क्या ममता का वर्चस्व समाप्त होगा ?

आर.बी.एल.निगम

RBL Nigamपश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस-सीपीएम का गठजोड़ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अकेली कथित हुंकार अब तक बहुत असरदार नहीं हो पाई है. मतदान में गिनती के दिन रह गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल में करीब दस बड़ी जनसभाओं को संबोधित करने वाले हैं. इसके बाद भी स्थिति में बहुत ज्यादा बदलाव की उम्मीद नहीं है. क्योंकि लोग अचानक बढ़ी महंगाई, केंद्र सरकार के कथित अच्छे दिन के दिखाए सपने के टूटने से परेशान और गुस्से में हैं. ऊपर से रेल के टिकट रद्द होने पर बढ़े अप्रत्याशित शुल्क ने इस गुस्से को और बढ़ा दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पश्चिम बंगाल में बहुत प्रभावशाली व्यक्ति की नहीं है, भले ही उनकी सभा में भीड़ हो. रेल बजट में पश्चिम बंगाल को कोई अहमियत नहीं मिली है, जिससे लोग आहत हैं. ले-दे कर केंद्र सरकार की ईस्ट-वेस्ट मेट्रो परियोजना और दक्षिणेश्वर मेट्रो परियोजना है, जिस पर केंद्र सरकार इतरा सकती है. लेकिन, इस परियोजना को ममता बनर्जी ने ही तब शुरू कराया था, जब वे रेल मंत्री थीं. इस तुलना में कांग्रेस-सीपीएम गठजोड़ मजबूत है. उसे 50 से भी अधिक सीटें मिलने की उम्मीद है.

भारतीय जनता पार्टी की स्थिति

mamta-banrjeeविधानसभा में भाजपा के सिर्फ एक विधायक हैं, शमिक भट्टाचार्य, जो बशीरहाट दक्षिण सीट से उपचुनाव में जीत कर आए हैं. 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो आसनसोल सीट से भाजपा के बाबुल सुप्रियो जीत कर संसद में गए. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की दोला सेन को हरा कर यह सीट पाई. लेकिन धीरे-धीरे केंद्र में मोदी सरकार की नीतियों के कारण पश्चिम बंगाल में भाजपा की लोकप्रियता घटी. लेकिन जैसा कि आम चुनावों में होता है, भारतीय जनता पार्टी काफी उत्साहित है. उधर फेसबुक पर ममता बनर्जी का कार्टून बनाने के कारण रात भर जेल की हवा खा चुके जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में बेहला (पूर्व) से चुनाव लड़ने की घोषणा की है. वे वहां तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार और मेयर शोभनदेव चटर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे.

इस बीच मतदान के तीन हफ्ते पहले एक चौंकाने वाला स्टिंग वीडियो सामने आ गया. एक प्राइवेट न्यूज चैनल ने तृणमूल कांग्रेस के 11 प्रमुख नेताओं को एक काल्पनिक कंपनी के एजेंट के हाथों रुपए लेते हुए दिखाया है. इस स्टिंग पर विभिन्न पार्टियों के नेताओं ने टिप्पणियां की है. तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन ने कहा है कि हमने इस कथित स्टिंग वीडियों को देखा है. इसमें कुछ नहीं है. सीपीएम के राज्य सचिव सूर्यकांत मिश्र ने कहा है कि राज्य में निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव आयोग को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए या तब तक चुनाव रोक देना चाहिए, जब तक कि इस फंडाफोड़ के मद्देनजर कोई कदम नहीं उठाया जाता. अगर राष्ट्रपति शासन लागू करने की आवश्यकता है, तो वह भी होना चाहिए. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने कहा है कि हम चुनाव आयोग से अपील करते हैं कि जो लोग वीडियो में रुपया ले रहे हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाए. भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थ नाथ सिंह ने कहा है कि स्टिंग आपरेशन से यह साबित हो गया कि तृणमूल कांग्रेस के सारे नेता भ्रष्ट हैं. तृणमूल कांग्रेस के नेता मुकुल राय ने कहा कि यह ऐसा वीडियो है जिसके साथ छेड़छाड़ की गई है. हम इस चैनल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे.

