कुमांऊ के पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र

भुवन बिष्ट, रानीखेत, उत्तराखण्ड

देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव ही प्राकृतिक सौन्दर्य , आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यटन स्थलों के साथ साथ अपनी लोकसंस्कृति, परंपराओं व सभ्यता के लिए विश्वविख्यात है | लोकसंस्कृति को जीवंत करने व इसे मनोहारी कर्णप्रिय बनाने में कुमांऊ के लोकवाद्य यंत्रों का विशेष महत्व है | इन लोक वाद्य यंत्रों में आज अनेक पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र आधुनिकता की चकाचौध में विलुप्त हो चुके हैं और कुछ पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र अपने अस्त्तिव को बचाने के लिए संघर्षरत हैं |

देवभूमि उत्तराखण्ड के कुमांऊ में इन लोक वाद्य यंत्रों को मंदिरों में होने वाले आयोजनों, वैवाहिक समारोंहों , उत्सवों, मेलों, छोलिया नृत्य कोई भी मांगलिक शुभ कार्यो में इन्हें बजाया जाता है | कुमांऊ के पारंपरिक लोकवाद्य यंत्रों में ढोल, दमांऊ, नगाड़े, मशकबीन, बड़ा ढोल, रणसिंग आदि का प्रमुख स्थान है ये लोक वाद्य यंत्र कर्णप्रिय होने के साथ साथ मांगलिक कार्यो संस्कृति पर चार चांद लगा देते हैं |
ढोल – ढोल देवभूमि के कुमांऊ क्षेत्र का पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र है | ढोल का उपयोग विभिन्न मांगलिक अवसरो, जागर, छोलिया नृत्य व लोकदेवता के मंदिरों में भी विशेष अवसरों आयोजनों में किया जाता है | ढोल छोलिया नृत्य का भी एक प्रमुख वाद्य यंत्र है | ढोल सर्वप्रथम युद्ध में वीरों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रयोग किया था। ढोल – दमाऊँ साथ-साथ बजाए जाते हैं। यह देवभूमि उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय वाद्य-यंत्रों में से एक है। इसको आज भी मांगलिक कार्यों, समूहिक नृत्यों, धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा यात्राओं, लोक उत्सवों और विवाह समारोह में बजाया जाता है, ढोल को विजेसार के नाम से भी कुमांऊ में जाना जाता है | ढोल को बनाते समय विजयसार की पुरानी मजबूत लकड़ी के लगभग ढाई फीट लम्बे और लगभग डेढ़ दो फीट व्यास के गिल्टे को अंदर से खोखला कर बनाया जाता है |

दमाऊं (दमुवा)

उत्तराखण्ड के पारंपरिक लोकवाद्य यंत्रों में दमाऊं, दमुवा का अपना एक विशेष महत्व है | दमांऊ (दमुवा) पहाड़ का सबसे लोकप्रिय वाद्य यंत्र है | ढोल और दमांऊ का अनूठा संबध रहा है, ये एक दूसरे के बिना अधूरे होते हैं | इन्हें साथ साथ बजाया जाता है | देवभूमि उत्तराखण्ड में पारंपरिक लोक उत्सवों , मेलों, मंदिरों, व विभिन्न आयोजनों पर दमुवां व ढोल बजाये जाते हैं | दमाऊँ गले में डालकर दोनों हाथों से नगाड़े की भांति बजाया जाता है | दमांऊ कढ़ाईनुमा तांबे के खोल में खाल से तैयार किया जाता है | दमांऊ (दमुवा) का व्यास लगभग एक फिट तक होता है | दमांऊ की पुड़ी कसने के लिए विशेष तरह की रस्सी उपयोग में लाई जाती है, जिससे इसे बार बार कसने की आवश्यकता नहीं होती है | इसे बनाते समय ही अच्छी तरह से कस दिया जाता है | दमांऊ ( दमुवा) की आकृति अर्ध गोले के आकार की गहरी बड़ी कटोरी के आकार की होती है | दमांऊ दमुवा को कंधे में लटकार अथवा जमीन पर रखकर भी बजाया जाता है | दमांऊ की धुन व ढोल की धुन का आपस में गहरा संबध है | छोलिया नृत्य का यह सबसे महत्वपूर्ण लोक वाद्य यंत्र है |

