सोनिया गांधी,एमडी,13 साल तक नहीं बन सकी कोई कार

आर.बी.एल.निगम

RBL Nigamकांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी एक ऐसी कार कंपनी की एमडी थीं, जिसकी स्थापना आज से लगभग 45 साल पहले हुई थी। हालांकि, यह कंपनी 13 साल तक कोई कार नहीं बना सकी। तमाम विवादों से गुजरने के बाद केंद्र सरकार को 1980 में इसका नेशनलाइजेशन करना पड़ा।

16 नवंबर 1970 को एक कंपनी मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (एमटीएसपीएल) की शुरुआत हुई थी। इस कंपनी का उद्देश्य पूरी तरह से एक देसी कार बनाने के लिए डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और असेंबलिंग से संबंधित टेक्निकल सर्विस उपलब्ध कराना था। कार बनाने के लिए जून, 1971 में कंपनी एक्ट के अंतर्गत एक कंपनी ‘मारुति लिमिटेड’का गठन किया गया और संजय गांधी इसके पहले मैनेजिंग डायरेक्टर बन गए। सोनिया गांधी और एमटीएसपीएल के बीच 1973 में हुए एक फॉर्मल एग्रीमेंट के तहत उन्हें संजय गांधी के साथ मारुति लिमिटेड का एमडी बना दिया गया।

soniya001254इस एग्रीमेंट के तहत सोनिया गांधी और संजय गांधी के लिए पांच साल तक 2 हजार रुपए प्रति महीने सैलरी तय की गई थी। 1975 में एमटीएसपीएल और मारुति लिमिटेड की सहायक कंपनी मारुति हैवी प्रा. लि. के साथ एक और एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत एमटीएसपीएल को रोड रोलर बनाने के लिए टेक्नोलॉजी से जुड़ी सर्विसेज देनी थीं। इस कार के बारे में माना जा रहा था कि यह पूरी तरह देसी कार होगी। होगी। हालांकि मारुति का प्रोटोटाइप (नमूना) 30 हजार किलोमीटर तक चलाने के लिए होने वाला वीआरडीई टेस्ट कभी पास ही नहीं कर पाया। इस कार में जर्मनी के टेक्नीशियन द्वारा जर्मन इंजन फिट किया गया था। इस टेक्नीशियन को कंसल्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था। इस प्रोटोटाइप में वाइब्रेशन से लेकर ब्रेक फेल होने और स्टीयरिंग से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं।…

आखिरकार, तत्‍कालीन हैवी इंडस्ट्रीज मिनिस्टर टीए पई ने आदेश दिया कि मारुति को मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस देने के लिए वीआरडीई टेस्ट अनिवार्य नहीं है। इस तरह 22 जुलाई 1974 को मारुति को 50 हजार कारों के प्रोडक्शन के लिए इंडस्ट्रियल लाइसेंस भी मिल गया। केंद्र सरकार ने संजय के कार के सपने को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश की। कंपनी के पास पर्याप्त टेक्नोलॉजी और कैपिटल नहीं थी, जो इतने बड़े एंटरप्राइज के लिए जरूरी होते हैं। इसके बावजूद 30 सितंबर 1970 को संजय गांधी को सालाना 50 हजार कारों के प्रोडक्शन के लिए लेटर ऑफ इंटेंट (एलओआई) जारी कर दिया गया। स्थापना के बाद से कंपनी एक भी कार नहीं बना सकी थी। हालांकि 1975 से 77 के बीच इमरजेंसी लगने के दौरान संजय पॉलिटिक्स में खासे सक्रिय हो गए और आम आदमी की कार का मुद्दा खासा पीछे छूट गया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है )