झाँसी कवि सम्मेलन/मुशायरे

poetry3⇐ बेहतरीन शायर सत्यचंदन जी

कवि-सम्मेलन के संयोजक दैनिक जनसेवा मेल के प्रधान संपादक श्री सुधीर सिंह गौर, श्री मती सुधीर सिंह गौर, आकाशवाणी दिल्ली के भूतपूर्व उप-महानिदेशक और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि/शायर आदरणीय लक्ष्मी शंकर वाजपेई जी, अहसास के संरक्षक श्री मनोज मित्तल ‘कैफ़’, अहसास के अध्यक्ष श्री सत्य चंदन और अहसास की संस्थापिका श्री मती निधि सिन्हा ‘निदा’ ने दीप प्रज्ज्वलित कर कवि-सम्मेलन का विधिवत शुभारंभ किया। हितेश शर्मा जी ने सरस्वती वंदना से माँ शारदे का आशीर्वाद लिया।

श्री मनोज मित्तल कैफ़ की अध्‍यक्षता में कानपुर की कवयित्री सुश्री शीतल वाजपेई की इन पंक्‍तियों को श्रोताओं की खूब सराहना मिली –

समय की उँगली थाम के भी बिसराया वो बचपन है
देख जिसे डर जाये मन वो अंतस का दर्पण है
फिर जीवन की चौपड़ को पीर छलेगी, तो कैसे
आस की कच्ची डोरी से, प्रीत बंधेगी तो कैसे

अगले शायर थे दिल्ली से आसिफ़ अमान सैफ़ी जिनकी शानदार गज़ल को ख़ूब दाद मिली –

poetry4⇐ सुशीला शिवराण

दैनिक जनसेवा मेल, झाँसी और ‘अहसास’ अखिल भारतीय साहित्य संस्था के तत्वाधान में ३ जुलाई को झाँसी में अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन और मुशायरे का आयोजन हुआ जिसमें राष्‍ट्रीय स्तर पर ही नहीं अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्‍त कवि और शायरों ने शिरकत की। इस आयोजन का मुख्‍य लक्ष्य मंचों पर विशुद्ध कविता और शायरी को पुनः स्थापित करना है । ’अहसास’ से जुड़े रचनाकार कविता और शायरी को समर्पित हैं । संस्था का प्रमुख उद्देश्य है मंचों पर कविता के नाम पर चुटकुले परोसने की परिपाटी को बदल कर कविता को उसकी गरिमा के साथ प्रस्तुत करना । कवि-सम्मेलनों में श्रोताओं के दिल कॉमेडी से नहीं कविताओं से जीते जाएँ यही साहित्य के प्रति सच्‍चा समर्पण होगा, यही सही मायने में कवि-सम्मेलनों/मुशायरों की सार्थकता और सफलता भी होगी ।

अहसास ने अपने कवि-सम्मेलनों/मुशायरों के माध्यम से यह सिद्‍ध कर दिया है कि श्रोताओं का दिल कविताओं और शायरी से बखूबी जीता जा सकता है । झाँसी में ३ जुलाई की रात इसका प्रमाण है । निरंतर ३ घंटों तक श्रोता कविता की भिन्न विधाओं और बेहतरीन शायरी का लुत्फ़ उठाते रहे ।

poetry2⇐ आदरणीय़ लक्ष्मी शंकर वाजपेई जी काव्य-पाठ करते हुए

है फ़लक चाँद तारे होने से
और दुनिया हमारे होने से

कुछ नहीं सूझता तुम्हारे सिवा
आजिज़ आए तुम्हारे होने से

शायरी के बाद मधुर गीत लेकर आईं गुड़गाँव से सुश्री शोभना श्याम –

ख्वाब नहीं तो नींद दे नींद नहीं तो ख्वाब दे
मेरे जीवन को भी मौला, कभी ज़रा सी आब दे

गीत की मिठास को बरकरार रखते हुए लखनऊ से आए कवि श्री हितेश शर्मा ने यह गीत सुनाकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया –

poetry1⇐ दाएँ से ’अहसास’ के अध्‍यक्ष सत्यचंदन जी, आदरणीय लक्ष्मी शंकर वाजपेई जी, संस्थापिका निधि सिन्हा ’निदा’ जी आयोजक श्री मान एवं श्री मती सुधीर सिंह गौर को स्मृति चिह्न भेंट करते हुए

पुष्प प्रेम से सूना जीवन फिर महकायेंगे
तुम आओगे शब्द गीत बनकर आ जायेंगे

सूरज भोर नई लेकर उतरेगा मन आँगन
और रश्मियाँ खनकायेंगी हाथों के कंगन

अगली शायरा थीं काल्पी से अहसास की संस्थापिका सुश्री निधि सिन्हा निदा जिनकी रूबाई और शेरों को भी ख़ूब दाद मिली –

 चंद शेर ⇓

रहनुमा सोता रहा और हादसे होते रहे
नाम पर कुर्बानियों के बेज़ुबां मरते रहे

कौन जानेगा चमन में फूल होते थे कभी
रोज़ गरकलियाँ मसल कर खार तुम बोते रहे

अगले शायर थे झाँसी से सत्य प्रकाश ताम्रकर ’सत्य’ साहब जिनकी शायरी ने ख़ूब रंग जमाया –

अपनी वाणी में यूँ न ज़हर घोलिये
बोलिए जब भी यारो मधुर बोलिए
वो स्वयं स्वर्ग से ‘सत्य’ आ जायेगा
द्वार अपने हृदय के मगर खोलिए