पांच साल पहले ममता बनर्जी ने 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को उखाड़ फेंका था और पूरे बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई थी. पांच साल पहले तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने सिंगुर में किसानों की जमीन, टाटा की नैनो कार फैक्ट्री बनाने के लिए जबरन ले ली थी. किसान जमीन देने के अनिच्छुक थे. वे अपनी जमीन वापस लेना चाहते थे. ममता बनर्जी ने इसे मुद्दा बनाया. उनका आंदोलन काफी व्यापक होता गया. आखिरकार, टाटा को अपनी कार फैक्ट्री सिंगुर से हटा कर गुजरात के साणंद ले जानी पड़ी. यह ममता बनर्जी की जीत और उस समय सत्तारूढ़ वाम मोर्चा की हार थी. मतदाताओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा. ममता बनर्जी की छवि अचानक वाम मोर्चा सरकार की उस छवि से बड़ी हो गई, जो उसने पिछले 34 सालों में बनाई थी. सत्ता में आने के बाद किसानों को जमीन वापस करने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कानून बनाया. इस कानून का नाम था, द सिंगुर लैंड रिहैबिलिटेशन ऐंड डेवलपमेंट एक्ट 2011. लेकिन इसे अदालत में चुनौती दे दी गई. नतीजा यह हुआ कि न टाटा की फैक्ट्री बनी, न किसानों को जमीन वापस मिली. निश्चित ही सिंगुर में तृणमूल कांंग्रेस की लड़ाई आसान नहीं होगी. पिछले ही दिनों वाममोर्चा सरकार में भूमि सुधार मंत्री रहे अब्दुर रज्जाक मोल्ला, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. चुनाव के पहले इसे ममता बनर्जी की भारी कामयाबी कही जा रही है. मोल्ला एक मुखर कम्युनिस्ट नेता रहे हैं और मंत्री रहते हुए उन्होंने कई बार तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की. उनके तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने से राजनीतिक समीकरण बदले हैं.

पश्चिम बंगाल में छह चरणों में चुनाव होने हैं. पहला चरण नक्सल प्रभावित इलाकों में होगा. वाममोर्चा, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने कुछ ही नए चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बहुत ही सोची-समझी रणनीति के साथ इस चुनाव में भी अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं को मजबूती के साथ पकड़ा है. पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक समूची आबादी के 27 प्रतिशत है. मालदा और मुर्शिदाबाद को छोड़ कर सभी जिलों में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं. सन 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में 24.7 मिलियन मुसलमान हैं. सन 2011 के चुनाव में वाममोर्चे को 35 से 40 प्रतिशत वोट मिले थे. लेकिन, तब वाममोर्चा सत्ता में था. 2014 के लोकसभा चुनावों में वाममोर्चा के वोट घट कर 23 प्रतिशत तक आ गए थे. पिछले विधानसभा चुनाव में 294 में से तृणमूल कांग्रेस को 184, इंडियन नेशनल कांग्रेस को 42, वाममोर्चा के घटकों जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को 40, आल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक को 11, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) को 7, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को दो, गोरखा जन मुक्ति मोर्चा को 3, समाजवादी पार्टी को 1, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (कम्युनिस्ट) को 1, डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी (प्रबोध चंद्र) को 1 और स्वतंत्र उम्मीदवारों को दो सीटें मिली थीं.

चौखट पर चुनाव और दलदल में दीदी का दल

चौखट पर चुनाव न होते तो शायद और बात होती. अब चूंकि महासमर का बिगुल बज चुका है. सभी पार्टियों ने ताल ठोंकना शुरू कर दिया है, तो जाहिर तौर पर सत्तारूढ़ होने के कारण ममता बनर्जी को अपने दल के हर अच्छे-बुरे फैसले में साथ ही रहना है. यह टिप्पणी स्टिंग ऑपरेशन में तृणमूल के 12 हेवीवेट नेताओं की पोल खुलने के बाद ममता बनर्जी को लेकर है.

