…लो उतर गया खुमार!

महिला दिवस पर विशेष

सलीम रज़ा, उप-सम्पादक

महिला दिवस पर असंख्य कॉमप्लीमेंट्स मिलने से महिलायें गदगद तो हो गई होंगी। महिला दिवस के दिन सोशल मीडिया पर उन कठोर हृदय वाले लोगों को भी महिलाओं के प्रति श्रद्धात्मक लहजे में कॉमप्लीमेंट करते हुये देखा गया। सियासत दां भी पीछे क्यों रहते और वो भी दे धड़ाधड़ महिलाओं की मंच पर सम्मानित किये जाने की पिक अपलोड कर रहे थे तो कुछ छुटभैया नेता उनकी फोटो शेयर करने से नहीं अघा रहे थे। भले ही बाद में उन बड़े नेताओं में से किसी एक को महिला से अभद्र व्यवहार करते भी देखा गया। चलो महिलाओं का कम से कम भ्रम तो दूर हुआ कि कितना सम्मान उन्हें मिलता है, इन पुरूषों से।

खैर, मैं न तो महिलाओं की खिल्ली उड़ा रहा हूं और न ही उनके प्रति मेरा आदर भाव कम है। मैंने तो एक तस्वीर के दो पहलू दिखाने का दुःस्साहस किया है, जो एक कड़वा सच है। क्या मां, बहन और बेटी, जो एक स्त्री हैं और किसी दूसरे के साथ रिश्ते मे बंधने के बाद अपना असल रूप खो देती है। क्या वो सम्मानित नहीं रहती, वो सिर्फ उसी की ही मां-बहन है। क्या वो अपना आदर भाव खो देती है। मेरे मन में सवाल उठता है कि मेरी बहन अच्छी हैं, सुशील हैं, चरित्रवान हैं तो फिर दूसरों की क्यों नहीं?

दरअसल, हम अपने मन मस्तिष्क को मेक अप नहीं कर पाते। अपनी आंखों के इस्तेमाल में अपने ऊपर कन्ट्रोल नहीं कर पाते। लिहाजा हमारी आंखें दोषी नहीं हैं, बल्कि दोष हमारी सोच पर निर्भर करता है। पुरूष प्रधान देश भारत में महिलाओं ने पुरूषों के बराबर अपने आप को लाकर खड़ा कर दिया है। थल से लेकर नभ तक महिलाओं ने अपना दबदबा कायम किया है। आज हर क्षेत्र में महिलायें अपनी सेवायें दे रही हैं। पहले की अपेक्षा महिलायें ज्यादा स्वावलम्बी हैं। बावजूद इसके आज भी महिलाओं पर हो रहे अत्याचार सैक्सुअल डिमॉन्स्ट्रेशन, गैंग रेप, सैक्सुअल हैरिशमेंट और घरेलू हिंसा के मामले आये दिन अखबार की सुर्खियां बने रहते हैं।

सब कुछ बदल गया लेकिन हमारी सोच में अभी भी बदलाव नहीं आया। हमें अपनी मानसिकता बदलनी चाहिये। अक्सर देखा गया है कि प्राईवेट संस्थानों में महिला को प्रायोरिटी होती है। अक्सर आपने देखा भी होगा लेकिन इसके पीछे उन संस्थान मालिकों के मंतव्य को आप समझ पाने में नाकामयाब रहते है, लेकिन ऐसा कतई नहीं है। जब आप स्वयं किसी संस्थान में जाते हैं तो जब कोई महिला अटैन्डेन्ट आप से रू-ब-रू होती है, उस वक्त आप की आंखें उस महिला के जिस्म के प्रत्येक अंगों पर गतिमान रहती है। उस वक्त आपकी मानसिकता का परिचय साफ झलकता है। जब आप उस महिला से अनावश्यक सवाल करते हैं, जिसका जबाब उसके पास होता नहीं है। लेकिन ये बात लम्बी करने का एक सरल साधन और सॉफ्ट कार्नर बनाने का जरिया है।

