व्यंग्य : मैं अनाथ हो गया

सलीम रज़ा

आप सुनकर हैरान ज़रूर होंगे कि मैं अनाथ कब और कैसे हो गया? परेशान होने और व्यथित होने की कोई ज़रूरत नहीं है। कभी-कभी पात्रों के चयन में उन का भी ध्यान आ जाता है, जो मूक हैं, बधिर हैं, निर्जीव हैं, वो कुछ कहना तो चाहते हैं लेकिन वो क्या कह रहे हैं। ये उन लोगों का दायित्व बनता है, जो इन मूक बधिरों के केयर टेकर है। केयर टेकर का फर्ज है कि उनके नित्य कार्यों को समय से करें। इससे उनकी सुन्दरता तो बनी रहेगी साथ ही उनके अन्दर ये भाव नहीं पैदा होंगे कि इतने बड़े परिवार का सदस्य होने के वावजूद भी वो अनाथ की तरह है। ऐसा न होने की वजह से उनके अन्दर एक हीन भावना घर कर जाती है कि मेरे सामने से गुजरने वाले इतने स्वार्थी है कि उनको उसकी दुर्दशा नहीं दिख रही।

अपने गुरूर में वो ये भी भूल जाते हैं कि उनका अस्तित्व मेरे उपर निर्भर है। अगर मेरे अस्तित्व पर खतरा मंडराया तो उनका वजूद स्वतः समाप्त हो जायेगा। अगर कोई उसकी बदहाली से दुःखी होकर आगे बढ़ता भी है तो वो एक नहीं, दो नहीं बल्कि असंख्य लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाता है। मैं यह व्यथा उसकी सुना रहा हूं, जो अपना परचम विश्व मानचित्र पर फहराता है। जी हां…! मैं उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून की बात कर रहा हूं।

देवभूमि के उस मंडप की जिसको सजाने संवारने की जिम्मेदारी के लिए एक बहुत बड़ा अमला लगा हुआ है। इस कड़ी में मुझे याद आया कि कई शहर ऐसे भी है, जहां सोता हुआ व्यक्ति प्रवेश मात्र से बता देता था कि अमुक शहर है। आज वही हाल देवभूमि के शहर देहरादून का है। जहां पर शिक्षित दून सुन्दर-दून स्वच्छ दून और हरा दून जैसे स्लोगन अपनी पहचान बनाने के लिए बना दिये गये हों, लेकिन उसके अनुरूप कुछ भी देखने को ना मिले तो इन स्लोगनों को लिखने का क्या औचित्य।

दून शिक्षित ज़रूर है लेकिन नशे के प्रभाव ने इस को ग्रहण लगा दिया। सुन्दर दून तो आप शहर के अन्दर प्रवेश करते ही देख लेंगे। शहर के हाई-वे से लेकर मेन सड़कों को मिलाकर गली-मुहल्ले की सड़कों को देखे तो कोई सड़क ऐसी नहीं मिलेगी, जिसमें छोटे से लेकर बड़े गड्ढे ना हों। स्वच्छ दून एक ऐसा स्लोगन है, जो लोगों को अपनी ओर अट्रेक्ट करता है। लेकिन पूरे शहर में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां पर गन्दगी का साम्राज्य ना हो। यानि दुख की बात है कि स्वच्छ सर्वेक्षण अभियान की किस तरह से धज्जियां उड़ती हैं, आप स्वयं देख सकते हैं। सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है, नालियों का पानी सड़कों पर है। सड़कों पर सफाई ना के बराबर है।

जिस रास्ते से गुजर जायें, दुर्गन्ध से आप अपनी नाक पर रूमाल रखना नहीं भूलेंगे। हरा दून तो दून में हरियाली भी विलुप्त हाती जा रही है। जंगल अपने बृहद क्षेत्रफल से सिकुड़ते जा रहे हैं। उनका दोहन निरंतर जारी है। कर्मचारियों को शहर की फिक्र कम अपने हाकिमों की परवाह ज्यादा है। मेरा कहने का तात्पर्य ये है कि जिस प्रदेश की राजधानी सजी संवरी न हो, वहां पर बैठने वालों की निर्लज्ज नज़रों को देखकर भी लाज नहीं आती।

जिस जगह पर देश दुनिया से लाखों की तादाद में सैलानी आते हों, उस शहर की आभा पर गन्दगी का ग्रहण लगाने में ये पूरा अमला दोषी है। यही व्यथा है इस अस्थाई राजधानी देहरादून की जिसमें शहर प्रवेश के साथ ही गन्दगी और दुर्घटनाओं को न्योता देती हुई सड़के हों। राजधानी आन्दोलनों की आग में झुलस रही हों और ज्वलंत मुद्दे हवा में तैर रहे हों। त्रासदी का दंश आज भी लोग झेल रहे हों।

जहां अपने हक के लिये अपने ही घर के बच्चे अपने लोगों के खिलाफ विद्रोह पर उतरने के लिये मजबूर हों। उस प्रदेश का मुखिया दूसरे प्रदेश के शहर को अपने घर में मिलाने की पैरवी कर रहा हो। डबल इंजन की सरकार का दंभ भरने वाली सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार हो। ऐसे में शहर की बदहाली को देखे कौन। मैं तो यही कहूंगा जिसके इतने सारे केयर टेकर हों वो अनाथ हो जाये जैसे उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून तो शायद कोई अतिश्योक्ति ना होगी।