना रहे हैं, जो इनके मुंह कभी नहीं लगने वाली।