डौर

देवभूमि उत्तराखण्ड की संस्कृति परंपराओं के साथ साथ यहां के पारंपरिक वाद्य लोकयत्रों का अपना विशेष महत्व है | डौर डमरू की ही आकृति का एक पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र है | डौर एक प्राचीन लोक वाद्य यंत्र है | इसका उपयोग मांगलिक कार्यो, विभिन्न लोक उत्सवों, पर्वो , लोक देवी देवताओं के जागरों, में किया जाता है | डौंर को शिव यंत्र के नाम से भी जाना जाता है। डौंर को छड़ी व हाथ से बजाया जाता है। घुटनों के बीच डमरू को रखकर दाहिने हाथ से छड़ी व बाएँ हाथ की उँगलियों से शब्दोत्पति कर बजाया जाता है। इसका आकार चपटा वर्गाकारनुमा होता है | साधारणतया डौर की वाह्य आकार बनाने में मजबूत साल की लकड़ी अथवा कोई मजबूत लकड़ी व इसकी पुड़ियाँ बकरी घुरड़ काकड़ आदि की खाल से निर्मित की जाती है। लोहे अथवा पीरल के कुंडलों से कसकर डौर को मढ़ (तैयार) कर दिया जाता है | इसका उपयोग देवभूमि के उत्तराखण्ड के कुमांऊ गढ़वाल के पहाड़ो में डौर का उपयोग किया जाता है |

हुड़का

उत्तराखण्ड के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों में हुड़का का भी एक विशेष स्थान है, और हुड़का सर्वाधिक पसंदीदा वाद्य यंत्रों में से एक है | कृषि कार्य में धान रोपाई के समय हुड़किया बौल में प्रयोग किया जाना वाला वाद्य यंत्र हुड़का एक चित परिचित नाम है | लोक वाद्य यंत्र हुड़का जागर विधा, लोक गीतों लोक नृत्यों , झोड़ा, चांचरी, छपेली, हुड़किया बौल आदि में हुड़के का उपयोग किया जाता है | विभिन्न लोकगीत हुड़के की थाप पर ही गाए जाते हैं ,लोकगीतों में हुड़के की थाप (धुन) को आसानी से सुना जा सकता है | हुड़के का मुख्य भाग लकड़ी का बना होता है, अंदर खोखला व इसके दोनों ओर खाल (चर्म) आदि से मढ़कर दोनों सिरों को डोरी से कसा जाता है | इसे बजाने के लिए कंधे पर लटकाया जाता है | कमर के पास से कपड़े की पट्टी को डोरी से बांध दिया जाता है | हुड़का बजाते समय कपड़े की पट्टी का खिचांव हुड़के की पुड़ी और हुड़के की डोरी पर पड़ने से इसकी आवाज आसानी से संतुलित हो जाती है | यह जागर का एक प्रमुख वाद्य यंत्र है | कुमांऊ के कुछ लोकदेवताओं की जागर केवल हुड़के पर ही लगायी जाती है जबकि लोकदेवता की बैसी में ढोल व दमुवा लोकवाद्य यंत्र का उपयोग किया जाता है | लोकगीत हुड़के की थाप धुन पर गाये जाते हैं, हुड़का देवभूमि उत्तराखण्ड के कुमांऊ गढ़वाल का एक प्रमुख पारंपरिक लोकवाद्य यंत्र है |

नगाडा (नगाड़े)

उत्तराखण्ड के पारंपरिक लोकवाद्य यंत्रों में नगाड़ा का भी अपना एक विशेष महत्व है | लोकवाद्य यंत्र नगाड़ा दमुवा का ही एक बड़ा रूप होता है | नगाड़ा वाद्य यंत्र मुख्यतः प्राचीनकाल में युद्ध जैसे अवसरों व वीर रस को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग किया जाता था।तथा प्राचीनकाल में राजाओं द्वारा रणक्षेत्र की यात्रा करने युद्ध भूमि पर अष्टधाधु के नगाडे बजाये जाते थे | इसको मंदिरों में आज भी निरन्तर प्रयोग किया जाता है | नगाड़े का प्रयोग आज भी मंदिरों में नौबत लगाने के लिये किया जाता है | नौबत में हर समय लय ताल भिन्न भिन्न होती है , और इसका मुख्य उद्देश्य सृष्टि को जागृत , जागरण करना होता है |