अब, यह भी सवाल उठ सकता है कि कोई और बात होती तो क्या होता? तो, इसके लिए 16 साल पहले के राजनीतिक इतिहास को खंगालना होगा. 13 मार्च 2001 को तहलका ने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा था. नाम तत्कालीन सरकार के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाण्डीज का भी आया था. ममता बनर्जी तब एनडीए सरकार में रेल मंत्री भी थीं. तहलका का ऑपरेशन सामने आने के बाद संसद में हंगामा मचा और तब दीदी ने दोनों नेताओं के इस्तीफे की मांग की थी. इस्तीफा न होने की सूरत में दीदी ने एनडीए छोड़ देने की धमकी भी दी थी.

अब उपरोक्त संदर्भ को आज की स्थिति के साथ जोड़ कर देखना चाहिए. दीदी का क्या रूख है? सांसद प्रो. सौगत राय, सुल्तान अहमद और मुकुल राय (तीनों पिछली यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं) के साथ राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री सुब्रत मुखर्जी, फिरहाद हकीम, सांसद शुभेन्दु अधिकारी, सांसद डॉ. काकली घोष दस्तीदार, मेयर शोभन चटर्जी, पूर्व परिवहन मंत्री, सारदा कांड में गिरफ्तार मदन मित्र सरीखे लोगों के साथ-साथ एक चहेते पुलिस अधीक्षक मिर्जा द्वारा 5-5 लाख रुपये का रिश्वत लेने का खुलासा एक वेबसाइट नारद डॉट कॉम ने किया है. इस खुलासे के बाद दीदी ने इन सब पर कार्रवाई करने की बजाय बचाव किया है. संसद में सौगत राय और सुल्तान अहमद ने तो सीना तानकर इस ऑपरेशन को विपक्षी दलों का षड्‌यंत्र करार दिया. दीदी का यह दोयम स्वरूप स्वाभाविक तौर पर उनकी सियासी मजबूरी है. हालांकि दिनेश त्रिवेदी जैसे साफ-सुथरी छवि वाले सांसदों ने मशविरा दिया कि इन नेताओं का बचाव करने की बजाय दीदी को जांच कमेटी बैठानी चाहिए. तृणमूल का उजला चेहरा माने जाने वाले डेरेक ओ ब्रेन ने जिस दंभ के साथ इस कांड पर बयान दिया, वह आने वाले दिनों में पार्टी की छवि को और खराब करेगा.

आनन-फानन में बचावी बयान देकर दीदी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली. अब चुनाव सामने हैं. वाम मोर्चा और कांग्रेस ने पहले ही हाथ मिला लिया है और भाजपा भी दीदी से दूरी बनाए हुए है. ऐसे में तमाम विपक्षी पार्टियां तृणमूल पर हर जनसभा में छींटाकशी करेंगी. वाम मोर्चा के 34 साल के शासन को कोसने वाली ममता से वामपंथी सीना तान कर कहेंगे कि उनके लंबे शासन काल में किसी मंत्री पर इस प्रकार खुलेआम रिश्वत लेने का आरोप नहीं लगा. स्वाभाविक तौर पर लोकसभा की एथिक्स कमेटी अथवा अन्य जांच एजेंसियां सीडी की फॉरेंसिक जांच करेंगी ही. पर नारद डॉट कॉम के मैथ्यु सैमुअल की खोजी तबीयत से वास्ता रखने वाले जानते हैं कि उन्होंने कच्ची गोटियां नहीं चली हैं. बेशक उनसे भी लाखों रुपए के जुगाड़ पर पूछा जाएगा, लेकिन इससे दीदी के पैसे लेने वाले नेताओं को आराम नहीं मिलने वाला. देखना है, चंद दिनों में शुरू होने वाले मतदान के दौरान बंगाल के भद्रलोक क्या फैसला लेते हैं. पर इसमें शक नहीं कि विकास और विनाश के मुद्दे को पीछे छोड़ कर इस स्टिंग ऑपरेशन ने प्रचार के केंद्र में अपना स्थान बना लिया है. दीदी का दल दलदल में फंस गया है.