मत बरसो मेघा रे…

ललित शौर्य

बरसो रे मेघा -मेघा , बरसो… ये गीत सुनते ही अब चिढ़ सी होने लगी है। दिमाग गुस्से से भरने लगा है। अरे बरसने को भी कहा था तो कोई इतना बरसात है भला। अब तो सूखना ही दुभर हो गया है। नाक, मुंह, आस्तीन सब गीले हुए पड़े हैं। कपडे, चमड़े, लत्ते , कागज ,घर द्वार सब भीग कर टपक रहे हैं। मेघा ऐसे बरस रहे हैं जैसे कश्मीर में पत्थरबाज बरसते हैं। संसद में विपक्षी सरकार पर बरसते हैं। पांच साल में एक बार अपने क्षेत्र में पहुँचने पर जनता नेता पर बरसती है। भारतीय फ़ौज की गोलियां जैसे आतंकियो पर बरस रही हैं। पाकिस्तान में नवाज शरीफ पर जैसे गालियां बरस रही है। ठीक वही अंदाज अपने यहाँ बादलों का है। बरस -बरस कर धूप को तरसा दिया है। सरकारें फटी रेनकोट बाँट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रही है। सारे गाँव- शहर पानी से लबालब हैं। पता नहीं चल पा रहा गाँव में पानी है या पानी में गाँव । ठीक उसी चिरपरिचित पुराने अंदाज में शहर में गड्ढे हैं या गड्ढे में शहर।इस मौषम में अगर कहीं पानी बचाओ वाली वाल पेंटिग पर नजर पड़ जाती है तो मन आग बबूला हो जाता है। पानी ने नाक में दम किया हुवा है। और ये पानी बचाओ की बात कर रहे हैं। अरे पहले जनता को तो बचाओ। तब कहीं जाकर ससुरा पानी बचेगा।

देश क्षीर सागर बना हुवा है। सरकारें भगवान् विष्णु की शयन मुद्रा में मुस्कुरा रही हैं। जल से कल है, वाले नारे को पढ़कर कोफ़्त हो रही है। जिस जल ने आज ही उजाड़ कर रख दिया हो, उससे कल की क्या गुंजाईश।चारों ओर इतना पानी हो चूका है कि मन भी भगवान् से विनती करने लगा है कि “अगले जनम मोहे मछली कीजो”। मछली बनकर आराम से तैरा तो जा सकता है। मछली नहीं तो मच्छर ही बना दो भगवान्। जिससे इस जल के जंजाल से मुक्ति मिल सके। जीवन को जंजाल कहने वाले दार्शनिक को मैं चुनौती देना चाहता हूँ। असल में जल ही जंजाल है।कभी आकार रहो जल में तब पता चलेगा आखिर वास्तव में जंजाल है कौन सी चीज। हम जंजाल को किस खेत की मूली कहने की अवस्था में भी नहीं हैं। क्योंकि सारे खेत जलमग्न हैं। मूलियाँ सारी सड़ चुकी हैं। जलमग्न का तात्पर्य जल से मगन बिलकुल ना समझें । इस जल ने नाक में दम किया है। मगन रहने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अब तो मन करता है उस गीतकार को ढूढ निकालू जिसने ये मेघा वाला गीत रचा। और इस गीत पर थिरकने वाली नायिका के पापा से बोलकर इसका नाचना बंद करवाऊ। यहाँ सारा देश पानी -पानी है और उसे नाचने की पड़ी है। खैर पानी-पानी तो सरकारों को होना चाहिए जो हरसाल जल त्रासदी को झेलकर भी बचाव के कोई समुचित उपाय नहीं खोज पाती। अब तो मन गुनगुना रहा है। मत बरसो रे मेघा-मेघा , मत बरसो..