रणसिंघ

रणसिंह भी प्रसिद्ध पारंपरिक वाद्य यंत्रों में एक है | प्राचीन काल में यह युद्ध का एक प्रमुख वाद्य यंत्र हैं,तथा राजाओं के दल बल के साथ आने व विजय प्राप्ति आदि की सूचना का रणभेदी व सूचक का यंत्र है | रणसिंघ आकार में लंबे पीतल या तांबे के बने होते हैं। युद्ध के अवसरों पर इन वाद्य यंत्रों को बजाने पर सूचना या सावधान रहने का संदेश दिया जाता था। यह मुख की ओर संकरी नाल द्वारा फूँक मारकर इनसे तीव्र कर्कश ध्वनि निकलती है। इसका प्रयोग देवि-देवताओं की पूजा के दौरान किया जाता है।विभिन्न अवसरों , मेलों छोलिया नृत्य या अनेक आयोजनों पर भी रणसिंघ बजाया जाता है, पूर्व में कुमांऊ के पारंपरिक विवाह समारोंहों में भी रणसिंघ को बजाया जाता था | लोकवाद्य यंत्रों में रणसिंघ का भी अपना एक विशेष स्थान है |

बड़ा ढोल

देवभूमि के पारंपरिक लोकवाद्य यंत्रों में बड़े ढोल का भी अपना एक विशेष महत्व है | मंदिरों विभिन्न उत्सवों आयोजनों पर इसका उपयोग किया जाता है | यह तांबे का बना होता है | इसमें जानवर की खाल चढ़ाई जाती है | बड़े ढोल की आवाज को ज्यादा बुलंद करने के लिए इसमें घी भरा जाता है , बड़े ढोल को बजाने के लिए बड़ी लकड़ी बनायी जाती है यह ढोल वीर रस को बढ़ावा देने का भी प्रतिक रहा है | इसे बजाते समय वीर रस की धुन प्राथमिकता से बजायी जाती है इसकी ध्वनि आसानी से दूर दूर तक पहुचती व दूर दूर तक सुनाई देती है |

मशकबीन

मशकबीन देवभूमि के पर्वतीय अंचल का एक प्रमुख लोकवाद्य यंत्र है | मशकबीन छोलिया नृत्य का एक प्रमुख वाद्य यंत्र है | इसकी ध्वनि कर्णप्रिय होती है, मशकबीन में एक मुख्य भाग चमड़े की थैलीनुमा मशक होता है | इसमें पांच छेद किये जाते हैं चार छेदों में पिपरियां लगाई जाती हैं | मशकबीन को बजाते समय बगल में दबाया जाता है, बगल में दबाकर एक नली को मुंह में डालकर वादक इसमें लगातार हवा भरता है | फूंक मारने वाली नली के अंदर पिपरी नहीं होती है | दूसरी पिपरी से वादक अंगुलियों की सहायता से आवश्यकतानुसार धुन निकालता है | बांसुरी को चंडक कहते हैं | जब मशक के अंदर वादक द्वारा हवा भरी जाती है तो यह चार भागों में विभाजित होती है | चंडक में जाने वाली हवा से ही बांसुरी की तरह धुनें निकलती है | दूसरी हवा तीन पाइपों में जाती हैं जो कंधे में पिछे की ओर लटके होते हैं | इनमें एक जैसा ही स्वर निकलता है | ये बासुंरी वाली धुन के सहायक बने होते हैं और धुन के सौंगर्य व मधुरता को बढा देते हैं | मशकबीन को बिणबाजे के नाम से भी जाना जाता है यह प्राचीन समय से ही लोक वाद्य यंत्र रहा है |

देवभूमि उत्तराखण्ड के विभिन्न लोकवाद्य यंत्रों का अपना एक विशेष महत्व है | वाद्य यंत्र चार प्रमुख वर्गो में बंटे हैं जिनमें पहली श्रेणी में पशुओं की चमड़ी से बने वाद्य यंत्र जिनमें ढोल-दमाऊ,हुड़का,ढोलकी,नगाड़ा,आदि दूसरा श्रेणी में मुंह से हवा भरने वाले मशकबीन बासुंरी आदि तीसरी श्रेणी घन वाद्य जिसमें चिमटा, घुघुरू,कांसे की थाली, मंजीरा आदि चौथी श्रेणी में तार से रगढ़कर बजाने वाले इकतारा, दोतारा, सारंगी आदि प्रमुख हैं | लोकवाद्य यंत्रो व लोकसंस्कृति का सदैव ही अनूठा संबंध रहा है |