न हम वेवफा हैं न तुम…………..हो

सलीम रज़ा

राजनीति एक ऐसा विषय है, जिस पर जितना भी बोल लो, लिख लो कम ही है। इसकी खासियत है कि इसमें सकारात्मक पहलू कम और नकारात्मक पहलू ज्यादा हैं। चलो मान भी लिया जाये कि सरकार के कार्यों को सकारात्मक रूप से दिखाया या लिखा जाये तो लोगों के मन मस्तिष्क की सुई शक की तरफ घूम जाती है और दिखाने या लिखने वाले की ईमानदारी चापलूस या दलाल जैसे अलंकारों से सुशोभित होकर रह जाती है। फिर उसके समीक्षक आक़ा लोग पेड न्यूज़ के खिताब से नवाज़ देते हैं।

बड़ी दुविधा में हैं गरीब पत्रकार। अगर सरकार की कार्यशैली पर नुक्ता चीनी करें या लिखें तो एक धड़ा कहता है इसे कुछ मिला नहीं या फिर ये विपक्षी पार्टी का चमचा है वगैरा-वगैरा। हां एक बात तो कहना भूल ही गया कुछ लोग दिखाने और लिखने वालों को पारदर्शिता का भी पाठ पढ़ाते हैं। ये पारदर्शिता कहां मिलेगी, किसकी दुकान पर मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं मिलेगी, असमंजस में हूं भई।

जब संस्कार की बुनियाद कमजोर होने लगती हैं तो आदर्श की दीवारें दरकने लगती हैं, परदर्शिता का प्लास्तर उखड़ने लगता है, फिर तो जग जाहिर है कि ईमानदारी का रंग-रोगन, दाग़ और धब्बेदार हो जाता है। खैर ये बहस का विषय नहीं है, बल्कि चिंतन का विषय है, जिसमें हर किसी को गम्भीर होना पडेगा। सच बात बहुत कड़वी होती है लेकिन इस व्यथा को बयान नहीं किया जा सकता, वरना चमक समझ लो खत्म के कगार पर है।

चलिये जब इतनी बात हो गई तो आगे बढ़ते हैं। क्यों न उत्तराखण्ड की मौजूदा और पूर्ववर्ती सरकार की बात कर ली जाये। उत्तराखण्ड आज तमाम तरह की समस्याओं से दो-चार है। जहां अपनी जायज मांग के लिये आन्दोलनरत पुरूष-महिलाओं पर बर्बरता पूर्ण व्यवहार किया जा रहा है। बेरोजगार नौनिहालों पर लाठियां भांजी जा रही हों। कर्मचारी वेतन के लिये तरस रहे हों। पलायन पर सरकार की आंखें बन्द फिर भी जनता को गुमराह करने के लिये पलायन आयोग बनाया जा रहा है। उसमें भी पहाड़ के युवाओं को दरकिनार किया जा रहा है और सरकार अपने सफल एक साल पर अपनी पीठ थपथपा रही है।

उत्तराखण्ड का जैसा विपक्ष है, ऐसा विपक्ष कहीं और नहीं देखा, एक दम निष्क्रिय मानसून की तरह। सही मायनों में अगर विपक्ष को मित्र विपक्ष की संज्ञा दी जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। एक बात ध्यान रहे, जिस प्रदेश में विपक्ष मित्र भूमिका में हो तो समझ लेना चाहिये कि विकास के पहिये जाम हैं और एक्टिंग सरकार अपनी मनमानी पर उतारू रहेगी। कितनी बिडम्बना है इस छोटे से प्रदेश में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हो गई हैं, इसे निकालना आसान ही नहीं नामुमकिन है। कोई भी नीति पारदर्शी नहीं है।

अब शराब पर ही चर्चा कर ली जाय। पहले बैंक गारन्टी घोटाला में खुला खेल फिर शराब की दुकानों को एक माह बढ़ाना लेकिन दाम बढ़ाकर अप्रत्यक्ष रूप से धन कमाना, आखिर किसके इशारे पर, कौन है इसका मास्टर माइंन्ड। फिर भर्ती घोटाले की चिंगारी धधकने लगी। अवैध भर्तियों की सुगबुगाहट गलियारों में गूंज रही है। धान घोटाले की बीन बज रही है, कौन है इसका जबाबदेह।

क्या प्रदेश में जिस तरह से विकास का डंका बज रहा है, सही है। लगता तो नहीं, जिस हालत में प्रदेश चल रहा है, उसे चलना कम रेंगना कहना ज्यादा उचित होगा और डबल इंजन की सरकार से सुशोभित उत्तराखण्ड की गाड़ी पहाड़ चढ़ ही नहीं पा रही है। अलगरज प्रदेश में भू माफिया, खनन माफिया, शराब माफियाओं का राज है और जनता दरबार में कारोबारी आत्महत्या कर रहे हैं। वेतन देने के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है फिर भी विधायकों के वेतन बढ़ाने की चर्चायें हो रही हैं।

जबकि प्रदेश कर्ज के बोझ तले दबा जा रहा है। ऐसे नीति-नियंताओं पर धिक्कार है। इस छोटे से प्रदेश का दुर्भाग्य है कि ऐसे सियासी कलाकारों के हाथों में फंसकर समय से पहले ही वृद्ध नज़र आने लगा। कहते हैं कि जब निगेहबान ही आशिक हो जाये तो हर ऐतबार से खतरा ही खतरा है। अब पूर्ववर्ती सरकार की बात कर लें उनका मुखिया कहता है कि पहाड़ में भांग की खेती करो, अल्पसंख्यकों के नाम पर फर्जीवाड़ा, करोड़ों के घोटाले, विपक्ष का विधान सभा के अन्दर हंगामा, मात्र ड्रामा ही तो है। क्योंकि हम्माम में सब नंगे हैं।

कभी भी सरकार में हुये घोटाले की जांच कराकर जनता के सामने रखी गयी? दोनों ही पार्टियों ने एक-दूसरे की चोरी में एक सजग चौकीदार की भूमिका निभाई। मैं बहुत असमंजस में हूं, पहाड़ की आवाम सीधी है, निरीह है या फिर मूर्ख कहना मुश्किल है लेकिन ये सच है। प्रदेश की जैसी हालत है, ऐसा लगता है कि दोनों ही पार्टियां एक ही सिक्के के दो पहलू हैं या यूं कह लें कि कार्बन कॉपी या फिर नई बोतल में पुरानी शराब।

अभी भी वक्त है, सब को एकजुट होकर सरकार के मनमाने रवैये के खिलाफ लामबन्द होने की अपने अन्दर इतना माद्दा रखें कि जब जी चाहें उखाड़ फेंके, लेकिन इसके लिये टुकड़ों में शक्ति-प्रदर्शन करने से काम नहीं चलेगा। बल्कि एकजुट होकर सरकार की धार को कुन्द करना पड़ेगा। अन्त में इतना ही कहा जा सकता है कि ना तुम बेवफा हो ना हम बेवफा हैं, मगर क्या करें अपनी राहें जुदा हैं…… वरना हम्माम में सब नंगे हैं।