मेरी बात…
स्वस्थ, शिक्षित और जागरूक समाज का निर्माण करने के लिए केवल पुरूषों का सम्मान होने से ही बात नहीं बनती, बल्कि महिलाओं को भी हमेशा सम्मान मिले। क्योंकि बिजली का बल्ब भी जलता है तो जरूरत फेस और न्यूटल की पड़ती है। यातायात भी दुरूस्त चाहें तो जरूरत बायीं और दायीं साईड की है। अगर ताली भी बजानी है तो भी दो हाथों की जरूरत है। अतः कुल मिलाकर यही सामने आता है कि स्वस्थ समाज का निर्माण पुरूष और महिलाओं दोनों का सम्मान का परिणाम है। अर्थात मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि यदि आप अपनी मां, बहन और बीबी का सम्मान चाहते हैं और यह चाहते हैं कि कोई उन्हें बुरी नजर से नहीं देखे तो शुरूआत स्वयं कीजिए और दूसरों की मां, बहन और बीबी को सम्मान दें। अपना नजरिए को बदलो, समाज बदल जाएगा।
राज शेखर भट्ट, सम्पादक

मानसिकता की ट्रेनिंग के लिये अलग से स्कूल नहीं खोले जाते बल्कि हम जैसी धारणा लेकर घर से निकलते हैं, वैसे ही परिणाम हमारे मस्तिष्क में एकत्र हो जाते हैं। सम्पूर्ण भारत में अभी भी महलाओं की हालत में ज्यादा बेहतर सुधार नहीं हुआ है। सिर्फ एक दिन महिलाओं के लिये रखकर ये दिखाने की कोशिश की जाती है कि महिलाओं के प्रति वे कितने कृतज्ञ है। जबकि इस सुनहरी चमक के पीछे एक दर्द, एक घुटी हुई चीख, एक कराहट है, जिसे सुन सब रहे हैं लेकिन इसके समाधान के लिये आगे आने से कतराते हैं।

दिवस कोई भी हो हम दुनिया को क्या दिखाना चाहते हैं कि हम आज भी आधे अधूरे हैं। यानि आर्यों के समय से लेकर आज तक हम महिलाओं के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाये। क्यों… एक युग बीत गया, इस सच्चाई को गले से नीचे उतारने में। जबकि ये तो उनका मूल मंत्र था। इसके पीछे एक झूठा अहंकार है, जो इस मंत्र की पाकीज़गी और महिलाओं के सम्मान की लालिमा को कालिख लगा रहा हैं।
सिर्फ साल में एक दिन ही क्यों महिला दिवस मनाने की जरूरत आन पड़ी। हर रोज़ क्यों नहीं महिला के प्रति हम सम्मान दिखाकर सच्ची भावना को सबके सामने लायें। हम इस सच्चाई को सबके सामने लाने में कतराते हैं। या यूं कह लें कि पुरूष प्रधान देश में हम महिलाओं के प्रति आदरभाव, लचीला रूख अपना रवैया बदलने में अपने आप को असहज महसूस कर रहे हैं। अगर हम इनमें से सिर्फ अहंकार को ही निकाल दें और अपनी मानसिकता को बदल दें तो सही मायनों में महिला दिवस मनाने का औचित्य नज़र आयेगा। लेकिन इसमें हमारे देश की सरकार के साथ हर नागरिक का दायित्व बनता है कि वो महिलाओं के प्रति अतिसंवेदनशील हो जायें।

महिलाओं को शिक्षित बनाया जाये, उन्हें हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका में रखा जाये तो सही मायनों में महिला सशक्तिकरण की बात की जा सकती है। उसके लिये समाज में हो रहे महिलाओं पर जुल्मा-ओ-सितम पर हर एक को आगे आना चाहिये। साथ ही साथ दोषी को सख्त से सख्त सजा का प्रावधान किया जाये, इसमें समाज के लोगों की भूमिका निश्चित हो। साथ ही महिलाओं को भी जागरूक होने की जरूरत है, बगैर उनके सहयोग के ये संम्भव भी नहीं है। ये सारी बाते जिस दिन अपना रूप दिखायेंगी, उसी दिन महिला दिवस मनाने का औचित्य अपने आप समझ में आ जायेगा।