नक्सली नासूर

एक बार फिर माओवाद प्रभावित दंतेवाड़ा में नक्सलवादियों द्वारा किये गये भीषण विस्फोट में सुरक्षा बलों के सात जवान मारे गये। यह घटना तब हुई जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह को इलाके का दौरा करना था। मुख्यमंत्री रमन सिंह विकास यात्रा निकालने जा रहे थे। सुरक्षा बलों के जवान एक निर्माणाधीन सड़क की सुरक्षा चौकसी में?थे। पिछले कुछ महीनों में पुलिस माओवादियों पर भारी पड़ती नजर आ? रही थी। छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के सुरक्षा बलों की संयुक्त टीम द्वारा मार्च के पहले हफ्ते में दस नक्सलियों को मारने का दावा किया गया था, जिसको लेकर कई सवाल भी खड़े हुए थे।

दो माह पहले भी माओवादियों ने सुकमा में सुरक्षा बल के 9 जवानों की हत्या कर दी थी। यह सिलसिला सालों से जारी है मगर समस्या का कोई कारगर समाधान नहीं दिखता। नक्सल विरोधी अभियान से जुड़े पुलिस अधिकारी दावा कर रहे हैं कि यह नक्सलियों के खिलाफ चलायी जा रही मुहिम की सफलता से उपजी बौखलाहट है। इससे पहले नोटबंदी के दौरान भी दावा किया गया था कि इस मुहिम से नक्सलवादियों की कमर टूट गई है। मगर नक्सलवादी फिर उसी ताकत से हमले कर रहे हैं, आधुनिक हथियारों का प्रयोग कर रहे हैं और सुरक्षा बलों के जवानों की हत्या कर हथियार लूट रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नक्सल विरोधी मुहिम सिरे क्यों नहीं चढ़ रही है? कब तक जवानों का रक्त यूं ही बहता रहेगा? क्यों उन्हें बारूदी सुरंग खोजने की आधुनिक तकनीक व सुरक्षा के संसाधन ?उपलब्ध नहीं कराये जा रहे हैं? क्या इस समस्या के राजनीतिक समाधान की गंभीर कोशिश नहीं की जानी चाहिए? क्यों स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों की खुफिया एजेंसियां ऐसे हमलों को रोक पाने में विफल रहती हैं? क्यों स्थानीय लोगों का विश्वास हासिल नहीं हो पा रहा है कि नक्सलियों की गतिविधियों की पुख्ता जानकारी मिल पाए।

दरअसल, नक्सलवादियों की लड़ाई परंपरागत जंगल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर हक की रही है। औद्योगिक घरानों ने जिस निर्ममता से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया, उससे भी क्षेत्र में आक्रोश पनपा। हमें विकास की विसंगतियों पर भी ध्यान देना चाहिए। शासकीय व प्रशासनिक संवेदनहीनता से इतर आदिवासियों की वाजिब मांगों को सुना जाना चाहिए। यूं ही कोई मरने-मारने पर ?उतारू नहीं होता। नक्सलवादियों को भी समझाया जाना चाहिए कि विकास के जरिये ही वे देश की मुख्यधारा से जुड़ सकते हैं। उन्हें संविधान व कानून के दायरे में बातचीत के लिये आगे आना चाहिए। गुरिल्ला युद्ध से किसी का भला नहीं हो सकता। निश्चित रूप से इस खूनी संघर्ष की कीमत बेकसूर लोगों को चुकानी पड़ रही है।