शायरी की दुनिया में कानपुर की चाँदनी पांडे जी ने कम समय में ख़ूब नाम कमाया है। श्रोताओं ने इनकी शायरी का ख़ूब लुत्फ़ उठाया –

तुम जो होते तो बात कुछ होती
अबके बारिश तो सिर्फ पानी है

इक तरफ उसकी बोलती आँखें
इक तरफ मेरी बेज़बानी है।

झाँसी से ही राष्ट्रीय स्तर के कवि श्री अर्जुन सिंह ’चाँद’ ने जब अपनी बुलंद आवाज़ में संस्कारों की बात कही तो सभागार तालियों से गूँज उठा – (इनकी गज़ल के चंद शेर)

यूं न तहज़ीब मर रही होती
पैरहन में जो सादगी होती

चाँद दिल का हिसाब कर देता
चाँदनी साथ गर रही होती

जयपुर से आए बेहतरीन शायर बकुल देव ने अपनी नायाब शायरी से महफ़िल को चार चाँद लगाए –

तिरा लहज़ा वही तलवार जैसा था,
मिरी गर्दन में ख़म हर बार जैसा था.

हँसी भी इश्तिहारों सी चमकती थी,
वो चेहरा तो किसी अखबार जैसा था.

नोयडा से आए मशहूर शायर ओम प्रकाश यति जी ने अपने अश्‍आर से मुशायरे को ख़ूब रोशन किया

तुम्हें फ़ुरसत नहीं तो जाओ बेटा आज ही जाओ,
मगर कुछ रोज़ बच्चों को हमारे साथ रहने दो।

नाती-पोते वाले होकर अब भी गाँव में तन्हा हैं,
वह परिवार कहाँ है जिसपर मरते आए बाबूजी।

गुड़गाँव की सुश्री सुशीला शिवराण ने मुशायरे को दोहों के रंग से अलग ही छटा दी । इनके दोहों को विशेष रूप से माँ पर रचे दोहों को श्रोताओं से बहुत सराहना मिली –

हँसुली बोली हार से, कलयुग है घनघोर ।
माँ की साँसे गिन रहा, बँटवारे का शोर ।।

आले-खूँटी-खिड़कियाँ, चक्‍की-घड़े-किवाड़।
माँ की साँसें जब थमीं, रोये बुक्‍का फाड़ ॥

जयपुर से आए आला शायर सत्य चंदन जी के अशआर और तरन्नुम पर श्रोताओं का दिल बाग़-बाग़ हो गया । कई शेर फिर से पढ़ने की फ़रमाइश हुई –

मिरा वजूद है आंसू सा तू समंदर है
पर अहमियत तो मिरी देख तुझसे बढ़कर है

मैं शेरों में मुहब्बत के हवाले छोड़ जाऊंगा
तुम्हारी मस्जिदें अपने शिवाले छोड़ जाऊंगा

अँधेरे नफरतों के जी न पाएंगे कभी सुख से
मैं बुझ कर भी यहाँ इतने उजाले छोड़ जाऊंगा

लंदन में कई कवि-सम्मेलनों की शान बढ़ा चुकीं सुश्री ममता किरण जी ने जब तरन्नुम में गज़ल पढ़ी तो हर दिल दाद दिए जा रहा था । उनकी गज़ल के शेर –

है दूर तलक यूं तो अंधेरा मेरे आगे
है मुझको यकीं होगा उजाला मेरे आगे

जब-जब भी सर-ए-अर्श दिखा कोई सितारा
उभरा है कोई नक्श पिता का मेरे आगे

देश-विदेश में प्रसिद्‍ध, कविता और शायरी को उसकी गरिमा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध एक श्रेष्ठ कवि और आला शायर श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेई जी जब मंच पर आए तो आलम ही कुछ और था। सुनने वाले उनके हर शेर पर दिल खोल कर दाद दे रहे थे । उनको माइक से हटने ही नहीं दिया गया । अपने चाहने वालों का मान रखते हुए उन्होंने कुछ मुक्तक और पढ़े । गज़ब की शायरी गज़ब तरन्नुम । हाथ कंगन को आरसी क्या –

दर्द खुद झेल के खुशियों की फ़सल देते हैं..
जिनमें खतरे हों उन्हीं राहों पे चल देते हैं..
जिनकी सोचों मे है औरों की भलाई हर पल..
ऐसे कुछ लोग ही, दुनिया को बदल देते हैं

जनाब मनोज मित्तल ’कैफ़’ की सदारत में मुशायरा अपनी बुलंदी पर था । शायरी से प्यार करने वाले झाँसी निवासियों को कैफ़ साहब ने नायाब शायरी की सौगात दी –

नींद के घर में है अब सिर्फ़ घना सन्नाटा
ख़्वाब आते ही नहीं उनको बुलाऊं कैसे

वो अना ले के बुलाता है ख़रीदार भी है
पांव उठता ही नहीं हो तो मैं जाऊँ कैसे

गहराती रात के साथ शायरी का रंग भी गहराता गया । हर सुनने वाले के चेहरे पर दमक और ख़ुशी देखकर आयोजकों और कवियों को बेहद ख़ुशी और सुकून मिला । ३ घंटों तक कविताओं की रिमझिम में भीगने, भिगोने के बाद एक कामयाब कवि-सम्मेलन/मुशायरे की मधुर स्मृतियों के साथ कवियों/शायरों ने विदा ली कुछ और बेहतर रचने का संकल्प मन में लिए, साहित्य को और समृद्ध करने का प्रण मन में लिए अपने होटल की ओर प्रस्थान किया ।